Jiyo Banaras

Jiyo Banaras Take a tour of spiritual capital of India,also a world oldest city according to hindu mythology,Came and take a tour with us. Query@:[email protected]

Happy Ganesh Chaturthi 🙏💐गणपति बप्पा मोरया
31/08/2022

Happy Ganesh Chaturthi 🙏💐
गणपति बप्पा मोरया

Happy Ganesh Chaturthi 🙏💐
गणपति बप्पा मोरया

हर हर महादेव 🙏🏻
14/07/2022

हर हर महादेव 🙏🏻

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे न काराय नम: शिवाय:॥
सावन मास की हार्दिक शुभकामनाएं
हर हर महादेव 🙏🙏

"कैसे हुआ श्रीगणेश का विवाह ऋद्धि और सिद्धि से"भगवान गणेश का सिर हाथी का था। लेकिन, जब उनका विवाद भगवान परशुराम से हुआ त...
11/07/2022

"कैसे हुआ श्रीगणेश का विवाह ऋद्धि और सिद्धि से"

भगवान गणेश का सिर हाथी का था। लेकिन, जब उनका विवाद भगवान परशुराम से हुआ तो युद्ध में उनका एक दांत भी टूट गया। इसलिए उन्हें एक दंत भी कहा जाता है।

इन दो कारणों से उनसे कोई भी देव कन्या विवाह के लिए तैयार नहीं थी। इस बात से अमूमन गणेशजी नाराज रहा करते थे। और जब किसी अन्य देवता का विवाह होता तो उन्हें किसी न किसी तरह कष्ट पहुंचाते।

इस कार्य में उनका चूहा भी साथी होता, वह विवाह के मंडप में जाकर उसे खोखला कर देता और इस तरह विवाह में किसी न किसी तरह विघ्न हो जाता है। सारे देवता इस बात को लेकर परेशान थे।

सभी देवता परेशान हो गए और वह शिवजी के पास गए। शिव-पार्वती ने सलाह दी कि देवगण आपको इस समस्या के समाधान के लिए ब्रह्माजी के पास जाना चाहिए। सभी देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे तब वह योग में लीन थे।

लेकिन कुछ देर बाद योगबल से दो कन्याएं अवतरित हुईं। जिनके नाम ब्रह्मा जी ने ऋद्धि और सिद्धि रखें। यह ब्रह्मा जी की मानस पुत्रियां थीं। उन दोनों को लेकर ब्रह्माजी गणेशजी के पास पहुंचे और कहा वह उन्हें शिक्षा दें।

गणेशजी तैयार हो गए। जब भी चूहा गणेशजी के पास किसी के विवाह की सूचना लाता तो ऋद्धि और सिद्धि ध्यान बांटने के लिए कोई न कोई प्रसंग छेड़ देतीं।

इस तरह विवाह भी निर्विघ्न होने लगे। एक दिन चूहा आया और उसने देवताओं के निर्विघ्न विवाह के बारे में बताया तब गणेश जी को सारा मामला समझ में आया।

गणेशजी के क्रोधित होने से पहले ब्रह्माजी उनके पास ऋद्धि-सिद्धि को लेकर प्रकट हुए। उन्होंने कहा, आपने स्वयं इन्हें शिक्षा दी है। मुझे इनके लिए कोई योग्य वर नहीं मिल रहा है। आप इनसे विवाह कर लें।

इस तरह ऋद्धि (बुद्धि- विवेक की देवी) और सिद्धि (सफलता की देवी) से गणेशजी का विवाह हो गया। और फिर बाद में गणेश जी के शुभ और लाभ दो पुत्र भी हुए।
🙏🙏

 #कैलाश_पर्वत पर आज तक कोई क्यों नहीं चढ़ पाया है? #हिंदू धर्म में कैलाश पर्वत का बहुत महत्व है, क्योंकि यह भगवान शिव का...
05/06/2022

#कैलाश_पर्वत पर आज तक कोई क्यों नहीं चढ़ पाया है?

#हिंदू धर्म में कैलाश पर्वत का बहुत महत्व है, क्योंकि यह भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। लेकिन इसमें सोचने वाली बात ये है कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को अभी तक 7000 से ज्यादा लोग फतह कर चुके हैं, जिसकी ऊंचाई 8848 मीटर है, लेकिन कैलाश पर्वत पर आज तक कोई नहीं चढ़ पाया, जबकि इसकी ऊंचाई एवरेस्ट से लगभग 2000 मीटर कम यानी 6638 मीटर है। यह अब तक रहस्य ही बना हुआ है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक पर्वतारोही ने अपनी किताब में लिखा था कि उसने कैलाश पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की थी, लेकिन इस पर्वत पर रहना असंभव था, क्योंकि वहां शरीर के बाल और नाखून तेजी से बढ़ने लगते हैं। इसके अलावा कैलाश पर्वत बहुत ही ज्यादा रेडियोएक्टिव भी है।

कैलाश पर्वत पर कभी किसी के नहीं चढ़ पाने के पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि कैलाश पर्वत पर शिव जी निवास करते हैं और इसीलिए कोई जीवित इंसान वहां ऊपर नहीं पहुंच सकता। मरने के बाद या वह जिसने कभी कोई पाप न किया हो, केवल वही कैलाश फतह कर सकता है।

ऐसा भी माना जाता है कि कैलाश पर्वत पर थोड़ा सा ऊपर चढ़ते ही व्यक्ति दिशाहीन हो जाता है। चूंकि बिना दिशा के चढ़ाई करना मतलब मौत को दावत देना है, इसीलिए कोई भी इंसान आज तक कैलाश पर्वत पर नहीं चढ़ पाया।

सन 1999 में रूस के वैज्ञानिकों की टीम एक महीने तक माउंट कैलाश के नीचे रही और इसके आकार के बारे में शोध करती रही। वैज्ञानिकों ने कहा कि इस पहाड़ की तिकोने आकार की चोटी प्राकृतिक नहीं, बल्कि एक पिरामिड है जो बर्फ से ढका रहता है। माउंट कैलाश को "शिव पिरामिड" के नाम से भी जाना जाता है।

जो भी इस पहाड़ को चढ़ने निकला, या तो मारा गया, या बिना चढ़े वापिस लौट आया।

सन 2007 में रूसी पर्वतारोही सर्गे सिस्टिकोव ने अपनी टीम के साथ माउंट कैलाश पर चढ़ने की कोशिश की। सर्गे ने अपना खुद का अनुभव बताते हुए कहा : 'कुछ दूर चढ़ने पर मेरी और पूरी टीम के सिर में भयंकर दर्द होने लगा। फिर हमारे पैरों ने जवाब दे दिया। मेरे जबड़े की मांसपेशियाँ खिंचने लगी, और जीभ जम गयी। मुँह से आवाज़ निकलना बंद हो गयी। चढ़ते हुए मुझे महसूस हुआ कि मैं इस पर्वत पर चढ़ने लायक नहीं हूँ। मैं फ़ौरन मुड़ कर उतरने लगा, तब जाकर मुझे आराम मिला।

"कर्नल विल्सन ने भी कैलाश चढ़ने की कोशिश की थी। बताते हैं : "जैसे ही मुझे शिखर तक पहुँचने का थोड़ा-बहुत रास्ता दिखता, कि बर्फ़बारी शुरू हो जाती। और हर बार मुझे बेस कैम्प लौटना पड़ता। "चीनी सरकार ने फिर कुछ पर्वतारोहियों को कैलाश पर चढ़ने को कहा। मगर इस बार पूरी दुनिया ने चीन की इन हरकतों का इतना विरोध किया कि हार कर चीनी सरकार को इस पहाड़ पर चढ़ने से रोक लगानी पड़ी।कहते हैं जो भी इस पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करता है, वो आगे नहीं चढ़ पाता, उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है।यहाँ की हवा में कुछ अलग बात है। आपके बाल और नाखून 2 दिन में ही इतने बढ़ जाते हैं, जितने 2 हफ्ते में बढ़ने चाहिए। शरीर मुरझाने लगता है। चेहरे पर बुढ़ापा दिखने लगता है। कैलाश पर चढ़ना कोई खेल नहीं

29,000 फ़ीट ऊँचा होने के बाद भी एवरेस्ट पर चढ़ना तकनीकी रूप से आसान है। मगर कैलाश पर्वत पर चढ़ने का कोई रास्ता नहीं है। चारों ओर खड़ी चट्टानों और हिमखंडों से बने कैलाश पर्वत तक पहुँचने का कोई रास्ता ही नहीं है। ऐसी मुश्किल चट्टानें चढ़ने में बड़े-से-बड़ा पर्वतारोही भी घुटने तक दे।हर साल लाखों लोग कैलाश पर्वत के चारों ओर परिक्रमा लगाने आते हैं। रास्ते में मानसरोवर झील के दर्शन भी करते हैं।लेकिन एक बात आज तक रहस्य बनी हुई है। अगर ये पहाड़ इतना जाना जाता है तो आज तक इस पर कोई चढ़ाई क्यों नहीं कर पाया। महादेव 🙏🙏🙏

 #विनम्र_श्रद्धांजलिविज्ञान की जड़े हिला दी थी, इस संत ने.. "प्रह्लाद जानी" वो इंसान जिसने 76 सालो से जीवन मे कुछ नही खाय...
29/05/2022

#विनम्र_श्रद्धांजलि
विज्ञान की जड़े हिला दी थी, इस संत ने.. "प्रह्लाद जानी" वो इंसान जिसने 76 सालो से जीवन मे कुछ नही खाया और न ही कुछ पिया, फिर भी ताउम्र जीवित रहा। डॉक्टर इन पर शोध कर करके थक गए मगर कुछ न मिला। भारतीय सेना के डॉक्टर्स की टीम ने इन्हें 15 दिन तक एक ऐसे कमरे में बंद रखा जहां कुछ भी नही था, सिवाय बिस्तर के। इनके कमरे में cctv लगाए गए। 15 दिन बाद इन्हें चेक किया तो सब कुछ नार्मल था, डॉक्टर भी हैरान थे। फिर देश विदेश के डॉक्टर्स की टीम ने इन पर अलग अलग शोध किये मगर उन्हें कोई रिजल्ट न मिला कि कैसे कोई इंसान इतने सालों से बिना खाये पिये जीवित है।

प्रह्लाद जानी, गुजरात काठियावाड़ जिले में रहते थे और कल इन्होंने प्राण त्याग दिए। इनके अनुसार मात्र 9 वर्ष की आयु में भगवान श्रीनाथ (कृष्ण) की ये पूजा करते थे और एक दिन अचानक भगवती महामाया (काली) प्रगट हुई और इन्हें वरदान मांगने को कहा, इन्होंने मांगा की इन्हें कभी भूंख प्यास न लगे ! देवी ने तथास्तु बोलते हुये वरदान दिया। तब से ये बिना अन्न जल के रहने लगे, इनकी तालु से अमृत गिरता था। इनका न बड़ा आश्रम, न ही अरबो की दौलत ! मगर प्रह्लाद जानी ने विज्ञान की जड़े हिला दी थी। अच्छे अच्छे नास्तिक न चाहते हुए भी स्वीकार करने को मजबूर थे... संत प्रह्लाद जानी - चुनरी वाली माताजी का गुजरात मे 26 मई को निधन हो गया। आप 90 साल के थे।

आपके बारे में कहा जाता था कि आपने पिछले 76 साल से अन्न जल ग्रहण नही किया है। आप सिर्फ श्वास के सहारे जीवित हैं। DRDO मतलब Defence Research & Development Organisation की एक अनुषांगिक संस्था DIPAS यानि कि Defence Institute of Physiology and Allied Sciences ने दो बार संत प्रह्लाद जानी के इस दावे की जाँच की कि उन्होंने पिछले 76 साल से अन्न जल ग्रहण नही किया। उनके ऊपर बड़ी वृहद Scientific Research हुई है। पहली बार 2003 मे और दोबारा 2010 में। 2010 में DIPAS , DRDO, AIIMS जैसे संस्थानों के Doctors , Scientists और Researchers ने अहमदाबाद के Sterling हॉस्पिटल के एक शीशे के Chamber नुमा रूम में पूरे 15 दिन तक उनकी निगरानी की। कुल 40 Doctors की टीम और 24 घंटे CC TV कैमरा की निगरानी में उन्हें देखते जांचते रहे। पल पल उनका Temperature, BP, Heart Beat, Blood Sugar, Lipid Profile, CBC, Kidney एवं liver function जैसे तमाम tests होते रहे। इस बीच उनके शौचालय जाने, मल मूत्र विसर्जन की भी निगरानी और Tests हुए। वैज्ञानिकों ने पाया कि उन पंद्रह दिनों में संतजी ने एक बूंद भी जल या कोई अन्न नही लिया। 24 घंटे में औसतन 100 ml पेशाब उनको होता था। मल त्याग नही किया, एक बार भी।

तमाम research के बाद वैज्ञानिकों ने यही निष्कर्ष निकाला कि संत जी एक अज्ञात रहस्यमयी प्राण शक्ति से ही ऊर्जा ग्रहण करते हैं। DIPAS और DRDO जैसी संस्थाएं सेना के लिए ऐसी research करती हैं जिनसे विकट परिस्थितियों में मरुस्थल या बर्फीली चोटियों पे सैनिक बिना कुछ खाये पिये भी न सिर्फ Survive कर सकें बल्कि लड़ सकें। इसी क्रम में DRDO Energy Drinks , Energy foods, पे रिसर्च करती हैं जिससे जेब मे रखी एक चॉकलेट मात्र से हफ्ते भर की ऊर्जा मिल सके। तो DIPAS जैसी संस्था ने भी संत प्रह्लाद जानी के इस दावे को सत्य माना कि उन्होंने लंबे समय तक अन्न जल ग्रहण नही किया। ऐसे में हमारे ग्रंथों में समाधि की जिस अवस्था का ज़िक्र आता है जिसमे योगी सिर्फ योग प्राणायाम और प्राण वायु के सहारे ही वर्षों समाधि में बिता देते थे। वैसे ही योगी थे संत प्रह्लाद जानी ।

26 मई 2020 सुबह आपका निधन हो गया, आपको भावपूर्ण श्रद्धांजलि.. शत-शत नमन् 💐🙏🙏 25,05,2022

केदारनाथ मंदिर : एक अनसुलझी पहेली केदारनाथ मंदिर का निर्माण किसने करवाया था इसके बारे में बहुत कुछ कहा जाता है। पांडवों ...
28/05/2022

केदारनाथ मंदिर : एक अनसुलझी पहेली

केदारनाथ मंदिर का निर्माण किसने करवाया था इसके बारे में बहुत कुछ कहा जाता है। पांडवों से लेकर आदि शंकराचार्य तक।
आज का विज्ञान बताता है कि केदारनाथ मंदिर शायद 8वीं शताब्दी में बना था। यदि आप ना भी कहते हैं, तो भी यह मंदिर कम से कम 1200 वर्षों से अस्तित्व में है।

केदारनाथ की भूमि 21वीं सदी में भी बहुत प्रतिकूल है। एक तरफ 22,000 फीट ऊँची केदारनाथ पहाड़ी, दूसरी तरफ 21,600 फीट ऊँची कराचकुंड और तीसरी तरफ 22,700 फीट ऊँचा भरतकुंड है। इन तीन पर्वतों से होकर बहने वाली पाँच नदियाँ हैं मंदाकिनी, मधुगंगा, चिरगंगा, सरस्वती और स्वरंदरी। इनमें से कुछ इस पुराण में लिखे गए हैं।

यह क्षेत्र "मंदाकिनी नदी" का एकमात्र जलसंग्रहण क्षेत्र है। यह मंदिर एक कलाकृति हैI कितना बड़ा असम्भव कार्य रहा होगा ऐसी जगह पर कलाकृति जैसा मन्दिर बनाना जहाँ ठंड के दिन भारी मात्रा में बर्फ हो और बरसात के मौसम में बहुत तेज गति से पानी बहता हो। आज भी आप गाड़ी से उस स्थान तक नही जा सकते।

फिर इस मन्दिर को ऐसी जगह क्यों बनाया गया?

ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में 1200 साल से भी पहले ऐसा अप्रतिम मंदिर कैसे बन सकता है?

1200 साल बाद भी जहाँ उस क्षेत्र में सब कुछ हेलिकॉप्टर से ले जाया जाता है। JCB के बिना आज भी वहाँ एक भी ढाँचा खड़ा नहीं होता है। यह मंदिर वहीं खड़ा है और न सिर्फ खड़ा है, बल्कि बहुत मजबूत है।

हम सभी को कम से कम एक बार यह सोचना चाहिए।

वैज्ञानिक अनुमान लगाते हैं कि यदि मंदिर 10वीं शताब्दी में पृथ्वी पर होता, तो यह "हिम युग" की एक छोटी अवधि में होता।

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ जियोलॉजी, देहरादून ने केदारनाथ मंदिर की चट्टानों पर लिग्नोमैटिक डेटिंग का परीक्षण किया। यह "पत्थरों के जीवन" की पहचान करने के लिए किया जाता है। परीक्षण से पता चला कि मंदिर 14वीं सदी से लेकर 17वीं सदी के मध्य तक पूरी तरह से बर्फ में दब गया था। हालाँकि, मंदिर के निर्माण में कोई नुकसान नहीं हुआ।

2013 में केदारनाथ में आई विनाशकारी बाढ़ को सभी ने देखा होगा। इस दौरान औसत से 375% अधिक बारिश हुई थी। आगामी बाढ़ में "5748 लोग" (सरकारी आँकड़े) मारे गए और 4200 गाँवों को नुकसान पहुँचा। भारतीय वायुसेना ने 1 लाख 10 हजार से ज्यादा लोगों को एयरलिफ्ट किया। सब कुछ ले जाया गया। लेकिन इतनी भीषण बाढ़ में भी केदारनाथ मंदिर का पूरा ढाँचा जरा भी प्रभावित नहीं हुआ।

भारतीय पुरातत्व सोसायटी के मुताबिक, बाढ़ के बाद भी मंदिर के पूरे ढाँचे के ऑडिट में 99 फीसदी मंदिर पूरी तरह सुरक्षित है I 2013 की बाढ़ और इसकी वर्तमान स्थिति के दौरान निर्माण को कितना नुकसान हुआ था, इसका अध्ययन करने के लिए "आईआईटी मद्रास" ने मंदिर पर "एनडीटी परीक्षण" किया। साथ ही कहा कि मंदिर पूरी तरह से सुरक्षित और मजबूत है।

यदि मंदिर दो अलग-अलग संस्थानों द्वारा आयोजित एक बहुत ही "वैज्ञानिक और वैज्ञानिक परीक्षण" में उत्तीर्ण नहीं होता है, तो आज के समीक्षक आपको सबसे अच्छा क्या कहता?

मंदिर के अक्षुण खड़े रहने के पीछे जिस दिशा में इस मंदिर का निर्माण किया गया है व जिस स्थान का चयन किया गया है, ये ही प्रमुख कारण हैं।

दूसरी बात यह है कि इसमें इस्तेमाल किया गया पत्थर बहुत सख्त और टिकाऊ होता है। खास बात यह है कि इस मंदिर के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया गया पत्थर वहाँ उपलब्ध नहीं है, तो जरा सोचिए कि उस पत्थर को वहाँ कैसे ले जाया जा सकता था। उस समय इतने बड़े पत्थर को ढोने के लिए इतने उपकरण भी उपलब्ध नहीं थे। इस पत्थर की विशेषता यह है कि 400 साल तक बर्फ के नीचे रहने के बाद भी इसके "गुणों" में कोई अंतर नहीं है।

आज विज्ञान कहता है कि मंदिर के निर्माण में जिस पत्थर और संरचना का इस्तेमाल किया गया है, तथा जिस दिशा में बना है उसी की वजह से यह मंदिर इस बाढ़ में बच पाया।

केदारनाथ मंदिर "उत्तर-दक्षिण" के रूप में बनाया गया है। जबकि भारत में लगभग सभी मंदिर "पूर्व-पश्चिम" हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मंदिर "पूर्व-पश्चिम" होता तो पहले ही नष्ट हो चुका होता। या कम से कम 2013 की बाढ़ में तबाह हो जाता। लेकिन इस दिशा की वजह से केदारनाथ मंदिर बच गया है।

इसलिए, मंदिर ने प्रकृति के चक्र में ही अपनी ताकत बनाए रखी है। मंदिर के इन मजबूत पत्थरों को बिना किसी सीमेंट के "एशलर" तरीके से एक साथ चिपका दिया गया है। इसलिए पत्थर के जोड़ पर तापमान परिवर्तन के किसी भी प्रभाव के बिना मंदिर की ताकत अभेद्य है।

टाइटैनिक के डूबने के बाद, पश्चिमी लोगों ने महसूस किया कि कैसे "एनडीटी परीक्षण" और "तापमान" ज्वार को मोड़ सकते हैं।

लेकिन भारतीय लोगों ने यह सोचा और यह 1200 साल पहले परीक्षण किया। क्या केदारनाथ उन्नत भारतीय वास्तु कला का ज्वलंत उदाहरण नहीं है?2013 में, मंदिर के पिछले हिस्से में एक बड़ी चट्टान फँस गई और पानी की धार विभाजित हो गई। मंदिर के दोनों किनारों का तेज पानी अपने साथ सब कुछ ले गया लेकिन मंदिर और मंदिर में शरण लेने वाले लोग सुरक्षित रहे। जिन्हें अगले दिन भारतीय वायुसेना ने एयरलिफ्ट किया था।

सवाल यह नहीं है कि आस्था पर विश्वास किया जाए या नहीं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि मंदिर के निर्माण के लिए स्थल, उसकी दिशा, वही निर्माण सामग्री और यहाँ तक ​​कि प्रकृति को भी ध्यान से विचार किया गया था जो 1200 वर्षों तक अपनी संस्कृति और ताकत को बनाए रखेगा।

हम पुरातन भारतीय विज्ञान की भारी यत्न के बारे में सोचकर दंग रह गए हैं I शिला जिसका उपयोग 6 फुट ऊँचे मंच के निर्माण के लिए किया गया है कैसे मन्दिर स्थल तक लायी गयी।

आज तमाम बाढ़ों के बाद हम एक बार फिर केदारनाथ के उन वैज्ञानिकों के निर्माण के आगे नतमस्तक हैं, जिन्हें उसी भव्यता के साथ 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे ऊँचा होने का सम्मान मिलेगा।

यह एक उदाहरण है कि वैदिक हिंदू धर्म और संस्कृति कितनी उन्नत थी। उस समय हमारे ऋषि-मुनियों यानी वैज्ञानिकों ने वास्तुकला, मौसम विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, आयुर्वेद में काफी तरक्की की थी ।

इसलिए मुझे गर्व है कि मैं भारतीय हूँ।

हर हर महादेव !!!🚩

#ॐ

🙏
14/05/2022

🙏

12/05/2022

कोर्ट का आदेश
ज्ञानवापी मस्जिद के तहखाने समेत पूरे परिसर की वीडियोग्राफी होगी , जरूरत पड़ी तो तोड़ दे तहखाने का ताला !
उपद्रव करने वालो पर FIR दर्ज करके जेल भेजने का आदेश

17 मई तक सर्वे रिपोर्ट पेश करने का आदेश

सारी समस्या मिटाए ओम नमः शिवाय । #हरहरमहादेव  #केदारनाथ 🙏🙏🙏
17/10/2021

सारी समस्या मिटाए ओम नमः शिवाय ।
#हरहरमहादेव #केदारनाथ 🙏🙏🙏

सावन का पहला दिनबाबा काशी विश्वनाथ दर्शन 🙏
25/07/2021

सावन का पहला दिन
बाबा काशी विश्वनाथ दर्शन 🙏

🌹इनसे मिलिए ये हैं राजीव पोद्दार जी कोलकत्ता से.कल्पना कीजिए कि 40 साल तक क्वारंटाइन में रहना- यही मेरे जीवन की कहानी है...
15/06/2021

🌹इनसे मिलिए ये हैं राजीव पोद्दार जी कोलकत्ता से.

कल्पना कीजिए कि 40 साल तक क्वारंटाइन में रहना- यही मेरे जीवन की कहानी है।
जब मैं 9 साल का था, तब एक रात मैं बुखार के साथ उठा। माँ ने मुझे गोलियां दीं और मुझे वापस सुला दिया, लेकिन अगली सुबह जब मैंने बिस्तर से उठने की कोशिश की, तो मैं गिर गया, मुझे कमजोर समझकर माँ ने मुझे उठा लिया। लेकिन मैंने उससे कहा, 'माँ, मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरे पैर नहीं हैं।

वह घबराई, चुटकी ली और पैरों को हिलाया, लेकिन मुझे कुछ महसूस नहीं हुआ। हम अस्पताल पहुंचे जहां डॉक्टर ने मुझे लकवाग्रस्त घोषित कर दिया।

मुझे समझ में नहीं आया कि इसका क्या मतलब है, लेकिन माँ टूट गई - यह लकवा कहीं से नहीं आया था तो माँ और पिताजी को उम्मीद थी कि जैसे ही आया था यह अचानक से चला जाएगा।

अगले 5 वर्षों में, हम इलाज की तलाश में दर-दर भटकते रहे। हम डॉक्टरों और तांत्रिकों के पास समान रूप से गए लेकिन कुछ भी काम नहीं आया। घर में मैं छोटे-छोटे कामों के लिए दूसरों पर निर्भर रहता था। मैं स्कूल नहीं जा सकता था या अपने दोस्तों से नहीं मिल सकता था.

जो मुझे मिला, लेकिन मेरे परिवार ने भी संघर्ष किया। जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, मुझे ले जाना मुश्किल होता गया और मुझे पता था कि मेरा इलाज हमारे वित्त को प्रभावित कर रहा है।

तो 14 साल की उम्र में, मैंने खुद से कहा, 'यही वह जीवन है जो आपके पास है। आप या तो पालना कर सकते हैं और इसे खराब कर सकते हैं या इसके बारे में कुछ कर सकते हैं।' इसलिए मैंने केवल वही किया जो मैं कर सकता था—पढ़ना, किताबें, अखबार, कुछ भी।
मैं अपने हाथों के अलावा एक भी अंग को हिला नहीं सकता था या 30 मिनट से अधिक नहीं बैठ सकता था- स्कूल जाना संभव नहीं था इसलिए, मैं अपने दोस्तों की पाठ्यपुस्तकें पढ़ूंगा।
जैसे ही वे एक कक्षा से दूसरी कक्षा में गए, मुझे पता था कि एक दिन, वे अपनी शिक्षा पूरी करेंगे और नौकरी पा लेंगे, जबकि मैं अभी भी घर पर रहूँगा, बिना किसी उद्देश्य के पढ़ना।
लंबे समय तक मैं अपने आप को खोया हुआ और असहाय महसूस कर रहा था। लेकिन जब हम घर चले गए, तो मुझे अपने जीवन का उद्देश्य मिल गया। मैं उस समय २३ वर्ष का था, और 'काफी बुद्धिजीवी' के रूप में जाना जाता था। तो एक दोपहर, जब मेरे पड़ोसी के ट्यूशन टीचर नहीं आए, तो उन्होंने मुझसे पूछा, 'भैया, क्या आप हमें गणित पढ़ा सकते हैं?

मैंने पहले कभी नहीं पढ़ाया था, लेकिन यह आसान लग रहा था। मैंने इसे मज़ेदार बनाने के लिए कुछ हास्य जोड़ा और उन्हें यह बहुत पसंद आया, उन्होंने अपने ट्यूशन शिक्षक को आने से रोकने के लिए कहा और मुझे पढ़ाने के लिए कहा- मैं खुशी से सहमत हो गया!
जल्द ही, बात फैल गई और उनके दोस्त जुड़ गए। धीरे-धीरे, मेरे बैच 10 से 50 से बढ़कर 100 हो गए। लेकिन मैंने अपने छात्रों से एक पैसा भी नहीं लिया - शिक्षण मेरा जुनून था, और मैंने शेयरों में ट्रेडिंग करके पर्याप्त कमाई की।

हर सुबह, कक्षाएं सुबह 9 बजे शुरू हुईं और रात 10 बजे समाप्त हुईं। यह उस बिंदु पर पहुंच गया जहां मैं 1000 बच्चों को पढ़ा रहा था और हो सकता है कि इसने किसी और को पागल कर दिया हो, मेरे छात्रों ने मुझे सचेत रखा! मेरा मानना ​​है कि अधिकांश सीखना शिक्षण के माध्यम से होता है, और मैं कभी भी रुकना नहीं चाहता।

लेकिन दुर्भाग्य से मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है। मेरी हड्डियां, फेफड़े और दिल सब कमजोर हो गए हैं। पिछले कुछ वर्षों से, मुझे इसे आसान बनाना पड़ा है और बैचों को कम करना पड़ा है। इसलिए अब मैं 'हेलीकॉप्टर मनी' 'जियो' और यहां तक ​​कि 'कोविड-19' जैसे विषयों पर यूट्यूब पर शॉर्ट अवेयरनेस वीडियो बनाता हूं।

लेकिन हाल ही में, मैं बहुत कुछ सुन रहा हूं कि घर में सभी के लिए पिंजरे में बंद रहना कितना मुश्किल हो गया है। लेकिन, इसे किसी ऐसे व्यक्ति से लें जो हमेशा 'संगरोध' रहा है- अगर मैं अपने घर की चार दीवारों के भीतर से इतनी दूर आ सकता हूं, तो कल्पना करें कि आप बाहर निकलने के बाद कितनी दूर जाएंगे। हिम्मत बनायें रखें।"
❤🌹🥰

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