05/10/2024
आस-पास के कई जनपदों में प्रसिद्ध है यह मंदिर
डाला ( सोनभद्र)जिले ही नहीं अपितु आसपास के कई जिलों के प्रसिद्ध मंदिरों में क्षेत्र के बारी-डाला स्थित मां वैष्णो शक्तिपीठ धाम मंदिर का स्थान विशिष्ट है। यह वाराणसी-शक्तिनगर मुख्य मार्ग पर बारी-डाला क्षेत्र में स्थित है। जनपद मुख्यालय से 30 किमी दक्षिण ओबरा से आठ किमी पूरब व चोपन से पांच किमी दक्षिण तथा डाला बाजार से तीन किमी उत्तर दिशा में मुख्य मार्ग पर यह मंदिर भव्य रूप में दिखाई देता है। अग्रवाल धर्मार्थ सेवा समिति ने बताया कि तारीख22-10-2004 में जम्मू स्थित कटरा से मां वैष्णो की अखंड ज्योति एक सप्ताह में लाई गयी थी और शारदीय नवरात्र में मां जगदम्बा के सभी विग्रहों का प्राण प्रतिष्ठा किया गया था। जम्मू से लायी गयी अखंड ज्योति आजतक अनवरत जल रही है। यहां जनपद से ही नहीं अपितु बिहार, झारखंड, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश व अन्य प्रदेशों से भी श्रद्धालु हमेशा दर्शन के लिए आते रहते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गयी हर मुराद मां जरूर पूरा करती हैं। यहां रामनवमी में लाखों की संख्या में भक्त दर्शन करने दूरदराज से आते हैं।
प्रतिदिन सुबह और शाम को मंदिर में विराजमान सभी देवी-देवताओं की होती है आरती
मंदिर में विराजमान पिंडी स्वरूप माता महाकाली,महा सरस्वती, महालक्ष्मी समेत काल भैरव, बजरंगबली, आदि सभी देवी-देवताओं की सुबह पांच बजे व शाम को संगीतमय दिव्य आरती उतारकर शंखध्वनि की जाती है आरती के बाद मातारानी के उद्घोष से पुरा मंदिर परिसर गुंजायमान हो उठता है। आरती के बाद ही भक्त कतारबद्ध होकर दर्शन पूजन करने जाते हैं।
क्या है इतिहास
मां वैष्णो शक्तिपीठ धाम की स्थापना का इतिहास एक आश्चर्यजनक घटना पर आधारित है। तारीख 10-4- 2002 में ओबरा निवासी मदनलाल गर्ग अपने क्रेशर बारी डाला क्षेत्र से ओबरा अपने घर आ रहे थे कि अचानक उनकी कार वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग पर सामने से आ रही ट्रक में जा घुसा। दुर्घटना जबर्दस्त थी, जिसे देखकर लोग बड़ी घटना की आशंका व्यक्त कर रहे थे। घंटों प्रयास के बाद जब ट्रक के अन्दर से कार निकाला गया और कार खोलने पर वे बिल्कुल सुरक्षित निकले। यह घटना देख लोग आश्चर्यचकित हो गये। उसी समय उनके मुंह से मां वैष्णो का नाम निकला और सभी लोगों ने मंदिर निर्माण कराए जाने की ठान ली। वर्षों पहले वहां घनघोर जंगल था, जहां अक्सर बाघों व अन्य जंगली जानवरों का आना जाना था। इस रोड पर दुर्घटना भी होता था। दुर्घटना वाले स्थान के ठीक सामने ही जम्मू से अखंड ज्योति लाकर भव्य मंदिर का निर्माण हुआ, जिसके निर्माण में सवा तीन वर्ष का समय लगा।
क्या है विशेषता
यह क्षेत्र पूरा सुनसान इलाका था, जिसके चारों तरफ जंगल था। इतने बड़े मंदिर निर्माण की कल्पना लोगों की नहीं थी। जब मंदिर का निर्माण शुरू हुआ तो मां की असीम कृपा से पैसा आता गया और मंदिर निर्माण का कार्य बढ़ता गया। मंदिर निर्माण के लिए कभी पैसों की कमी नहीं हुई। जिस दिन जम्मू से अखंड ज्योति नवनिर्मित मंदिर में लाई गयी तो अचानक मौसम बदल गया और एकाएक तेज हवा, बादलों की गरज के साथ घनघोर बारिश हुई, जिससे लोगों को एहसास हुआ कि वास्तव में कोई शक्ति का पदार्पण मंदिर में हुआ है। मंदिर के अंदर की गुफा का बनावट बिलकुल प्राकृतिक लगती है। जगह-जगह जंगल और जंगली जानवर हाथी, बाघ ,चीता, लंगूर, बंदर, भालू, सांप का प्रतिरूप निर्मित है जो देखने से मन खुशी से भर जाता है और बार-बार भक्तों को आकर दर्शन करने के लिए आकर्षित करता है।
गुफा में विराजमान त्रिदेवियों के दर्शन है महत्त्व
मंदिर के ऊंचाई पर गुफा के अंदर माता महाकाली, महा महालक्ष्मी, महा सरस्वती के पिंडी स्वरूप विराजमान त्रिदेवियों का बड़े ही श्रद्धा भाव से श्रद्धालु दर्शन करते हैं। इसके अलावा मंदिर के गुफा में एक कतार से दुर्गा स्वरूप 9 देवियों का भी अलग-अलग स्वरूपों में भक्त दर्शन करते हैं।