21/06/2026
दिल बहुत दुखी है।
भरत तिवारी की हत्या ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मैंने उनके जितने भी वीडियो और विचार देखे, उनमें एक ऐसे युवा की छवि दिखाई दी जो अपने गाँव, समाज और लोगों की समस्याओं के लिए आवाज़ उठाता था। ऐसे नौजवान का इस तरह अंत होना बेहद पीड़ादायक है।
एक बात समझ से परे है। जब मुंबई हमलों जैसे भयावह आतंकवादी हमले के दौरान अत्याधुनिक हथियारों से लैस आतंकवादि को भी ज़िंदा पकड़ा जा सकता था, तो क्या बिहार पुलिस के पास इतनी क्षमता नहीं थी कि भरत तिवारी को जीवित गिरफ्तार किया जा सकता? क्या हर मुठभेड़ का अंत मौत ही होना चाहिए?
यह घटना कानून-व्यवस्था, पुलिस की कार्यप्रणाली और बिहार सरकार की जवाबदेही को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। एक लोकतंत्र में न्याय अदालतों से होना चाहिए, न कि गोलियों से।
किसी भी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करने का अधिकार कानून और न्यायपालिका का है। यदि किसी अपराध का आरोप था, तो उसकी निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया के तहत सुनवाई होनी चाहिए थी।
एक संवेदनशील और जवाबदेह व्यवस्था की पहचान यही है कि वह न्याय सुनिश्चित करे, केवल परिणाम नहीं।
नमन के साथ श्रद्धांजलि 🙏😭