हाथी की आत्मकथा

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18/02/2026

 #मानव-हाथी संघर्ष भारत के कई राज्यों में एक गंभीर समस्या बन चुका है, विशेषकर  #झारखंड,  #उडीसा और  #छत्तीसगढ़ में।  #हा...
17/02/2026

#मानव-हाथी संघर्ष भारत के कई राज्यों में एक गंभीर समस्या बन चुका है, विशेषकर #झारखंड, #उडीसा और #छत्तीसगढ़ में। #हाथी अत्यंत बुद्धिमान और सामाजिक जीव हैं, जो सदियों से अपने पारंपरिक मार्गों (हाथी- कारीडोर) पर चलते आए हैं। लेकिन जंगलों की कटाई, रेल लाइनों, सड़कों और खेती के विस्तार ने इन प्राकृतिक गलियारों को तोड़ दिया है, जिसके कारण हाथी सीधे #गाँवों और #खेतों में प्रवेश करने लगे हैं। इसका परिणाम बेहद दुखद होता है—फसलों का नुकसान, घरों की तबाही, मानव मृत्यु और हाथियों की #रेल दुर्घटनाओं या #बिजली के झटकों से मौत। सबसे चिंताजनक बात यह है कि #वन और #पर्यावरण #विभाग इस समस्या को कम करने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग करने में गंभीर प्रयास नहीं कर रहे।

#रेडियो कॉलर जैसी तकनीक, जो हाथियों की गतिविधियों को #जीपीएस/जीएसएम के माध्यम से ट्रैक कर सकती है, पहले से ही कर्नाटक और असम जैसे राज्यों में सफलतापूर्वक प्रयोग की जा चुकी है। यह तकनीक गाँववालों और रेलवे अधिकारियों को समय रहते चेतावनी दे सकती है, जिससे टकराव और दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है। लेकिन #झारखंड जैसे उच्च-संघर्ष वाले क्षेत्रों में इसका व्यापक उपयोग नहीं हो रहा, और विभाग केवल मुआवज़ा देने या हाथियों को भगाने जैसी प्रतिक्रियात्मक नीतियों तक सीमित हैं। यदि वन विभाग वास्तव में संरक्षण और सतत विकास को गंभीरता से ले, तो उन्हें रेडियो कॉलर, हाथी गलियारे का वैज्ञानिक मानचित्रण, मोबाइल/IVR अलर्ट सिस्टम और रेलवे समन्वय जैसी तकनीकी पहलों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

यह केवल हाथियों की #रक्षा का सवाल नहीं है, बल्कि #मानव #जीवन और पर्यावरणीय संतुलन की सुरक्षा का भी प्रश्न है। हाथी वन पारिस्थितिकी के लिए "की स्टोन प्रजाति" हैं, और उनका अस्तित्व जंगलों की सेहत से जुड़ा हुआ है। इसलिए यह अत्यंत निंदनीय है कि विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाने में लापरवाह बने हुए हैं। यदि समय रहते तकनीकी समाधान अपनाए जाएँ, तो संघर्ष क्षेत्रों को त्रासदी की जगह सह-अस्तित्व के मॉडल में बदला जा सकता है।

झारखंड के लातेहार जिले में मालगाड़ी की चपेट में हाथियों का एक झुंड आ गया, जिससे हाथी के एक बच्चे की मौत हो गई। इस घटना ...

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15/08/2025

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She wasn’t just an elephant — she was Kaziranga’s living legend.

On 17 May 1970, a young Mohanmala was entrusted to the park for anti-poaching patrols and security duties.

From that day on, she became the beating heart of Kaziranga. For over five decades, she patrolled its grasslands and forests, often putting herself in danger to shield the park’s world-famous rhinos.

When poachers threatened, she stood firm.

When floods came, she swam across raging rivers to rescue sick or injured staff — earning the title of the park’s unofficial “ambulance.”

Her head mahout, Kiran Rabha, told ETV Bharat: “Where boats could not go, Mohanmala went… calm by nature but fearless when duty called.”

At 60, she retired with honours, spending her twilight years in the loving care of park staff who treated her like family.

Last Thursday, Mohanmala’s extraordinary watch finally came to an end.
Farewell, gentle giant.

Kaziranga will never be the same without you. 🐘❤️



[Kaziranga National Park, Mohanmala, anti-poaching, flood rescue, rhino protection, conservation hero]

दैनिक जागरण 21 जुलाई 2025
21/07/2025

दैनिक जागरण 21 जुलाई 2025

दैनिक जागरण 20 जुलाई 2025हाथी बहुत प्यारे जीव हैं। उनके संरक्षण के लिए आपकी आवाज और आपके पवित्र विचार ही काफी हैं। आवाज ...
20/07/2025

दैनिक जागरण 20 जुलाई 2025
हाथी बहुत प्यारे जीव हैं। उनके संरक्षण के लिए आपकी आवाज और आपके पवित्र विचार ही काफी हैं। आवाज दीजिए।

19/07/2025
वत्सला सिर्फ एक हथिनी नहीं थी, बल्कि एक पूरा एक युग थी।साल 1971 में केरल के नीलांबुर जंगलों से लाई गई वत्सला को पहले नर्...
09/07/2025

वत्सला सिर्फ एक हथिनी नहीं थी, बल्कि एक पूरा एक युग थी।

साल 1971 में केरल के नीलांबुर जंगलों से लाई गई वत्सला को पहले नर्मदापुरम और फिर पन्ना टाइगर रिजर्व में बसाया गया। यहीं उसने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक समय बिताया – एक सदी से भी ज़्यादा लंबी यात्रा में वत्सला जंगल की मां, दादी और साथी जैसी बन गई। वत्सला का स्वभाव शांत, स्नेहिल और ममतामयी था।

जब भी कोई बछड़ा जन्म लेता, वह दादी की तरह उसकी देखभाल करती थी। उसे रोज़ खैरैयां नाले पर नहलाया जाता, नरम दलिया दिया जाता और बहुत प्यार से उसकी सेवा होती। बढ़ती उम्र के कारण उसकी आंखों की रोशनी चली गई थी, लंबी दूरी तय नहीं कर पाती थी – लेकिन उसका हौसला कभी नहीं टूटा।
हाल ही में उसके आगे के पैरों के नाखूनों में चोट लग गई थी।

मंगलवार को वह नाले के पास बैठ गई और फिर उठ न सकी। वन विभाग के कर्मचारियों ने उसे उठाने की बहुत कोशिश की, लेकिन दोपहर करीब 1:30 बजे वत्सला ने अंतिम सांस ली।

वत्सला सिर्फ पन्ना टाइगर रिजर्व की शान नहीं थी – वह वहां आने वाले हजारों पर्यटकों की भी प्यारी थी। वह हाथियों के दल की मुखिया थी, छोटे हाथियों की मां जैसी थी और जंगल की मूक संरक्षक थी। उसकी लंबी उम्र वन विभाग की देखरेख और पन्ना के जंगलों की शांति का परिणाम थी।

आज वह हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसकी स्मृतियां हमेशा जीवित रहेंगी।" वन विभाग ने वत्सला का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया।

आज जंगल में एक सन्नाटा है – जैसे किसी बुज़ुर्ग ने चुपचाप अलविदा कह दिया हो।
वो सिर्फ एक हाथी नहीं थी बल्कि हमारे जंगलों की विरासत थी।

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