KISAN VIKAS MANCH

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तुलसी जी ऐसा औषधीय पौधा हैं जो हर सनातनी 🚩घरों में पूजा जाता हैं ।गर्मियों में, जब तापमान बहुत अधिक होता हैं, तब तुलसी क...
20/06/2025

तुलसी जी ऐसा औषधीय पौधा हैं जो हर सनातनी 🚩घरों में पूजा जाता हैं ।गर्मियों में, जब तापमान बहुत अधिक होता हैं, तब तुलसी के पौधे को सूखने से बचाने के लिए कुछ विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती हैं।

■ तुलसी के पौधे की विशेष कर गर्मियों में विशेष देखभाल :-

● तेज धूप से बचाए
तुलसी के पौधे को सीधी धूप में रखने से बचना चाहिए क्योंकि इससे पत्तियाँ झुलस सकती हैं। इसे सुबह की हल्की धूप में रखें और दोपहर की तेज धूप से बचाए। आप चाहे तो ग्रीन नेट का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

● नियमित पानी दें
गर्मियों में तुलसी को रोजाना सुबह और शाम पानी दें, लेकिन पानी जमा नहीं होने देना चाहिए। गमले के नीचे छेद होने चाहिए ताकि पानी आसानी से निकल सके।

● मिट्टी की गुड़ाई करें
गर्मियों में मिट्टी की हल्की गुड़ाई करने से पौधे को फायदा होता हैं, इसे पौधे की जड़ों में वायु का संचार बना रहता हैं।

● मल्चिंग करें
पौधे की मिट्टी की मल्चिंग (पत्तों या सूखी घास से मिट्टी की परत को ढ़कना) करें, इससे मिट्टी की नमी बनी रहती हैं और पौधा सूखने से बचा रहता हैं।

● प्राकृतिक खाद डालें
तुलसी के पौधे को हरा-भरा रखने के लिए प्राकृतिक खाद का उपयोग करें, जैसे कि गोबर की खाद, वर्मीकम्पोस्ट, चायपत्ती की खाद या छाछ। पौधे में केमिकल वाली खाद डालने से बचें।

● कीट-नियंत्रण
गर्मियों में तुलसी के पौधे पर अक्सर कीट-फंगस का अटैक देखने को मिलता हैं, इससे बचाव के लिए हल्दी, नीम का पानी या फिटकरी का उपयोग कर सकते हैं।

इन सुझावों का पालन करके आप तुलसी के पौधे को गर्मियों में भी हरा-भरा रख सकते हैं। धन्यवाद

कटहल के बारे में बहुत सी जगह पढ़ा कि ये पेड़ अशुभ हैं इसे घर में नहीं लगाना चाहिए.....  आज एक बात बताऊँ उससे ही आप समझ स...
06/06/2025

कटहल के बारे में बहुत सी जगह पढ़ा कि ये पेड़ अशुभ हैं इसे घर में नहीं लगाना चाहिए..... आज एक बात बताऊँ उससे ही आप समझ सकते हैं कि ये वृक्ष मैंने बहुत सारे प्रतिभा संपन्न लोगों के आवास में है,फिर आप ही सोचिए अशुभ कैसे ?? इसे उदाहरण समझिए ये पेड़ अशुभ नही है घर के पास ना लगाने का कारण ये है कि इस का फल भारी होता है जो आंधी आने पर चोट पहुंच सकती है दुसरा कारण ये है कि इस पर पक्षी बहुत आते है मकोड़े भी होते है और तीसरा ये कि इसकी जड़े फैलती हैं तो मकाम को कमजोर बना देती हैं औषधीय पौधा है..... कटहल की सब्जी होती भी बहुत स्वादिष्ट है।अशुभ का कोई मतलब नहीं है.... इसके पेड़ के निचे ,गर्मी के दिनो मे बट बृक्ष से अधिक ठंड मिलती है.... यह पेड़ सबसे ज्यादा काम का है. साल भर पत्ते गिरते है, मतलब साल भर पत्ते का खाद मिलता है, फल बड़ा होता है तो फूड वैल्यू ज्यादा है, फल कच्चे से पका हुआ तक खाया जाता है, पका हुआ फल कोआ निकल ने के बाद जानवरो के खाने का होता है. पेड़ बड़ा होता है तो छाया देता है, लो मेंटेनेंस पेड़ है. शायद और कोई पेड़ ऐसा हो। ★कटहल एक उष्ण कटिबन्धीय फल है, जिसे शुष्क और नम, दोनों तरह की जलवायु में उगाया जा सकता है। हमारे देश में कटहल एक सदाबहार वृक्ष माना जाता है। ★कटहल के उत्पत्ति स्थान के बारे मे कोई ठोस जानकारी नही है, पर यह माना जाता है कि कटहल की उत्पत्ति पश्चिमी घाट के वर्षा वनों में हुई है. इसकी खेती कम ऊंचाई वाले स्थानो पर सम्पूर्ण भारत, श्रीलंका एवं दक्षिणी चीन में की जाती हैं। कटहल बंग्लादेश का राष्ट्रीय फल है। ★कटहल को शाकाहारियों का मांस भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी सब्जी का स्वाद मांस की तरह होता है, साथ ही सब्जी को बनाया भी बिल्कुल मांस की त

30/04/2025

आप को लगेगा अजीब बकवास है, किन्तु यह सत्य है ,कि पृथ्वी 🌎 के त्रिदेव है — पीपल , बरगद और
———————नीम ।
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पिछले 68 सालों में पीपल, बरगद और नीम के पेडों को सरकारी स्तर पर लगाना बन्द किया गया है।

पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड का 100% एबजॉर्बर है, बरगद 80% और नीम 75 % ।

इसके बदले लोगों ने विदेशी यूकेलिप्टस को लगाना शुरू कर दिया, जो जमीन को जल विहीन कर देता है...

आज हर जगह यूकेलिप्टस, गुलमोहर और अन्य सजावटी पेड़ो ने ले ली है ।

अब जब वायुमण्डल में रिफ्रेशर ही नहीं रहेगा तो गर्मी तो बढ़ेगी ही, और जब गर्मी बढ़ेगी तो जल भाप बनकर उड़ेगा ही ।

हर 500 मीटर की दूरी पर एक पीपल का पेड़ लगायें,

तो आने वाले कुछ साल भर बाद प्रदूषण मुक्त भारत होगा । 🌳

वैसे आपको एक और जानकारी दे दी जाए ।

पीपल के पत्ते का फलक अधिक और डंठल पतला होता है, जिसकी वजह शांत मौसम में भी पत्ते हिलते रहते हैं और स्वच्छ ऑक्सीजन देते रहते हैं ।

वैसे भी पीपल को वृक्षों का राजा कहते है ।

इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए ।

मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु, सखा शंकरमेवच।

पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम, वृक्षराज नमस्तुते।।

अब करने योग्य कार्य ।

इन जीवनदायी पेड़ों को ज्यादा से ज्यादा लगाने के लिए समाज में जागरूकता बढ़ायें ।

बाग बगीचे बनाइये, पेड़ पौधे लगाइये, बगीचों को फालतू के खेल का मैदान मत बनाइये.. जैसे मनुष्य को हवा के साथ पानी की जरूरत है, वैसे ही पेड़ पौधों को भी हवा के साथ पानी की जरूरत है ।

बरगद एक लगाइये, पीपल रोपें पाँच।

घर घर नीम लगाइये, यही पुरातन साँच।।

यही पुरातन साँच, आज सब मान रहे हैं।

भाग जाय प्रदूषण सभी अब जान रहे हैं ।।
विश्वताप मिट जाये, होय हर जन मन गदगद।

धरती पर त्रिदेव हैं, नीम पीपल और बरगद।।

10/04/2025

तीन औषधियों का ये मिश्रण इन 18 असाध्य रोगों का काल है., बुढ़ापे में भी रहेगी जवानी ...।।।

बार बार रोगी उपचार हेतु एलोपैथिक चिकित्सक के पास जाता है. एलोपैथिक उपचार करवाने पर भी जब उसे स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं दिखता, वह आयुर्वेदिक उपचार की ओर मुडता है।आयुर्वेदिक उपचार करवाने के उपरांत रोगी को रोग ठीक होने का भान होता है।

तब वह यह विचार करने लगता है, कि अच्छा होता यदि मैं आरंभ से ही आयुर्वेदिक उपचार करवाता।

इसलिए ऐसा ना हो तथा हानिकारक दुष्प्रभावों से बचने के लिए, रोग के आरंभ में ही आयुर्वेदिक उपचार करवाना आवश्यक है।


इन 3 औषधियों की बहुत उपयोगी दवा बनाने के लिए आवश्यक सामग्री :

250 ग्राम मैथीदाना

100 ग्राम अजवाईन

50 ग्राम काली जीरी (ज्यादा जानकारी के लिए नीचे देखे)

तैयार करने का तरीका :

उपरोक्त तीनो चीजों को साफ-सुथरा करके हल्का-हल्का सेंकना(ज्यादा सेंकना नहीं) तीनों को अच्छी तरह मिक्स करके मिक्सर में पावडर बनाकर कांच की शीशी या बरनी में भर लेवें।

औषधि को सेवन करने का तरीका :

रात्रि को सोते समय एक चम्मच पावडर एक गिलास पूरा कुन-कुना पानी (हल्का गर्म) के साथ लेना है। गरम पानी के साथ ही लेना अत्यंत आवश्यक है लेने के बाद कुछ भी खाना पीना नहीं है। यह चूर्ण सभी उम्र के व्यक्ति ले सकतें है।

चूर्ण रोज-रोज लेने से शरीर के कोने-कोने में जमा पडी गंदगी (कचरा) मल और पेशाब द्वारा बाहर निकल जाएगी । पूरा फायदा तो 80-90 दिन में महसूस करेगें, जब फालतू चरबी गल जाएगी, नया शुद्ध खून का संचार होगा। चमड़ी की झुर्रियाॅ अपने आप दूर हो जाएगी। शरीर तेजस्वी, स्फूर्तिवाला व सुंदर बन जायेगा ।

इन 18 रोगों में फायदेमंद है :

गठिया दूर होगा और गठिया जैसा जिद्दी रोग दूर हो जायेगा।

हड्डियाँ मजबूत होगी।

आँखों रौशनी बढ़ेगी।

बालों का विकास होगा।

पुरानी कब्जियत से हमेशा के लिए मुक्ति।

शरीर में खुन दौड़ने लगेगा।

कफ से मुक्ति।

हृदय की कार्य क्षमता बढ़ेगी।

थकान नहीं रहेगी, घोड़े की तहर दौड़ते जाएगें।

स्मरण शक्ति बढ़ेगी।

स्त्री का शरीर शादी के बाद बेडोल की जगह सुंदर बनेगा।

कान का बहरापन दूर होगा।

भूतकाल में जो एलाॅपेथी दवा का साईड इफेक्ट से मुक्त होगें।

खून में सफाई और शुद्धता बढ़ेगी।

शरीर की सभी खून की नलिकाएं शुद्ध हो जाएगी।

दांत मजबूत बनेगा, इनेमल जींवत रहेगा।

शारीरिक कमजोरी दूर तो मर्दाना ताक़त बढ़ेगी।

डायबिटिज काबू में रहेगी, डायबिटीज की जो दवा लेते है वह चालू रखना है। इस चूर्ण का असर दो माह लेने के बाद से दिखने लगेगा।

जिंदगी निरोग,आनंददायक, चिंता रहित स्फूर्ति दायक और आयुष्यवर्धक बनेगी। जीवन जीने योग्य बनेगा।

कृपया ध्यान दे :

कुछ लोग कलौंजी को काली जीरी समझ रहे है जो कि गलत है काली जीरी अलग होती है जो आपको पंसारी या आयुर्वेद की दुकान से मिल जाएगी, यह स्वाद में हल्की कड़वी होती है, नीचे जो फोटो है वो कालीजीरी (Purple Fleabane) का है, जिसका नाम अलग-अलग भाषाओं में कुछ इस तरह से है।

हिन्दी कालीजीरी, करजीरा।

संस्कृत अरण्यजीरक, कटुजीरक, बृहस्पाती।

मराठी कडूकारेलें, कडूजीरें।

गुजराती कडबुंजीरू, कालीजीरी।

बंगाली बनजीरा।

अंग्रेजी पर्पल फ्लीबेन

कालीजीरी -

कालीजीरी को आयुर्वेद में सोमराजि, सोमराज, वनजीरक, तिक्तजीरक, अरण्यजीरक, कृष्णफल आदि नाम से जानते हैं। हिंदी भाषा में इसे कालीजीरी, बाकची और बंगाल में सोमराजी कहते हैं।

कालीजीरी किसी भी तरह के जीरे से अलग है। इंग्लिश में इसे पर्पल फ़्लीबेन कहते हैं पर यह कलोंजी Nigella sativa से बिल्कुल भिन्न है। कलोंजी को भी इंग्लिश में ब्लैक क्यूमिन ही कहते है। इसी प्रकार बाकची, या सोमराजी एक और पौधे के बीज को, सोरेला कोरीलिफ़ोलिया (Psoralea corylifolia) को कहते है।

आयुर्वेद के बहुत से विशेषज्ञ सोरेला कोरीलिफ़ोलिया को ही बावची या सोमराजी मानते हैं पर बंगाल में कालीजीरी को सोमराजी नाम से जानते और प्रयोग करते हैं।

कालीजीरी स्वाद में कड़वा और तेज गंद्ध वाला होता है, इसलिए इसे किसी भी तरह के भोजन बनाने में प्रयोग नहीं किया जाता। इसको केवल एक दवा की तरह ही प्रयोग किया जाता है। लैटिन में इसका नाम, सेंट्राथरम ऐनथेलमिंटिकम या वरनोनिया ऐनथेलमिंटिकम है।

इसके वैज्ञानिक नाम में 'ऐनथेलमिंटिकम' इसके प्रमुख आयुर्वेदिक प्रयोग को बताता है। ऐनथेलमिंटिकम का मतलब है, शरीर से परजीवियों को नष्ट करने वाला। आयुर्वेद में इसे कृमिनाशक की तरह प्रयोग किया जाता है।

इसका सेवन और बाह्य प्रयोग चर्म रोगों के इलाज, जैसे की श्वित्र (leukoderma) सफ़ेद दाग, खुजली, एक्जिमा, आदि। इसे सांप या बिच्छु के काटे पर भी लगाते हैं। कालीजीरी का क्षुप, पूरे देश में परती जमीन पर पाया जाता है। इसके पत्ते शल्याकृति किनारेदार होते हैं। बारिश के मौसम के बाद इसमें मंजरी निकलती है। जिसमे काले बीज आते है।

काली जीरी आकार में छोटी और स्वाद में तेज, तीखी होती है। इसका फल कडुवा होता है। यह पौष्टिक एवं उष्ण वीर्य होता है। यह कफ, वात को नष्ट करती है और मन व मस्तिष्क को उत्तेजित करती है। इसके प्रयोग से पेट के कीड़े नष्ट होते हैं और खून साफ होता है। त्वचा की खुजली और उल्टी में भी इसका प्रयोग लाभप्रद होता है।

यह त्वचा के रोगों को दूर करता है, पेशाब को लाता है एवं गर्भाशय को साफ व स्वस्थ बनाता है। यह सफेद दाग (कुष्ठ) को दूर करने वाली, घाव और बुखार को नष्ट करने वाली होती है। सांप या अन्य विषैले जीव के डंक लगने पर भी इसका प्रयोग लाभकारी होता है।

कालीजीरी के 13 फायदे :

यह कृमिनाशक और विरेचक है।

यह गर्म तासीर के कारण श्वास, कफ रोगों को दूर करती है।

मूत्रल होने के कारण यह मूत्राशय, की दिक्कतों और ब्लड प्रेशर को कम करती है।

यह हिचकी को दूर करती है।

यह एंटीसेप्टिक है चमड़ी की बिमारियों जैसे की खुजली, सूजन, घाव, सफ़ेद रोग, आदि सभी में बाह्य रूप से लगाई जाती है।

जंतुघ्न होने के कारण शरीर के सभी प्रकार के परजीवियों को दूर करती है।

काली जीरी को चमड़ी के रोगों में नीम के काढ़े के साथ मालिश या खादिर के काढ़े के आंतरिक प्रयोग के साथ करना चाहिए।

भयंकर चमड़ी रोगों में, काली जीरी + काले तिल बराबर की मात्रा में लेकर, पीस कर 4 ग्राम की मात्रा में सुबह, एक्सरसाइज की बाद पसीना आना पर लेना चाहिए। ऐसा साल भर करना चाहिए।

श्वेत कुष्ठ जिसे सफ़ेद दागभी कहते है, उसमे चार भाग काले जीरी और एक भाग हरताल को गोमूत्र में पीसकर प्रभावित स्थान पर लगाना चाहिए। इसी को काले तिलों के साथ खाने को भी कहा गया है। (भैषज्य रत्नावली)

पाइल्स या बवासीर में, 5 ग्राम कालाजीरालेकर उसमे से आधा भून कर और आधा कच्चा पीसकर, पाउडर बनाकर तीन हस्से कर के दिन में तीन बार खाने से दोनों तरह की बवासीर खूनी और बादी में लाभ होता है।

पेट के कीड़ों में इसके तीन ग्राम पाउडर को अरंडी के तेल के साथ लेना चाहिए।

खुजली में, सोमराजी + कासमर्द + पंवाड़ के बीज + हल्दी + दारुहल्दी + सेंधा नमक को बराबर मात्रा में मिलकर, कांजी में पीसकर लेप लगाने से कंडू, कच्छु (खुजली) आदि दूर होते हैं।

कुष्ठ में, कालीजीरी + वायविडंग + सेंधानमक + सरसों + करंज + हल्दी को गोमूत्र में पीस कर लगना चाहिए।

कालीजीरी के सेवन की मात्रा :

इसको 1-3 ग्राम की मात्रा में लें। इससे अधिक मात्रा प्रयोग न करें।

आवश्यक सावधानियाँ :

कृमिनाशक की तरह प्रयोग करते समय किसी विरेचक का प्रयोग करना चाहिए।

कालीजीरी के प्रयोग में सावधानियां

यह बहुत उष्ण-उग्र दवा है।

गर्भावस्था में इसे प्रयोग न करें।

यह वमनकारक है।

अधिक मात्रा में इसका सेवन आँतों को नुकसान पहुंचाता है।

यदि इसके प्रयोग के बाद साइड इफ़ेक्ट हों तो गाय का दूध / ताजे आंवले का रस / आंवले
का सेवन करें ।
सधन्यवाद!

01/03/2025

#गाय_का_घी
बचपन में यह नहीं पता था कि गाय का घी इतना महत्वपूर्ण क्यों है पर इतना जरूर पता था जब सर्दी खांसी जुकाम और बुखार छूटने का नाम नहीं लेता था तब बच्चों को पुराने गाय के घी का लेप छाती में और माथे पर लगाया जाता था यह हमारे देसी जुगाड़ का हिस्सा था एक परंपरा थी एक विरासत थी जो वर्षों से चली आ रही थी हर एक घर में कई वर्ष पुराना गाय का घी सुरक्षित करके दवा के रूप में रखा जाता था और यह कारगर दवा भी थी। बचपन में गाय के साथ धार्मिक आस्था ज्योति चली गई क्योंकि गाय के गोबर से ही घर आंगन लीपा जाता था जिसकी खुशबू आज भी महसूस होते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं गाय के गोबर से जैसे ही आंगन लिप पूत गया समझ में आ जाता था की पूजा पाठ है या फिर पर्व त्यौहार या कोई शुभ कार्य होने वाला है। घर में जब कोई पूजा पाठ का आरंभ हुआ तो प्रथम आदि देव गणपति गोबर से ही बनाए गए दूर अक्षत चंदन से उनका अभिषेक हुआ माता लक्ष्मी भी गोबर स्वरूप में ही विराजी। उम्र के साथ तजुर्बा बढ़ा तो समझ में आया कि सिर्फ गाय का घी दूध ही नहीं बल्कि गाय का गोबर और मूत्र तक औषधि है।गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है । नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तरोताजा हो जाता है । गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बाहर निकल कर चेतना वापस लौट आती है। गाय का घी नाक में डालने से बाल झड़ना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते हैं। गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है। हाथ-पैर में जलन होने पर गाय के घी को तलवों में मालिश करें, जलन ठीक होता है। हिचकी के न रुकने पर खाली पेट गाय का आधा चम्मच घी खाएं, हिचकी स्वयं रुक जाएगी। गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है। गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है। गाय के पुराने घी से बच्चों को छाती और पीठ पर मालिश करने से कफ की शिकायत दूर हो जाती है। अगर अधिक कमजोरी लगे, तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें। गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है, इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है। गाय का शुद्ध घी वह होता है जो गाय के दही को मथ कर उसके क्रीम से तैयार किया जाता है। गाय की घी की खासियत है कि उसका सुगंध दूर से ही आपको अपनी ओर आकर्षित कर लेगा। जानकार बताते हैं की गाय के घी का दिया जलाने से घी के औषधि गुण का प्रसार होता है जिससे रोगरोधी वातावरण तैयार हो जाता है।

24/02/2025

मूल रूप से, खाद बनाने का मतलब है जैविक पदार्थ को ऐसे रूप में तोड़ना जिसे पौधे आसानी से इस्तेमाल कर सकें। विघटित पदार्थ में धीरे-धीरे निकलने वाले पोषक तत्व होते हैं, जो आपके पौधों को उनकी ज़रूरत के हिसाब से, जब भी ज़रूरत हो, नियमित आहार देते हैं। खाद मिट्टी की संरचना में भी सुधार कर सकती है, जिससे भारी मिट्टी की जल निकासी बेहतर होती है और रेतीली मिट्टी पानी को ज़्यादा प्रभावी ढंग से बनाए रखती है।

सरल विधि: कम्पोस्ट बनाना आसान बना दिया गया

बागवानी मंचों पर आपको जो कुछ भी मिल सकता है, उसके विपरीत, खाद बनाना जटिल नहीं है। यहाँ एक सरल तरीका बताया गया है जो कारगर साबित हुआ है:

चार आवश्यक तत्व : सफल खाद बनाने के लिए, आपको नाइट्रोजन के लिए हरी सामग्री (जैसे रसोई के कचरे और घास की कतरन) और कार्बन, नमी और हवा के लिए भूरे रंग की सामग्री (जैसे कार्डबोर्ड और सूखे पत्ते) की आवश्यकता होती है। ये तत्व लाभकारी बैक्टीरिया को आमंत्रित करते हैं, जो सामग्री को तोड़ने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
क्या शामिल करें : पौधों से रसोई के अवशेष (जैसे फलों के छिलके और सब्जियों के बचे हुए टुकड़े) बहुत अच्छे होते हैं। घास की कतरनें आपके खाद को नाइट्रोजन से भर देती हैं। कॉफी के अवशेष भी एक बढ़िया अतिरिक्त हो सकते हैं। जब भूरे रंग की सामग्री की बात आती है, तो कटे हुए अख़बार, पेंट या टेप के बिना कार्डबोर्ड और चूरा जैसी चीज़ों के बारे में सोचें।
क्या न करें : चमकदार कागज़ और रसायन युक्त सामग्री से दूर रहें। साथ ही, मांस और पनीर जैसी गैर-पौधे आधारित वस्तुओं से भी बचें, क्योंकि वे अवांछित कीटों को आकर्षित कर सकते हैं और उन्हें सड़ने में अधिक समय लगता है।
अपना ढेर बनाना : भूरे और हरे रंग की सामग्री की परतें बनाकर शुरुआत करें। सटीक अनुपात के बारे में ज़्यादा चिंता न करें; मात्रा के हिसाब से 50/50 का मिश्रण एक अच्छा शुरुआती बिंदु है। ढेर को नम रखना याद रखें (जैसे निचोड़ा हुआ स्पंज) और हवा आने देने और सामग्री को आपस में चिपकने से रोकने के लिए इसे नियमित रूप से पलटते रहें।
स्थान और प्रबंधन : यदि संभव हो, तो अपने खाद के ढेर को सीधे ज़मीन पर रखें ताकि कीड़े और अन्य लाभकारी जीव विघटन प्रक्रिया में भाग ले सकें। कई ढेरों का प्रबंधन करना मददगार हो सकता है – एक नई सामग्री जोड़ने के लिए, दूसरा जो सड़ रहा है, और तीसरा जो उपयोग के लिए तैयार है।
खाद बनाने की यात्रा: धैर्य और अवलोकन

खाद बनाना एक सतत प्रक्रिया है जिसके लिए धैर्य और थोड़े से परीक्षण और त्रुटि की आवश्यकता होती है। सब कुछ सही करने के बारे में तनाव न लें। प्रकृति के पास समय के साथ चीजों को संतुलित करने का एक तरीका है। नियमित रूप से अपने खाद को पलटें और देखें कि यह कैसे बदलता है। अपनी हरी और भूरी सामग्री को आवश्यकतानुसार समायोजित करें, और सुनिश्चित करें कि ढेर नम रहे लेकिन पानी भरा न हो।

पुरस्कार: समृद्ध, पौष्टिक खाद

समय के साथ, आपका ढेर गहरे रंग की, भुरभुरी, मिट्टी की महक वाली खाद में बदल जाएगा – जो आपके बगीचे के लिए एकदम सही भोजन है। यह एक ऐसी प्रक्रिया का संतोषजनक निष्कर्ष है जो न केवल आपके पौधों को लाभ पहुँचाती है बल्कि जैविक कचरे को रिसाइकिल करके पर्यावरण में भी सकारात्मक योगदान देती है।

🌷🌷सहजन: (मुनगा फली) की विशेषताएं 🌷🌷--------🍁🍁कलयुग का अमृत सहजन के फूल🍁🍁सहजन एक बहुउपयोगी पेड़ है. इसे हिन्दी में बोलचाल...
24/02/2025

🌷🌷सहजन: (मुनगा फली) की विशेषताएं 🌷🌷
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🍁🍁कलयुग का अमृत सहजन के फूल🍁🍁

सहजन एक बहुउपयोगी पेड़ है. इसे हिन्दी में बोलचाल में मुनगा फली का वृक्ष कहते हैं।
सहजन के फूल खाने के कई स्वास्थ्य लाभ होते हैं। इनमें एंटीऑक्सिडेंट्स, विटामिन्स और खनिजों का समृद्ध स्रोत होते हैं, जो शरीर को ऊर्जावान और ताजगी बनाए रखते हैं। सहजन के फूलों में सूजन को कम करने, हड्डियों की मजबूती बढ़ाने और इम्यून सिस्टम को मजबूत करने की क्षमता होती है। ये फूल पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में भी मदद करते हैं और कब्ज की समस्या को दूर करते हैं।

इसके अलावा, सहजन के फूलों का सेवन ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है, जिससे डायबिटीज़ के रोगियों के लिए यह फायदेमंद है। यह त्वचा की समस्याओं जैसे दाने और मुहांसों को भी दूर करता है और शरीर में रक्त की सफाई में मदद करता है। सहजन के फूलों का सेवन शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में सहायक होता है।

सहजन के फूल का सेवन विभिन्न रूपों में किया जा सकता है, जैसे कि सूप, सब्जी और चाय में।

सहजन के फूल की सूप 👇👇
सहजन के फूल का सूप बनाने के लिए सबसे पहले सहजन के ताजे फूलों को अच्छे से धोकर साफ करें। फिर एक पैन में थोड़ा तेल गर्म करें और उसमें एक बारीक कटी हुई प्याज, लहसुन, और अदरक डालकर भूनें। अब इसमें सहजन के फूल, एक कप पानी, नमक, और मिर्च डालें। उबालने के बाद, सूप को 5-7 मिनट तक पकने दें। फिर इसे छानकर गर्मागरम सर्व करें। आप चाहें तो इसमें नींबू का रस और हरा धनिया डालकर स्वाद बढ़ा सकते हैं।

सहजन के फूल की सब्जी 👇 👇
सहजन के फूल की सब्जी बनाने के लिए सबसे पहले ताजे सहजन के फूलों को अच्छे से धोकर साफ करें। फिर एक पैन में तेल गर्म करके उसमें जीरा, हींग, और बारीक कटा हुआ प्याज डालकर भूनें। अब उसमें टमाटर, हल्दी, धनिया पाउडर, और मिर्च पाउडर डालें। फिर इसमें सहजन के फूल डालकर अच्छे से मिला लें और थोड़ा पानी डालकर 5-10 मिनट तक पकने दें। स्वाद के अनुसार नमक डालें। आखिर में हरा धनिया डालकर गरमागरम सर्व करें। यह पौष्टिक और स्वादिष्ट सब्जी है।

सहजन के फूल की चाय 👇👇
सहजन के फूल की चाय बनाने के लिए सबसे पहले ताजे सहजन के फूलों को धोकर एक कप पानी में डालें। अब इसमें अदरक और इलायची डालकर उबालें। 5-7 मिनट तक उबालने के बाद चाय को छान लें। स्वाद अनुसार शहद या नींबू मिला सकते हैं। यह चाय शरीर को ताजगी और ऊर्जा देती है।
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🍁सहजन: (मुनगा फली) की विशेषताएं 🍁
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सहजन एक बहुउपयोगी पेड़ है. इसे हिन्दी में बोलचाल में मुनगा फली का वृक्ष कहते हैं।

मोरिंगा ओलिफ़ेरा (Moringa oleifera) के नाम से भी जाना जाता है. यह भारतीय उपमहाद्वीप का मूल पेड़ है. सहजन की पत्तियां और फलियां सब्ज़ी के रूप में इस्तेमाल की जाती हैं. इसके अलावा, सहजन के बीज से तेल निकाला जाता है और छाल, पत्ती, गोंद, और जड़ से दवाएं तैयार की जाती हैं. ।

इसका पौधा लगभग १० मीटर उँचाई वाला होता है किन्तु लोग इसे डेढ़-दो मीटर की ऊँचाई से प्रतिवर्ष काट देते हैं ताकि इसके फल-फूल-पत्तियों तक हाथ सरलता से पहुँच सके। इसके कच्ची-हरी फलियाँ सर्वाधिक उपयोग में लायी जातीं हैं।

सहजन (Drumstick tree) एक एक बहुत उपयोगी पेड़ है। इसे हिन्दी में सहजना, सुजना, सेंजन और मुनगा आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका वनस्पति वैज्ञानिक नाम "मोरिंगा ओलिफेरा" ( Moringa oleifera ) है। इस पेड़ के विभिन्न भाग अनेकानेक पोषक तत्वों से भरपूर पाये गये हैं इसलिये इसके विभिन्न भागों का विविध प्रकार से उपयोग किया जाता है।
सहजन के पेड़ अधिकतर हिमालय के तराई वाले जंगलों में ज्यादा पायें जाते हैं। सहजन के पेड़ छोटे या मध्यम आकार के होते हैं। इसकी छाल और लकड़ी कोमल होती है। सहजन के पेड़ की टहनी बहुत ही नाजुक होती है जो बहुत जल्दी टूट जाती है। इसके पत्ते 6-9 जोड़े में होते हैं। फलियां 6-18 इंच लम्बी 6 शिराओं से युक्त और धूसर होती हैं। सहजन के पेड़ तीन प्रकार के होते हैं जिन पर लाल, काले और सफेद फूल खिलते हैं। लाल रंग के फूल वाले पेड़ की सब्जी खाने में मीठी और सफेद रंग के फूल वाले पेड़ की सब्जी कटु होती है।

तासीर : सहजन का स्वभाव गर्म होता है।

विभिन्न भाषाओं में सहजन के नाम :

हिन्दी: सहजन।
संस्कृत: शोभानजना।
अंग्रेजी Horse radish tree, Drum stick plant.
राजस्थान :सेनणा, सहजन।
पंजाबी : शुभांजना।
बंगाली :सजीना।
तेलगु: शोरगी।
मराठी:शोरगी।
गुजराती - सरगवो या मोरिंगा

गुण : सहजन का प्रयोग दर्द निवारक दवा बनाने में किया जाता है। इसके फूल और फलियों की सब्जी बनाकर खाते हैं। सहजन की पत्तियों में विटामीन `ए` व `सी` कैरोटिन और एस्कॉर्बिक एसिड के रूप में बहुत मिलता है। इसकी 100 ग्राम पत्तियों में लगभग 7 ग्राम कैरोटिन होता है, जिसे हमारा शरीर विटामिन `ए` में बदल देता है, जो आंखों के रोगों के लिए जरूरी होता है। इसकी मुलायम हरी पत्तियों की सब्जी बनाकर सेवन कर सकते हैं। इसकी पत्तियों को दूसरी सब्जी के साथ मिलाकर भी पका सकते हैं। इसकी सब्जी खाने की ओर कम लोगों का ध्यान जाता है, लेकिन इसके गुण देखते हुए इसकी सब्जी अधिक खानी चाहिए।

यह चटपटा, गर्म, मीठा, हल्का, जलन को शांत करता है, भूख को बढ़ाता है, बलगम को नष्ट करता है, वातनाशक, वीर्यवर्धक, फोड़े-फुंसी को खत्म करता है, गण्डमाला, गुल्म, प्लीहा तथा विद्रधि नाशक है तथा दस्त अधिक लाता है, सहजन के बीज आंखों के लिए लाभकारी तथा सिरदर्द दूर करने वाला है।
इसकी शाखा की एक बहुत अच्छी खासियत है कि इसे जमीन में गाड़ दिया जाये तो इसका पेड़ उग जाता है।

सहजन (मोरिंगा) के कई फ़ायदे हैं, लेकिन इसका सेवन ज़रूरी मात्रा में ही करना चाहिए. सहजन के सेवन से जुड़ी कुछ खास बातेंः

सहजन तेज़ी से बढ़ने वाला पेड़ है और सूखे से प्रभावित नहीं होता.
सहजन के पेड़ की छंटाई कम करनी होती है.
सहजन के पेड़ की फली, फूल, और टहनियों का इस्तेमाल कई तरह से किया जाता है.
सहजन की पत्तियों में कई पोषक तत्व होते हैं.
सहजन की फली में प्रोटीन और विटामिन जैसे पोषक तत्व होते हैं.
सहजन की सब्ज़ी खाने से डायबिटीज़ कंट्रोल में रहता है और वज़न भी कम होता है.
सहजन की फली के अचार और चटनी कई बीमारियों से राहत दिलाने में मदद करती है.

सहजन की पत्तियों में विटामिन सी, कैल्शियम, मैग्नीशियम, और फ़ॉस्फ़ोरस होता है.
सहजन की पत्तियों में ओमेगा-3 फैटी एसिड और पोटैशियम भी होता है.
सहजन की पत्तियों का सेवन करने से इम्यूनिटी मज़बूत होती है.
सहजन की पत्तियों का सेवन करने से हड्डियां मज़बूत होती हैं.
सहजन की पत्तियों का सेवन करने से वज़न घटाने में मदद मिलती है.
सहजन की पत्तियों का सेवन करने से हृदय स्वास्थ्य बेहतर होता है.
सहजन की पत्तियों का सेवन करने से त्वचा से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं.
सहजन की पत्तियों का सेवन करने से बालों का झड़ना कम होता है.
सहजन की पत्तियों का सेवन करने से लिवर को बीमारियों से बचावा होता है.

सहजन के सेवन से जुड़ी सावधानियांः
गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को सहजन का ज़्यादा सेवन नहीं करना चाहिए.
सहजन की तासीर गर्म होती है, इसलिए एसिडिटी, ब्लीडिंग, पाइल्स, मुंहासे वाले लोगों को गर्मियों में इसका सेवन नहीं करना चाहिए ।

ज्वार, बाजरा, रागी,सावां, कंगनी, चीना, कोदो, कुटकी और कुट्टू को मोटा अनाज कहा जाता है। मोटे अनाज की रोटी न केवल स्वादिष्...
08/02/2025

ज्वार, बाजरा, रागी,सावां, कंगनी, चीना, कोदो, कुटकी और कुट्टू को मोटा अनाज कहा जाता है। मोटे अनाज की रोटी न केवल स्वादिष्ट होती है, बल्कि यह सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद होती है।

1. *बाजरे की रोटी*: राजस्थान में बहुत लोकप्रिय, बाजरे की रोटी गर्मी देती है और मैग्नीशियम, कैल्शियम जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होती है।

2. *मक्के की रोटी*: पंजाब में बहुत पसंद की जाने वाली, मक्के की रोटी शुगर वालों के लिए बहुत फायदेमंद होती है।

3. *जौ की रोटी*: यूपी और बिहार में बहुत लोकप्रिय, जौ की रोटी फाइबर से भरपूर होती है और पाचन में मदद करती है।

4. *चने की रोटी*: प्रोटीन से भरपूर, चने की रोटी शाकाहारियों के लिए एक अच्छा विकल्प है।

5. *ज्वार की रोटी*: महाराष्ट्र में बहुत लोकप्रिय, ज्वार की रोटी फाइबर और प्रोटीन से भरपूर होती है।

इन मोटे अनाजों की रोटी को अपने आहार में शामिल करने से न केवल आपको स्वादिष्ट विकल्प मिलेंगे, बल्कि आपकी सेहत भी अच्छी रहेगी।
मोटे अनाज में कई पोषक तत्व होते हैं और इनके कई फ़ायदे हैं:
मोटे अनाज में गेहूं और चावल की तुलना में साढ़े तीन गुना ज़्यादा पोषक तत्व होते हैं.
मोटे अनाज में खनिज लवण भी भरपूर मात्रा में होते हैं.
मोटे अनाज शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत करते हैं.
मोटे अनाज खून की कमी को पूरा करते हैं.
मोटे अनाज मधुमेह को रोकते हैं.
मोटे अनाज गर्भवती महिलाओं और शिशुओं के लिए भी फ़ायदेमंद होते हैं.
मोटे अनाज में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम होती है, जो हाई बीपी और दिल से जुड़ी समस्याओं का खतरा कम करने में मदद करती है.
मोटे अनाज में मौजूद फाइबर पेट को लंबे समय तक भरकर रखते हैं.
मोटे अनाज तासीर में गर्म होते हैं, जिससे सर्दियों में शरीर को गर्माहट मिलती है.

ज्वार, बाजरा, रागी, सावां, कंगनी, चीना, कोदो, कुटकी, और कुट्टू को अपनी रोटी में जरूर शामिल कीजिए।🙏

बुजुर्ग प्याज को फोड़ कर ही क्यों खाते थे...क्या आपने कभी खुद से सवाल किया है कि सारे औजार होने के बावजूद हमारे बुजुर्ग ...
02/02/2025

बुजुर्ग प्याज को फोड़ कर ही क्यों खाते थे...
क्या आपने कभी खुद से सवाल किया है कि सारे औजार होने के बावजूद हमारे बुजुर्ग प्याज को फोड़ कर ही क्यों खाते थे, काट कर क्यों नहीं खाते थे।तो उसका उत्तर इस प्रकार है ....
प्याज पिछले 5000 साल से भारत भर में व आजकल सारे विश्व में उगाया व खाया जाता है। प्याज के काटने पर जितनी तेजी से उस में पाये जाने वाले पदार्थ रासायनिक क्रिया करते हैं उतने किसी अन्य खाद्य पदार्थ के नहीं करते।प्याज में सल्फर की मात्रा अधिक होती है अतः रासायनिक प्रक्रिया का जो अंतिम उत्पाद बनता है वो होता है सल्फ्युरिक अम्ल (H2SO4), यह अम्ल एक्वा रिजिया के बाद पाया जाने वाला सबसे शक्तिशाली अम्ल होता है जो सोने व प्लेटिनम को छोड़ किसी भी धातु के साथ क्रिया कर उसे नष्ट कर सकता है।दूसरी बात प्याज की हर परत पर ऊपर व नीचे एक झिल्ली होती है यो कि अपाच्य होती है। वह झिल्ली फोड़ने से ही अलग हो पाती है, काटने पर वह साथ में कट जाती है। इसलिए प्याज को किसी भी धातु से काटना उचित नहीं है। खुद को आधुनिक दिखाने के लिए इसे काटकर नहीं फोड़ कर खाना चाहिए। आप भी आगे से ऐसा ही कीजिये। यह सल्फर युक्त पदार्थ गंठे (प्याज) की ऊपरी परतों में सबसे ज्यादा होता है तथा बीच में नाम मात्र का होता है। Wageningen विश्वविद्यालय, नीदरलैंड्स की खोज के अनुसार गंठे (प्याज) के बीच में पाये जाने वाला quercetin बहुत ही प्रभावी ऐंटिऑक्सिडेंट है जो कि जवानी को बरकरार रखता है।तथा विटामिन ई का मुख्य स्त्रोत है। वैसे तो यह पदार्थ चाय व सेब में भी पाया जाता है लेकिन गंठे (प्याज) के बीच में पाया जाने वाला पदार्थ चाय के पदार्थ से दो गुणा व सेब में पाये जाने वाले इसी पदार्थ से तीन गुणा जल्दी हजम होता है। 100 ग्राम गंठे (प्याज) में यह 22.40 से 51.82 मिलीग्राम तक होता है। Bern विश्वविद्यालय स्वीट्जरलैंड ने चूहों को प्रति दिन एक ग्राम प्याज खिलाया तो उन की हड्डी 17% तक मजबूत हो गई। प्याज का बीच वाला हिस्सा पेट का अल्सर व सभी प्रकार के हृदय रोगों को ठीक करती है। गंठे (प्याज) व इसके बीच के हिस्से पर एक पूरी किताब लिखी जा सकती है लेकिन आज के लिए बस इतना ही।
तो दोस्तों प्याज को कभी भी काटकर सलाद बनाकर ना खाएं। उसको मुक्का मारकर, या किसी चीज से फोड़कर खाए इससे आपको काफी हेल्थ बेनिफिट होंगे और आंसू भी नहीं आएंगे।
हमारे बुजुर्ग प्याज को फोड़कर ही खाते थे या फिर खेत से डायरेक्ट हरे पत्ते वाला प्याज लेते थे और बिना फोड़े ही डायरेक्ट खाते थे, जैसे आप सेब और अमरूद खाते थे।

क्यो भागते हो प्रोटीन के पीछे, जब नेचर साथ है तो...प्रोटीन का खजाना, फ्री में है पाना तो, सेम की एक बेल लगा ही लो। इसके ...
01/02/2025

क्यो भागते हो प्रोटीन के पीछे, जब नेचर साथ है तो...
प्रोटीन का खजाना, फ्री में है पाना तो, सेम की एक बेल लगा ही लो। इसके बीज व फल दोनो मजेदार हैं।
और ये बात समझ न आये तो फिर ले आइयेगा हजारों रुपयों वाला प्रोटीन पाउडर, जिसमे लिखा होगा। प्रोटीन....

आइये लौटिये, प्रकृति के साथ मेरी पोस्ट पर। वैसे तो सेम दाल परिवार का सदस्य होने के नाते प्रोटीन से भरपूर होता ही है लेकिन प्रोटीन के अलावा कई सूक्ष्म और वृहद पोषक तत्व भी इनमें दबाके पाये जाते हैं। हमारे पातालकोट सहित कई जंगली इलाको में ये ठंड के मौसम में सब्जी का स्त्रोत होते हैं तो वहीं साल भर दाल का। एक कमाल की बात बताऊं न तो इसे लगाने के लिए बहुत अधिक सिंचाई की आवश्यकता है और न ही इसमी कभी रासायनिक खाद या कीटनाशक के प्रयोग की आवश्यकता पड़ती है। हाँ अधिक उत्पादन का लालच जब इसमें शामिल हो जाती है तो फिर क्या सही और क्या गलत।
पातालकोट अपने आपमें प्राकृतिक और मिश्रित खेती का श्रेष्ठम मॉडल है, हालांकि इसके बाबजूद इसका नाम, इस मामले में दुनिया की किसी किताब में नही मिलेगा। गुरूदेव डॉ. Deepak Acharya के साथ मैंने इस मॉडल का खूब दर्शन किया है। गुरूदेव ने बताया था कि दुनिया के कई देशों में भी ठीक यही पैटर्न है विकास। न जाने इनका व्यवहारिक ज्ञान इतनी दूरियों और विविधता के बाद एक ही पॉइंट पर आकर कैसे मिल जाता है, यह सोचने वाली बात है।

असल मे पातालकोट में मक्के की फसल के साथ ही सेम, बल्हर, पोपट, तेवड़ा, चौड़ा, आदि के बीज बो दिये जाते हैं। मक्के की फसल से मक्का तोड़ने के बाद मक्के के ठूठ इन सेम परिवार के सदस्यों के लिए आधार का काम करते हैं। इनसे जब चाहे तब ताजी फलियाँ तोड़ ली जाती हैं। और जितने की आवश्यकता नही होती वे पेड़ पर लगी लगी सूख जाती हैं। आखिर में सूखी फलियाँ तोड़ कर साबुत रख ली जाती है। और इनसे भी जब आवश्यकता हो तब बीज निकालकर दाल दर ली जाती है।
अब सोचने और समझने वाली बात यह है कि ये लोग खेतो में सिंचाई क्यो नही करते, तो इसका जबाब है कि अभी तक इनखे पास सिंचाई की सुविधा नही है, और इनका मानना है कि खेती लायक पानी भगवान खुद बरसा देते हैं। दूसरा कि खाद क्यो नही डालते तो इसका उत्तर है कि ये दाल परिवार के सदस्य नाइट्रोजन फिक्सेशन की क्षमता रखते हैं तो स्वयं खुद के लिए और दूसरी फसल के लिए खाद तैयार कर देते हैं। तीसरा की सेमी की फसल के बाद मक्के की ठूठ खेत के लिए परेशानी बन जाता होगा तो नही। क्योंकि ये सूखी लतायें और मक्के के पेड़ गाय बेलों के लिए उस समय चारा बन जाता है जब जंगलों से भी घास पूरी तरह सूखकर समाप्त होने को आती है। जब ये पशु खेत पर चरने आते हैं तब वही गोबर त्याग कर देते हैं और अपने चारे की कीमत किसान को दे जाते हैं। है ना गजब का संतुलन? जल्द ही पातालकोट से बल्हर और पोपट लेकर आपके समक्ष आऊँगा तब तक गाँव मे मेरी बेटी और मेरी मेहनत से तोड़ी गई काली/ जामुनी सेम से काम चलाइये।

इस मौसम की अपने बगीचे वाली पहली सेम तोड़ने का मजा ही कुछ खास है। दाल परिवार का यह सदस्य प्रोटीन भंडार होने के साथ साथ एक स्वादिष्ट सब्जी भी है। इसे खिचड़ी, पुलाव, फ्राय चावल, मिक्स वेज, सांभर व भाजी बड़े आदि में भी खूब प्रयोग किया जाता है। जिसमे इसके कोमल फल व बीज शामिल होते हैं। इसकी फलियाँ हरी सब्जियों में शामिल हैं जबकि बीजो से भी कई तरह के व्यंजन बनाये जाते हैं।
वैसे तो सेम की भी कई प्रजातियां हैं लेकिन पांढुर्ना (म. प्र. का मराठी भाषी क्षेत्र) जाने के पहले में तो सभी को सेम ही कहता था, किन्तु वहां जाने के बाद पता चला कि इनके आकार, रंग, बीजो का आकार, आकृति, रंग आदि के आधार पर इनके नाम, स्वाद व बनाने के तरीके भी अलग अलग हैं। #बालोरफली, #बाला_च_सेंग, #कुलथी, #पोपट, #बल्लहर, #दूध_मोंगरा, महा सेंग जैसे कई नाम हैं इनके। Medisnal herbs organic
कुछ प्रकार की बीन्स के तो केवल बीज ही सब्जियों की तरह प्रयोग किये जाते हैं। जिनसे स्वादिष्ट #महाराष्ट्रीयन_व्यंजन बनाये जाते हैं। में जब लावाघोघरी- सांवरी क्ष्रेत्र में था तब वहाँ पोपट और बल्लहर के बीजों को उबालकर या सीधे ही फ्राय करके नास्ते में परोसने का चलन था। मध्यप्रदेश के पचमढ़ी में लगने वाले नागद्वार मेले में भी आपको बल्हर और पोपट के उबाले बीज ताजी कटी प्याज, हरी मिर्च और नींबू के साथ पलाश के पत्तों में बेचते हुये वनवासी बंधु मिल जायेंगे। इस पोस्ट को आप सबका स्नेह मिला तो इन सभी व्यंजनो की सीरीज जल्द ही तैयार करूँगा।
वैसे मेरी लिस्ट और पसंद में सभी क्षेत्रों का अनुभव शामिल है। तो आज इस काली सेम की सब्जी का आनंद उठाया जाएगा।

09/03/2024

यूरिया का विकल्प दही.... यूरिया का एक बैग मतलब 50 किलो इस की जगह देशी गाय के 2 किलो दूध का दही बना कर एक तांबे का टुकड़ा 15 दिन दही में डूबो कर रखें। इस के बाद उस दही को पानी के साथ मिला कर एक एकड़ में छिड़काव करें। इस दही के छिड़काव से पौधा सतत् 45 दिन तक हरा-भरा रहेगा। यूरिया से केवल 25 दिन पौधा हरा-भरा रहेगा। 50 किलो यूरिया से 2 किलो दही की शक्ति ज्यादा होने से बहुत फायदा होगा और खर्च भी कम होगा। गौ माता का महत्व भी बढ़ेगा। ज्यादा से ज्यादा किसानों तक ये जानकारी पहुँचाएं। पहले खुद प्रयोग करें फिर अपने अनुभव शेयर करें। पूरा सिक्किम राज्य देशी गाय के दूध के दही का उपयोग बहुत सालों से कर रहा है। पूरे राज्य में यूरिया प्रतिबंधित है।

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