BaraiPatti Kushinagar

BaraiPatti Kushinagar HARE KRISHNA.. It's a Village which full of Nature Beauties
In Kushinagar{at Border of Bihar} dist. of UP
90km East from Gorakhpur.

31/01/2022

"हिंदू धर्म का मूल"

“हिंदू” शब्द संस्कृत भाषा का नहीं है। यह शब्द मुस्लिमों द्वारा दिया गया था। एक नदी है जो संस्कृत में सिंधु कहलाती है। मुस्लिम स को ह उच्चारित करते हैं। सिंधु के स्थान पर उन्होंने उसे हिंदू बना दिया। इसलिए हिंदू एक ऐसा शब्द है जो संस्कृत शब्द कोष में नहीं पाया जाता है, लेकिन यह उपयोग में आ गया है। लेकिन वास्तविक सांस्कृतिक संस्था को वर्णाश्रम कहा जाता है। चार वर्ण (सामाजिक विभाजन) होते हैं – ब्राह्मण, क्ष्रत्रिय, वैश्य और शूद्र – और चार आश्रम (आध्यात्मिक विभाजन) होते हैं – ब्रम्हचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और सन्यास। जीवन की वैदिक अवधारणा के अनुसार, जब तक लोग चार वर्ण और चार आश्रमों की यह प्रणाली नहीं अपनाते, वे सभ्य मानव नहीं बन सकते। व्यक्ति को सामाजिक व्यवस्था के इन चार विभाजनों की प्रक्रिया और आध्यात्मिक व्यवस्था के चार विभाजन; वर्णाश्रम को अपनाना ही होगा। भारतीय संस्कृति इस प्राचीन वैदिक प्रणाली पर आधारित है।

[ स्रोत: श्रील प्रभुपाद की पुस्तक, ”आत्म-साक्षात्कार का विज्ञान” से साभार ]

24/01/2022

"मृत्यु निश्चित है"
.. कृष्ण ने स्वयं का वर्णन किया है कि "मैं मृत्यु हूँ। मैं मृत्यु हूँ , और मैं तुम्हारी सारी संपत्ति ,बस ,मृत्यु के रूप में ले लेता हूँ। " इसे छीन लिया जाएगा। हम कितने ही बुद्धिमान क्यों न हों, अपने अधिकार के लिए हम कितने ही अभिमानी क्यों न हों , लेकिन मृत्यु निश्चित है।

[ श्रील प्रभुपाद प्रवचन - भगवद्गीता ०३.२७ - मद्रास, ०१ जनवरी १९७६ ]

23/01/2022

"पश्चिमी देश भौतिक सभ्यता के शिखर पर पहुँच गए हैं तब भी लोग असंतुष्ट हैं"

भौतिक इच्छा जलती अग्नि के समान है। यदि अग्नि को निरन्तर घी की बूंदें मिलती रहें, तो अग्नि बढ़ती ही जायेगी और कभी नहीं बुझेगी। इसलिए व्यक्ति की भौतिक माँगों की पूर्ति करके भौतिक इच्छाओं को संतुष्ट करने की नीति कभी भी सफल नहीं होगी। आधुनिक सभ्यता में, हर कोई आर्थिक विकास में लगा हुआ है, जो भौतिक अग्नि को निरन्तर घी की बुंदे प्रदान करने के तुल्य है। पाश्चात्य देश भौतिक सभ्यता की पराकाष्ठा प्राप्त कर चुके हैं, किंतु तब भी लोग असंतुष्ट हैं। कृष्ण भावनामृत वास्तविक संतुष्टि है। इसकी पुष्टि भगवद्-गीता (०५.२९) में की गई है, जहाँ कृष्ण कहते हैं :

भोक्तारम् यज्ञ-तपसां सर्व-लोक-महेश्वरम।
सुहृदम सर्व-भूतानाम ज्ञात्वा माम शांतिम् रक्षति।।

“साधुजन मुझे समस्त यज्ञों और तपस्याओं का चरम लक्ष्य, समस्त लोकों तथा देवताओं का परम भगवान और सभी जीवों का उपकारी और हितैषी जानकर, भौतिक कष्टों से शांति प्राप्त करते हैं।” इसलिए व्यक्ति को कृष्ण भावनामृत को अपनाना चाहिए और नियामक सिद्धांतों का पालन करते हुए कृष्ण भावनामृत में विकास करना चाहिए। तब व्यक्ति एक शांति और ज्ञान से युक्त, अमर, आनंदमय जीवन को प्राप्त कर सकता है।

[ स्रोत:- श्रील प्रभुपाद , “श्रीमद् भागवतम्” , ०९.०६.४८ ]

22/01/2022

"कृष्ण के संरक्षण में"

वैष्णवों को भौतिक रूप से शक्तिशाली बनने के लिए किसी योग शक्ति का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें आवश्यकता नहीं है। बस कृष्ण के प्रति उनका समर्पण उन्हें सर्वशक्तिमान बनाता है। यह वैष्णव की स्थिति है। वैष्णव, वे इन सभी योग शक्तियों की परवाह नहीं करते। वे कृष्ण पर निर्भर हैं। और कौन हो सकता है... कृष्ण योगेश्वर हैं, सब, गुरु। यत्र कृष्ण... यत्र योगेश्वर कृष्ण: (भ गी १८.७८)। तो अगर कोई योगेश्वर की शरण लेता है, जो सभी रहस्यवादी शक्ति के स्वामी हैं, तो उसे इस योग शक्ति की चिंता क्यों करनी चाहिए? एक गरीब आदमी मेहनत से पैसा कमाने की कोशिश कर सकता है, लेकिन जो बहुत, बहुत अमीर आदमी का पुत्र है, वह श्रम क्यों करे? पिता का पैसा पर्याप्त है। इसी तरह, एक भक्त, एक ईमानदार भक्त, वह कृष्ण के संरक्षण में है। और कृष्ण के संरक्षण का अर्थ है सभी छह प्रकार के ऐश्वर्य के संरक्षण के तहत: धन, फिर शक्ति, फिर प्रतिष्ठा, ज्ञान, त्याग, सौंदर्य- छह प्रकार के ऐश्वर्य।

कृष्ण के अंतर्गत... यं लभ्वा चापरां लाभं मन्यते नाधिकं तत: (भ गी ०६.२२)। यह यहां बताया गया है। क्योंकि अगर आपको किसी तरह या अन्य तरह से कृष्ण की कृपा मिलती है, तो और अधिक लाभ का कोई सवाल ही नहीं है। पर्याप्त लाभ। आपको सब कुछ मिल गया है। बस कृष्ण की सेवा के प्रति ईमानदार रहो। तब आपके पास सब कुछ है। इसके लिए कोई प्रयास करने की जरूरत नहीं है। यस्मिन् स्थितः गुरुणापि दुखेन न विचाल्यते (भ गी ०६.२३)। यदि कोई कृष्ण के चरण कमलों की शरण में स्थित है, तो गुरुणापि दुखेना न विचाल्यते। यदि खतरनाक प्रकार की असुविधा होती है, तो वह परेशान नहीं होता है। वह जानता है... अंबरीश महाराज की तरह, प्रह्लाद महाराज। कई उदाहरण हैं। उनके पिता, हिरण्यकशिपु, उन्हें परेशान कर रहे थे, उन्हें ताड़ना दे रहे थे। वह धैर्यवान थे, परेशान नहीं थे। तो सुनिश्चित करें कि यदि आप हैं ..., यदि आपने वास्तव में कृष्ण के चरण कमलों की शरण ली है, तो खतरे का कोई सवाल ही नहीं है। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति (भ गी ०९.३१)। और कृष्ण इसकी पुष्टि करते हैं: "कौन्तेय, मेरे प्रिय अर्जुन, तुम दुनिया को घोषणा दो कि मेरे भक्त को किसी भी शत्रु से कभी नहीं हराया जाएगा।" यही कृष्ण का आश्वासन है।

[ श्रील प्रभुपाद प्रवचन, वृंदावन, ०४ अगस्त १९७४ ]

20/01/2022

"भक्ति-योग बहुत ही सरल है"

"यह कृष्ण की इच्छा है। वे चार सिद्धांत देते हैं, कि 'सदैव मेरे बारे में सोचो', मन-मना, 'और मेरे भक्त बनो', मद-भक्ता, मद-याजी, 'मेरी आराधना करो', और मद-याजी... मन-मना भव मद-भक्तो मद-याजी मां नमस्कुरु (भ.गी. १८.६५): 'बस थोड़ा सा दण्डवत प्रणाम करो। ये चार सिद्धांत आपको भौतिक अस्तित्व के इस बंधन से मुक्ति दिलाएंगे' और, मां ऐवैष्यसि असंशय, 'बिना किसी संदेह के, आप मेरे पास वापस आएंगे'। 'इतना आसान तत्व। यह बिल्कुल मुश्किल नहीं है। यह बच्चा, वह यह कर सकता है। बूढ़ा आदमी यह कर सकता है। शिक्षित यह कर सकता है, बिना किसी ज्ञान के। यहां तक कि एक जानवर भी इसे कर सकता है। बहुत ही सरल। भक्ति-योग बहुत ही सरल है।"

[ श्रील प्रभुपाद प्रवचन - श्रीमद्भागवतम् ०७ .०९.१६ - मायापुर, २३ फरवरी, १९७६ ]

24/10/2021

"मनुष्य जीवन का वास्तविक प्रयोजन "

आज मैं आपलोगों को एक बालक भक्त की कथा सुनाऊँगा
जिनका नाम प्रह्लाद महाराज था! वे घोर नास्तिक परिवार मे जन्मे थे!
इस संसार मे दो प्रकार के मनुष्य हैं - असुर तथा देवता! उनमें अंतर क्या है? मुख्य अंतर यह है कि देवतागण भगवान के प्रति अनुरक्त रहते हैं जबकि असुरगण नास्तिक होते हैं ! वे ईश्वर में इसलिये विश्वास नही करते, क्योंकि वे भौतिकवादी होते हैं ! मनुष्यों की ये दोनो श्रेणियां इस संसार मे सदैव विद्यमान रहती हैं ।
कलियुग (कलह का युग) होने से सम्प्रति असुरों की संख्या बढ़ी हुई है किन्तु यह वर्गीकरण सृष्टी के प्रारम्भ से चला आ रहा है। आपलोगों से मैं जिस घटना का वर्णन करने जा रहा हूँ वह सृष्टी के कुछ लाख वर्षों बाद घटी।

प्रह्लाद महाराज सर्वाधिक नास्तिक एवं भौतिक रूप से सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति के पुत्र थे । चूँकि उस समय का समाज भौतिकवादी था अतैव इस बालक को भगवान के यशोगान का अवसर ही नही मिलता था । महात्मा का लक्षण् यह होता है की वह भगवान की महिमा का प्रसार करने के लिए अत्यधिक उत्सुक रहता है ।

जब प्रह्लाद महाराज पाँच वर्ष के बालक थे , तो उन्हें पाठशाला भेजा गया। जैसे ही मनोरंजन का अंतराल आता और शिक्षक बाहर चला जाता वे अपने मित्रो से कहते मित्रो!आओ। हम कृष्णभावनामृत के विषय मे चर्चा करें।"

यह दृश्य श्रीमद्भागवतम् के सप्तम स्कंध के छठे अध्याय मे वर्णित है। भक्त प्रह्लाद कहते है , "मित्रो !
यह बाल्यावस्था ही कृषण्भावनामृत अनुशीलन करने का उचित समय है ।"और उनके बालमित्र उत्तर देते हैं,
"ओह ! हम तो खेलेंगे। हम कृष्ण -भावनामृत क्यों ग्रहण करे?" प्रतिउत्तर मे प्रह्लाद महाराज कहते हैं, "यदि तुम लोग बुद्धिमान हो, तो बाल्यावस्था से ही भागवत धर्म प्रारम्भ करो ।"

श्रीमद्भागवतम् भागवत-धर्म प्रस्तुत करता है अर्थात यह ईश्वर विषयक वैज्ञानिक ज्ञान तक ले जाता है। भागवत का अर्थ है, "पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्" और धर्म का अर्थ है, "विधि-विधान ।" यह मानव जीवन अति दुर्लभ है। यह एक महान सुयोग है। इसलिए प्रह्लाद कहते हैं "मित्रों ! तुम लोग सभ्य मनुष्यों के रूप मे उत्पन्न हुए हो, अतः तुम्हारा ये मनुष्य शरीर क्षणभंगुर होते हुए भी महानतम सुयोग है।" कोई भी व्यक्ति अपनी जीवन अवधि नही जानता। ऐसी गणना की जाती है कि इस युग मे मनुष्य-शरीर एक सौ वर्षों तक जीवित रह सकता है। किन्तु जैसे-जैसे कलयुग आगे बढ़ता जाता है, जीवन की अवधि,स्मृति,दया,धार्मिकता तथा अन्य ऐसी ही विभूतियाँ घटती जाती है। अतएव इस युग मे दीर्घायु अनिश्चित है।

यद्यपि मनुष्य का स्वरूप क्षणिक है, फिर भी इस मनुष्य रूप मे आप जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। वह सिद्धि क्या है? सर्वव्यापक भगवान को जान लेना। अन्य योनियों में यह संभव नही है । चूँकि हम क्रमिक विकास द्वारा यह मनुष्य रूप प्राप्त करते है इसलिए यह दुर्लभ अवसर है। प्रकृति के नियमानुसार आपको अनन्तः मनुष्य शरीर दिया जाता है जिससे आप आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त करके भगवद्धाम वापस जा सकें।

"जीवन का चरम लक्ष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु या कृष्ण हैं"

बाद में एक श्लोक में प्रह्लाद महाराज कहते हैं, "इस भौतिक जगत् के जो लोग भौतिक शक्ति द्वारा मोहित हो जाते है, वे यह नही जानते की मनुष्य-जीवन का लक्ष्य क्या है? क्यों? क्योकि वे भगवान् की चकाचोंध करने वाली बहिरंगा शक्ति द्वारा मोहित हो चुके हैं। वे भूल चुके हैं कि जीवन तो सिद्धि के चरम लक्ष्य भगवान् विष्णु को समझने के लिए एक सुअवसर है।" विष्णु या ईश्वर को समझने के लिए हमें क्यों अतीव उत्सुक होना चाहिए? प्रह्लाद महाराज कारण समझाते है, "विष्णु सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति हैं। हम यह भूल चुके हैं।" हम सब किसी प्रिय मित्र की खोज में रहते हैं- हर व्यक्ति इस प्रकार की खोज करता है। "पुरुष स्त्री के साथ प्रिय मैत्री करना चाहता है और स्त्री पुरुष के साथ मैत्री करना चाहती है या फिर एक पुरुष अन्य पुरुष को खोजता है और एक स्त्री अन्य स्त्री को खोजती है। हर व्यक्ति किसी न किसी प्रिय,मधुर मित्र की तलाश मे रहता है। ऐसा क्यों? क्योंकि हम ऐसे प्रिय मित्र का सहयोग चाहते हैं जो हमारी सहायता कर सके। यह जीवन संघर्ष का अंग है और यह स्वाभाविक है। किन्तु हम यह नही जानते कि हमारे सर्वाधिक प्रिय मित्र पूर्ण पुरषोतम भगवान् विष्णु हैं।
जिन्होंने भगवद्गीता का अध्ययन किया है,उन्हें पांचवे अध्याय में यह उत्तम श्लोक मिला होगा, "यदि आप शांति चाहते हैं, तो आपको स्पष्ट रूप से यह समझना होगा कि इस लोक की तथा अन्य लोकों की हर वस्तु कृष्ण की संपत्ति है, वे ही हर वस्तु के भोक्ता हैं एवं वे ही हर एक के परम मित्र हैं।" तो फिर तपस्या क्यों की जाये ? ये सारे कार्य भगवान् को प्रसन्न करने के अतिरिक्त और किसी के निमित्त नहीं है । और जब भगवान् प्रसन्न होते हैं तो आपको फल मिलता है। आप चाहे उच्चतर भौतिक सुख की कामना करते हो या आध्यात्मिक सुख की, आप चाहे इस लोक में श्रेष्ठतर जीवन बिताना चाहते हों या अन्य लोको में, यदि आप भगवान् को प्रसन्न कर लेते हैं तो आप उनसे मनवांछित फल प्राप्त कर सकेंगे। इसलिए वे अत्यंत निष्ठावान मित्र हैं। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति ऐसी कोई वस्तु नहीं चाहता जो भौतिक रूप से कलुषित हो।

भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं कि पुण्य कर्मों से मनुष्य सर्वोच्च भौतिक लोक अर्थात ब्रह्मलोक को प्राप्त कर सकता है जहाँ पर जीवन की अवधि करोड़ो वर्ष की है। आप वहाँ की जीवन-अवधि की गणना नही कर सकते, आपका सारा गणित का ज्ञान निष्फल हो जाता है। भगवद्गीता मे कहा गया है कि ब्रह्मा का जीवन इतना दीर्घ है कि हमारे 4,32,00,00,000 वर्ष उनके बारह घंटो के तुल्य हैं। कृष्ण कहते हैं, "तुम चींटी से लेकर ब्रह्मा तक कोई भी पद इच्छानुसार प्राप्त कर सकते हो पर वहां पर भी जन्म-मरण की पुनरावृत्ति होगी। किन्तु यदि तुम कृष्णभावनामृत का अभ्यास करके मेरे पास आते हो,तो तुम्हें इस कष्ट-प्रद भौतिक जगत् में पुनः नही आना होगा।"
प्रह्लाद महाराज यही बात कहते है, "हमें अपने सर्वाधिक प्रिय मित्र,परम भगवान् कृष्ण की खोज करनी चाहिए" वे हमारे सर्वाधिक प्रिय मित्र क्यों हैं? वे स्वाभिक रूप से प्रिय हैं। क्या आपने कभी विचार किया है कि आप किसे सर्वाधिक प्रिय वस्तु मानते हैं? आप स्वयं ही वह सर्वाधिक प्रिय वस्तु हैं। उदाहरणार्थ मैं यहाँ बैठा हूँ किन्तु यदि आग लगने की चेतावनी दी जाये, तो मैं तुरंत अपनी रक्षा के विषय में सोचूँगा। मैं सर्वप्रथम सोचूंगा कि मैं अपने आप को किस प्रकार बचा सकता हूँ । तब हम अपने मित्रों और अपने संबंधियो तक को भूल जाते हैं और यही भाव रहता है कि सर्वप्रथम मैं अपने को बचा लूँ । आत्म-रक्षा प्रकृति का सर्वप्रथम नियम है।
स्थूल दृश्टिकोण से आत्मा, "स्वयं" शब्द का अर्थ शरीर है किन्तु सूक्ष्म अर्थ में मन या बुद्धि ही आत्मा है। और वस्तुतः आत्मा का अर्थ आत्मा ही है। स्थूल अवस्था में हम अपने शरीर की रक्षा करने तथा उसे तुष्ट करने में अत्यधिक रुचि लेते हैं किन्तु सूक्ष्मतर अवस्था में मन तथा बुद्धि को तुष्ट करने में रुचि लेते हैं। किन्तु मानसिक तथा बौद्धिक स्तर के ऊपर, जहाँ का वातावरण अध्यात्मिकृत है, हम यह समझ सकते है कि अहं ब्रहास्मि अर्थात् "मैं यह मन, बुद्धि या शरीर नही हूँ- मैं तो आत्मा हूँ - भगवान् का भीन्नाशं।" यही है वास्तविक समझ या ज्ञान का स्तर या पद।
प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि समस्त जीवों में से विष्णु परम हितैषी हैं। इसलिए हम सभी उनकी खोज में लगे हैं। जब बालक रोता है, तो वह क्या चाहता है? अपनी माता। किन्तु इसे व्यक्त करने के लिए उसके पास कोई भाषा नही होती। स्वभावतः उसके पास उसका शरीर है जो उसकी माता के शरीर से उत्पन्न होता है अतएव अपनी माता के शरीर से उसका घनिष्ट संबंध होता हैं। बालक अन्य किसी स्त्री को नही चाहेगा। बालक रोता है किन्तु जब वह स्त्री ,जो बालक की माँ होती है, आती है और उसे गोद में उठा लेती है तो वह बालक शांत हो जाता है। यह सब व्यक्त करने के लिए उसके पास कोई भाषा नही होती किन्तु उसकी माता से उसका संबंध प्रकृति का नियम है। इसी तरह हम स्वाभिक रूप से शरीर की रक्षा करना चाहते है। यह आत्म-संरक्षण हैं। यह जीव का प्राकृतिक नियम है और सोना भी प्राकृतिक नियम है। तो मैं शरीर की रक्षा क्यों करु? क्योकि इस शरीर के भीतर आत्मा है।

इस भौतिक जगत् में जीव एक आध्यात्मिक प्राणी है, किन्तु उसमें भोग करने की अर्थात भौतिक शक्ति का शोषण करने की प्रवृति होती है। इसलिए उसे शरीर प्राप्त हुआ है। जीवों की 84,00,000 योनियाँ हैं और हर योनि का पृथक् शरीर है। शरीर के अनुसार ही उसमे विशिष्ट इन्द्रिया होती हैं जिनसे वे किसी विशेष आनंद का भोग कर सकते हैं। मान लीजिये कि आपको एक कँटीली झाड़ी दे दी जाये और कहा जाय , "देवियों और सज्जनो! यह एक अत्युत्तम भोजन है। यह ऊंटो द्वारा प्रमाणित है। यह अति उत्तम है।" तो क्या आप इसे खाना पसंद करेंगे?" नहीं, आप यह क्या व्यर्थ की वस्तु मुझे दे रहे हैं?" आप कहेंगे, चूँकि आपको ऊँट से भिन्न शरीर मिला हुआ है अतएव आपको कँटीली झाड़िया नही भाती। किन्तु यही झाड़ी ऊँट को दे दी जाये तो वह सोचेगा कि यह तो अत्युत्तम आहार है।
यदि सुअर तथा ऊँट बिना विकट संघर्ष के इन्द्रिय तृप्ति का भोग कर सकते है तो हम मनुष्य क्यों नहीं कर सकते? हम कर सकते हैं किन्तु यह हमारी चरम उपलब्धि नहीं होगी। चाहे कोई सुअर या ऊँट अथवा मनुष्य, इन्द्रिय तृप्ति भोगने की सुविधाएँ प्रकृति द्वारा प्रदान की जाती हैं। अतएव वे सुविधाएँ जो आपको प्रकृति के नियम द्वारा मिलनी ही है उनके लिए आप श्रम क्यों करें? प्रत्येक योनि में शारीरिक माँगो की तुष्टि की व्यवस्था प्रकृति द्वारा की जाती है। इस तृप्ति की व्यवस्था उसी तरह की जाती है जिस तरह दुःख की व्यवस्था की जाती रहती है। क्या आप चाहेंगे की आपको ज्वर चढ़े? नहीं। ज्वर क्यों चढ़ता है? मैं नही जानता। किन्तु यह चढ़ता ही है, है न! क्या आप इसके लिए प्रयास करते है? नहीं, तो यह चढ़ता कैसे है? प्रकृति से। यही एकमात्र उत्तर है। यदि आपका कष्ट प्रकृति द्वारा प्रदत्त है तो आपका सुख भी प्रकृतिजन्य है। इसके विषय मे चिंता न करें। यही प्रहलाद महाराज का आदेश है। यदि आपको बिना प्रयास के ही जीवन में कष्ट मिलते हैं, तो सुख भी बिना प्रयास के प्राप्त होगा।
तो इस मनुष्य जीवन का वास्तविक प्रयोजन क्या है? "कृष्णभावनामृत का अनुशीलन" अन्य सारी वस्तुऍ प्रकृति के नियमो द्वारा, जो अनंततः ईश्वर का नियम है,प्राप्त हो जायेंगी। यदि मैं प्रयास न भी करूँ तो मुझे अपने विगत कर्म तथा शरीर के कारण, जो भी मिलना है, वह प्रदान किया जायेगा। अतएव आपकी मुख्य चिंता मनुष्य जीवन के उच्चतर लक्ष्य को खोज निकालने की होनी चाहिए।

स्रोत:-- श्रील प्रभुपाद की पुस्तक "प्रह्लाद महाराज के दिव्य उपदेश, अध्याय १" से साभार
नित्य जपिये
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।
और खुश रहिये।

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Village-Baraipatti , Post/Banbira , Fazilnagar, Tehsil-Tamkuhi Raj Distric-Kushinagar ( Uttar Pradesh )
Padrauna
274401

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