05/07/2024
2024 का साल दिगंबर जैन संस्कृति और समाज के लिए कुछ अनहोनी लेकर आया है l 18 फरवरी को विद्या नामक सूर्य का अस्त हुआ और अब 04 जुलाई को विराग नामक चन्द्र का भी विलय हो गया l
एक सूर्य थे, तो एक चन्द्र, क्योंकि जिस भांति सूर्य अपने प्रकाश से सबको आलोकित करता है, उसी भांति चन्द्र भी अपने प्रकाश से सबको आन्दोलित करता है l
*ये कैसा अद्भुत संयोग ??*
१. सूर्य का उदय दक्षिण में हुआ तो अस्त उत्तर में और चन्द्र का निलय उत्तर में हुआ तो विलय दक्षिण में ।
२. दोनों के नाम 'वि' से शुरू , एक ही राशि
३. *एक ने अष्टमी को महाप्रयाण किया तो दूसरे ने चतुर्दशी को !* धन्य हैं आप दोनों युगल श्रमण - जिन्होंने अत्यन्त उत्तम समाधि मरण कर इन दोनों शुभ तिथियों को और भी शुभमय कर दिया ।
४. सूर्य रूपी गुरु का अस्त *रवि (सूर्य) के दिन रविवार* को अस्त हुआ और चन्द्र रूपी गुरु का अस्त *गुरु के दिन गुरुवार* को अस्त हुआ ।
५. दोनों ही महान आत्माओं का समाधि मरण रात्रि के ०२:३० बजे हुआ ।
६. आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज *छत्तीस मूलगुणों* का यत्नाचारपूर्वक स्वयम् एवं अपने शिष्यों को पालन करने वाले का समाधि मरण *छत्तीसगढ़* की धरा पर हुआ तो आचार्य श्री विरागसागर जी महाराज स्वयं महाराज बने एवं अपने अनेक शिष्यों को *महाराज* बनने की प्रेरणा एवम शिक्षा दीक्षा देने वाले का मरण *महाराष्ट्र* की धरा पर हुआ ।
७. समाधि मरण के तारीख़ की समानता भी कुछ कह रही है
18/02/2024 = 1+8+0+2+2+0+2+4 = 19 = 1+9 = 1
04/07/2024 = 0+4+0+7+2+0+2+4 = 19 = 1+9 = 1
दोनों 1 अंक को समर्पित हैं अर्थात् एक अकेले ही थे, उन सरीखा संत अब संभवतः ही कहीं देखने को मिले ।
८. आप दोनों ही यतिवरों ने अपनी कोख से अनुमानित ३५० से ४०० शिष्य शिष्याओं को जन्म दिया अर्थात् मुनि एवं आर्यिका, ऐलक, क्षुल्लक एवं क्षुल्लिका दीक्षा प्रदान करी ।
ऐसे पूज्यवर गणाचार्य विराग सागर जी महा मुनिराज के श्री चरणों मे कोटि कोटि वंदन, आप देह से विदेही हुए है परंतु लाखों भक्तों के हृदय मे सदा विराजमान रहेंगे l
श्रमण संस्कृति सदैव जयवंत रहें, जैनम जयतु शासनम् l