01/06/2026
अगर मुज़रिम है तो कानून के तराज़ू में तौल दो,
मज़हब देख के गोली,और मज़हब देख के फूल क्यों?
किसी को मौत का फ़रमान, किसी को जेल की राह,
एक ही जुर्म पर आख़िर ये दोहरा फ़ैसला क्यों?
ये कैसा न्याय है साहब, ये कैसा दस्तूर है,
कानून है सबके लिए,तो फिर दो किरदार क्यों ?
गर मुज़रिम है मुस्लिम तो सीने में उतार दो,
गर नहीं है तो फिर इनामों से निखार दो क्यों ?
जुर्म एक,सबूत एक,फिर सज़ाओं में फ़र्क़ क्यों ?
क़ातिल का धर्म देख के होते हैं फ़ैसले क्यों ?