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वास्तुदेवता- क्यों नया मकान बनाने पर करते हैं पूजा??   इनकी उत्पत्ति कैसे हुई, कैसा है उनका स्वरूप और क्या है उनका मूल म...
21/08/2026

वास्तुदेवता- क्यों नया मकान बनाने पर करते हैं पूजा??
इनकी उत्पत्ति कैसे हुई, कैसा है उनका स्वरूप और क्या है उनका मूल मन्त्र ?

वास्तुदेवता की पूजा के लिए वास्तु की प्रतिमा तथा वास्तुचक्र बनाया जाता है । वास्तुचक्र अनेक प्रकार के होते हैं । अलग-अलग अवसरों पर भिन्न-भिन्न पद के वास्तुचक्र बनाने का विधान है । वास्तु कलश में वास्तुदेवता (वास्तोष्पति) की पूजा कर उनसे सब प्रकार की शान्ति व कल्याण की प्रार्थना की जाती है।

जिस भूमि पर मनुष्य या प्राणी निवास करते हैं, उसे वास्तु कहा जाता है । शुभ वास्तु के रहने से वहां के निवासियों को सुख-सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है और अशुभ वास्तु में निवास करने से हानिकारक परिणाम मिलते हैं।

वास्तु देवता कौन हैं ?
मत्स्यपुराण के अनुसार प्राचीनकाल में अन्धकासुर के वध के समय भगवान शंकर के ललाट से पृथ्वी पर जो स्वेदबिन्दु (पसीने की बूंदें) गिरे उनसे एक भयंकर आकृति वाला पुरुष प्रकट हुआ जो विकराल मुंह फैलाये हुए था। अन्धकासुर के गणों का रक्तपान करने पर भी जब उसे तृप्ति नहीं हुई तो भूख से व्याकुल होकर वह त्रिलोकी का भक्षण करने को उद्यत हो गया। तब भगवान शंकर आदि देवताओं ने उसे पृथ्वी पर सुलाकर वास्तु देवता (वास्तुपुरुष) के रूप में प्रतिष्ठित किया और उसके शरीर में सभी देवताओं ने वास किया इसलिए वह वास्तु देवता या वास्तुपुरुष के नाम से प्रसिद्ध हो गया ।

देवताओं ने उसे गृह निर्माण, वैश्वदेव बलि के और पूजन-यज्ञ के समय पूजित होने का वर दिया । देवताओं ने उसे वरदान दिया कि तुम्हारी सब मनुष्य पूजा करेंगे । तालाब, कुएं और वापी खोदने, गृह व मन्दिर के निर्माण व जीर्णोद्धार में, नगर बसाने में, यज्ञ-मण्डप के निर्माण व यज्ञ आदि के समय वास्तुदेवता की पूजा का विधान है ।

वास्तुदेवता का स्वरूप (ध्यान)!!
श्वेतं चतुर्भुजं शान्तं कुण्डलाद्यैरलंकृतम्।
पुस्तकं चाक्षमालां च वराभयकरं परम्।।
पितृवैश्वानरोपेतं कुटिलभ्रूपशोभितम् ।
करालवदनं चैव आजानुकरलम्बितम् ।।
(मध्यमपर्व २।११।११-१२)

अर्थात्—वास्तुगेवता श्वेत वर्ण के, चार भुजा वाले, शान्तस्वरूप, और कुण्डलों से सुशोभित हैं । हाथ में पुस्तक, अक्षमाला, वरद और अभय की मुद्रा धारण किये हुए हैं । पितरों और वैश्वानर से युक्त हैं तथा उनकी भौंहें कुटिल (तिरछी) हैं । उनका मुख भयंकर है । हाथ घुटनों तक लम्बे हैं ।

वास्तु देवता की पूजा के लिए वास्तु की प्रतिमा तथा वास्तुचक्रबनाया जाता है । वास्तुचक्र अनेक प्रकार के होते हैं । अलग-अलग अवसरों पर भिन्न-भिन्न पद के वास्तुचक्र बनाने का विधान है ।

वास्तु कलश में वास्तु देवता (वास्तोष्पति) की पूजा कर उनसे सब प्रकार की शान्ति व कल्याण की प्रार्थना की जाती है ।

वास्तुदेवता का मूल मन्त्र!!
ऋग्वेद (७।५४।१) में वास्तुदेवता का मूल मन्त्र इस प्रकार है—

वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान् त्स्वावेशो अनमीवो भवान: ।
यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ।।

अर्थात्—हे वास्तुदेव ! हम आपके सच्चे उपासक हैं , इस पर पूर्ण विश्वास करें और तदनन्तर हमारी स्तुति-प्रार्थनाओं को सुनकर आप हम सभी उपासकों को आधि-व्याधि मुक्त कर दें और जो हम अपने धन-ऐश्वर्य की कामना करते हैं, आप उसे भी परिपूर्ण कर दें, साथ ही इस वास्तुक्षेत्र या गृह में निवास करने वाले हमारे स्त्री-पुत्रादि परिवार-परिजनों के लिए कल्याणकारक हों तथा हमारे अधीनस्थ गौ, घोड़े, सभी चौपायों (वाले प्राणियों) का भी कल्याण करें ।

👉किस दिशा के कौन हैं देवता...
हवा के चलने को आज भी भारत में उसे उसी दिशा का नाम दे दिया जाता है जैसे- पूर्व से चलने वाली हवा को पुरवाई इसी प्रकार अन्य दिशाओं में चलने वाली हवाओं का नाम होता है। प्रत्येक मानव जब भी चलता है किसी न किसी दिशा में ही चलता है बिना दिशा वह कभी चल ही नहीं सकता या तो वह सही दिशा में जाएगा या गलत दिशा में, गलत दिशा में चलने वाले को दिशाहीन, पथ भ्रष्ट की संज्ञा दी जाती है। फिलहाल हम बात कर रहे हैं वास्तु की दिशा और उनके देवताओं की....

💧उत्तर दिशा के देवता कुबेर हैं जिन्हें धन का स्वामी कहा जाता है और सोम को स्वास्थ्य का स्वामी कहा जाता है। जिससे आर्थिक मामले और वैवाहिक व यौन संबंध तथा स्वास्थ्य प्रभावित होता है।

🍂उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) के देवता सूर्य हैं जिन्हें रोशनी और ऊर्जा तथा प्राण शक्ति का मालिक कहा जाता हैं। इससे जागरूकता और बुद्धि तथा ज्ञान मामले प्रभावित होते हैं।

🌲पूर्व दिशा के देवता इंद्र हैं जिन्हें देवराज कहा जाता है। वैसे आम तौर पर सूर्य ही को इस दिशा का स्वामी माना जाता जो प्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण विश्व को रोशनी और ऊर्जा दे रहे हैं। लेकिन वास्तुनुसार इसका प्रतिनिधित्व देवराज करते हैं। जिससे सुख-संतोष तथा आत्मविश्वास प्रभावित होता है।

🔥दक्षिण-पूर्व (अग्नेय कोण) के देवता अग्नि देव हैं जो अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिससे पाचन शक्ति तथा धन और स्वास्थ्य मामले प्रभावित होते हैं।

☀️ दक्षिण दिशा के देवता यमराज हैं जो मृत्यु देने के कार्य को अंजाम देते हैं। जिन्हें धर्मराज भी कहा जाता है। इनकी प्रसन्नता से धन, सफलता, खुशियाँ व शांति प्राप्ति होती है।

🌀दक्षिण-पश्चिम दिशा के देवता निरती हैं जिन्हे दैत्यों का स्वामी कहा जाता है। जिससे आत्मशुद्धता और रिश्तों में सहयोग तथा मजबूती एव आयु प्रभावित होती है।

💦पश्चिम दिशा के देवता वरूण देव हैं जिन्हें जलतत्व का स्वामी कहा जाता है। जो अखिल विश्व में वर्षा करने और रोकने का कार्य संचालित करते हैं। जिससे सौभाग्य, समृद्धि एवं पारिवारिक ऐश्वर्य तथा संतान प्रभावित होती है।

✨उत्तर-पश्चिम के देवता पवन देव है। जो हवा के स्वामी हैं। जिससे सम्पूर्ण विश्व में वायु तत्व संचालित होता है। यह दिशा विवेक और जिम्मेदारी योग्यता, योजनाओं एवं बच्चों को प्रभावित करती है।

इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि वास्तु शास्त्र में जो दिशा निर्धारण किया गया है वह प्रत्येक पंच तत्वों के संचालन में अहम भूमिका निभाते हैं। जिन पंच तत्वों का यह मानव का पुतला बना हुआ है अगर वह दिशाओं के अनुकूल रहे तो यह दिशाएं आपको रंक से राजा बना जीवन में रस रंग भर देती हैं।

🌷॥ श्रीशतपत्रिका-पाटलप्रभा-लक्ष्मीस्तोत्रम् ॥🌷      (हिन्दी भावार्थ सहित)पण्डित अनिरुद्ध शास्त्री-विरचितम्इस स्तोत्र में...
21/08/2026

🌷॥ श्रीशतपत्रिका-पाटलप्रभा-लक्ष्मीस्तोत्रम् ॥🌷
(हिन्दी भावार्थ सहित)
पण्डित अनिरुद्ध शास्त्री-विरचितम्

इस स्तोत्र में देवी को पाटल-पुष्प अर्थात गुलाब पुष्प के समान अरुण प्रभायुक्त, सुगन्धिमयी, प्रेम-माधुर्य की अधिष्ठात्री, सौभाग्यदायिनी तथा गृहशान्ति और दाम्पत्य-सौख्य प्रदान करने वाली श्रीलक्ष्मी के रूप में स्तुत किया गया है।
स्तोत्र के विभिन्न भागों में देवी के पाटलप्रभामय स्वरूप, करुणाकटाक्ष, सौन्दर्य, सौम्यता, प्रेमशक्ति, गृहस्थ-सुख, धन-धान्य, समृद्धि, सौभाग्य तथा मानसिक शान्ति का भावपूर्ण वर्णन किया गया है। साथ ही साधक के हृदय में प्रेम, सौहार्द, शान्ति और मंगलमय संकल्पों की स्थापना की प्रार्थना की गई है।

​🌺 ॥ प्रार्थना ॥

​🍁
पाटलपुष्पप्रभे देवि हरिप्रिये पाटलप्रभे।
शतपत्रिकरूपिण्यै काम्यायै ते नमो नमः॥१॥

​प्रेमसौख्यप्रदे देवि दाम्पत्यसुखदायिनि।
सौभाग्यदायिनि शुभे कलहक्लेशहारिणि॥२॥

​दिव्यसौन्दर्यरूपिण्यै पाटलारुणविग्रहे।
शान्तिदे श्रीस्वरूपे च पाटलप्रभे नमोऽस्तु ते॥३॥

​गृहस्थाश्रमसौख्यदे वैभवश्रीप्रदायिनि।
हरिपादप्रिये देवि सुगन्धिपुष्पवासिनि॥४॥

​भक्तप्रियै भक्तकल्पलते काम्यवरप्रदायिनि।
लक्ष्मीरूपे जगन्मातः काम्यसिद्धिप्रदायिनि॥५॥

​युगलप्रेमदात्रि त्वं सौहार्दशान्तिदायिनि।
अनेन स्तोत्रपाठेन भक्तानां फलदा भव॥६॥

​भावार्थ —
हे पाटलप्रभा देवी! आप पाटल-पुष्प ( गुलाब पुष् प)के समान अरुण प्रभा वाली, सुगन्धित शतपत्री-पुष्पस्वरूपिणी तथा श्रीहरि की प्रिय हैं। आप प्रेम, दाम्पत्य-सुख, सौभाग्य, गृहशान्ति, समृद्धि और वैभव प्रदान करने वाली हैं। आप कलह एवं क्लेश का नाश करती हैं और भक्तों की मंगलमयी कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं। हे जगन्माता! इस स्तोत्र के श्रद्धापूर्वक पाठ से भक्तों पर अपनी कृपादृष्टि बनाए रखें।

🌹प्रार्थना मंत्र

१..​ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं शतपत्रिकायै काम्यायै लक्ष्म्यै नमः॥

२..ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं
शतपत्रिकायै पाटलप्रभायै
काम्यलक्ष्म्यै रक्तारुणलोचनायै
दाम्पत्यसौख्यप्रदायिन्यै
गृहशान्तिकारिण्यै
कृपाकटाक्षेण धनधान्यवर्षिण्यै
गुह्यशक्त्यै नमः स्वाहा ॥

-​🌷 ॥ मंगलाचरणम् ॥

​🍁
नमोऽस्तु ते शतपत्रिके पाटलप्रभे शुभदायिनि।
प्रेममाधुर्यदात्रि त्वं काम्ये देवि नमोऽस्तु ते॥१॥

​अर्थ —
हे शतपत्रिके! हे पाटलप्रभा से सुशोभित शुभदायिनी देवी! आप शतपत्री-पुष्प की कोमलता और सुगन्ध के समान प्रेम एवं माधुर्य प्रदान करने वाली तथा मंगलमयी काम्य-लक्ष्मी हैं। आपको बार-बार नमस्कार है।

​🍁
शतपत्रमिवोद्भासि हृदये मम कामकुसुमप्रभे।
सौरभेण मनो हृत्वा धनश्रीं मे विवर्धय॥२॥

​अर्थ —
हे कामकुसुमप्रभे देवी! आप मेरे हृदय में सुगन्धित शतपत्री-पुष्प के समान विकसित होकर प्रकाशित हों। अपनी दिव्य सुगन्ध और मंगलमयी उपस्थिति से मेरे मन को आकृष्ट करके मेरे जीवन में धन और श्री की वृद्धि करें।

​🍁
कोमलस्मितवक्त्राब्जे पाटलारुणलोचने।
सुकुमारि सुधाधारे सिञ्च चेतो ममाम्बिके॥३॥

​अर्थ —
हे सुकुमारी अम्बिके! आपका मुख मधुर मुस्कान से युक्त कमल के समान है और आपके नेत्र पाटल-पुष्प के समान अरुण हैं। हे सुधाधारे! अपने प्रेमामृत की धारा से मेरे चित्त को सींचें।

​🍁
नातिरक्ता न च श्वेता मध्यरागविभूषिते।
काम्यशक्तिस्वरूपे त्वं प्रेमज्ञानसमन्विते॥४॥

​अर्थ —
हे देवी! आपकी पाटल-शतपत्री प्रभा न अत्यधिक रक्तवर्णी है और न पूर्णतः श्वेत; उसमें मधुर अनुराग की कोमल आभा विद्यमान है। आप काम्यशक्ति के स्वरूप तथा प्रेम और ज्ञान से संयुक्त दिव्य शक्ति हैं।

​🍁
पाटलपुष्पमध्यस्था हृदयाम्भोजवासिनि।
प्राणस्पन्दनरूपेण चेतनां मे प्रबोधय॥५॥

​अर्थ —
हे देवी! आप पाटल-पुष्प की सुगन्ध और सौन्दर्य के मध्य प्रतिष्ठित तथा हृदय-कमल में निवास करने वाली हैं। प्राणों के दिव्य स्पन्दनरूप होकर मेरी अन्तःचेतना को जाग्रत करें।

-

​🌷 ॥ श्रीशतपत्रिका-पाटलप्रभा-लक्ष्मीध्यानम् ॥

🍁
ध्यायेत् पाटलवनमध्यवर्तिनीं शतपत्रिकामालिनीम्।
सुगन्धिपुष्पपुञ्जेषु स्वर्णसिंहासनस्थिताम्॥१॥

​अर्थ —
साधक उस देवी का ध्यान करे, जो पाटल-पुष्पों के वन के मध्य विराजमान हैं, सुगन्धित शतपत्री-पुष्पों की मालाओं से विभूषित हैं तथा सुगन्धित पुष्पों के समूहों के मध्य स्वर्णसिंहासन पर आसीन हैं।

​🍁
द्विभुजां रक्तवस्त्राढ्यां दिव्याभरणभूषिताम्।
मुकुटोज्ज्वलशिरोरत्नां कोमलारुणविग्रहाम्॥२॥

​अर्थ —
वे द्विभुजा हैं, रक्तवर्ण के वस्त्र धारण किए हुए हैं और दिव्य आभूषणों से अलंकृत हैं। उनके मस्तक पर उज्ज्वल मुकुट शोभायमान है तथा उनका सम्पूर्ण विग्रह कोमल अरुण प्रभा से प्रकाशित है।

​🍁
पाटलपुष्पमालाढ्यां सौन्दर्यैकनिवासिनीम्।
मुक्ताहासमुखाम्भोजां लावण्यामृतवारिधिम्॥३॥

​अर्थ —
वे पाटल-पुष्पों की माला से अलंकृत, सौन्दर्य की अधिष्ठात्री, मधुर हास्य से युक्त मुखकमल वाली तथा लावण्यरूपी अमृत के सागर हैं।

​🍁
रतिकामस्वरूपां तां प्रेममाधुर्यधारिणीम्।
हृदयावासिनीं देवीं सर्वाभीष्टफलप्रदाम्॥४॥

​अर्थ —
वे प्रेम और माधुर्य की दिव्य शक्ति हैं, भक्तों के हृदय में निवास करती हैं तथा उनके मंगलमय अभीष्ट फलों को प्रदान करने वाली हैं।

​🍁
दाम्पत्यसुखसन्दात्रीं गृहशान्तिविवर्धिनीम्।
समृद्धिवैभवप्रदां लक्ष्मीं कामकुसुमाश्रिताम्॥५॥

​अर्थ —
वे दाम्पत्य-सुख प्रदान करने वाली, गृहशान्ति को बढ़ाने वाली तथा समृद्धि और वैभव देने वाली श्रीलक्ष्मी हैं और कामकुसुम के दिव्य सौन्दर्य में प्रतिष्ठित हैं।

​🍁
एवं ध्यात्वा महादेवीं भक्त्या यः प्रणमेद् नरः।
तस्य हृदि सदा वासं कुर्यात् श्रीः प्रेमरूपिणी॥६॥

​अर्थ —
जो साधक इस प्रकार महादेवी का ध्यान करके भक्ति-भाव से उन्हें प्रणाम करता है, उसके हृदय में प्रेमस्वरूपिणी श्रीलक्ष्मी सदा निवास करती हैं।

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🌹🌹अथ स्तोत्रपाठः 🌹🌹

🍁
पुष्पराजकामकुसुमपाटलप्रभे
देवि शतपत्रिकासुगन्धिमयि।
कमलनयने लक्ष्मि दुःखदारिद्र्यनाशिनि
कृपादृष्टिं कुरु मयि॥१॥

​अर्थ— हे पुष्पराजरूप कामकुसुम की पाटलप्रभा देवी! हे शतपत्रिका की सुगन्ध से परिपूर्ण कमलनयनी लक्ष्मी! मेरे दुःख और दरिद्रता का नाश करने के लिए मुझ पर कृपादृष्टि करें।

​🍁
काम्ये लक्ष्मि कमनीयमुखारविन्दे
मधुरहासेन हरिमपि हर्षयन्ति।
त्रैलोक्यमङ्गलदृष्ट्या विलोक्य मां
सर्वपीडाः प्रणुदस्व देवि॥२॥

​अर्थ— हे काम्य लक्ष्मी! आपका मनोहर मुखकमल और मधुर हास्य स्वयं श्रीहरि को भी आनन्दित करता है। आपकी त्रैलोक्यमंगलमयी दृष्टि मुझ पर पड़े और मेरी सभी पीड़ाओं को दूर करे।

​🍁
हे देवि तव नेत्रकटाक्षलेशः
स्वर्णधारासम एव सम्पत्प्रदः।
यत्रासौ पतति तत्र दैन्यशोकौ
क्षिप्रं नश्येतां कृपां मयि कुरु॥३॥

​अर्थ— हे देवी! आपके नेत्रों का अल्प-सा कटाक्ष भी स्वर्णधारा के समान सम्पत्ति प्रदान करने वाला है। जहाँ वह पड़ता है, वहाँ दैन्य और शोक शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। ऐसी कृपा मुझ पर भी करें।

​🍁
शतपत्रिके तव तनुः सुवर्णपाटलप्रभा
रतिश्रीस्वरूपिणी।
दर्शनात् फलदायिनि सुखसिद्धिप्रदे
देवि सदा मयि प्रसन्ना भव॥४॥

​अर्थ— हे शतपत्रिके! आपका शरीर स्वर्णमयी पाटलप्रभा से युक्त और सौन्दर्यसम्पन्न है। हे फलदायिनी देवी! आप मुझे सदा सुख और सिद्धि प्रदान करने के लिए प्रसन्न रहें।

​🍁
या पाटलप्रभया रात्रिं स्वर्णसन्ध्येव
दीपयन्ती त्रिगुणात्मिका।
हृदये मे समुत्तिष्ठ मनोमोहदुःखमूलं
विनाशय॥५॥

​अर्थ— हे देवी! आपकी पाटलप्रभा रात्रि को स्वर्णिम संध्या के समान प्रकाशित करती है। आप त्रिगुणात्मिका शक्ति हैं। मेरे हृदय में प्रकट होकर मोह और दुःख के मूल का नाश करें।

​🍁
शृङ्गारसारमधुरं तव रूपमेतत्
कामदेवस्यापि मनोहरं हि।
यत्र श्रीहरिरपि क्षणमात्रमासक्तः
तिष्ठति तत्र मे न विषादः॥६॥

​अर्थ— हे देवी! आपका सौन्दर्य शृङ्गाररस का सार और अत्यन्त मनोहर है। जहाँ स्वयं श्रीहरि भी आकर्षित होकर ठहरते हैं, वहाँ मेरे जीवन में विषाद क्यों रहे?

​🍁
केशेषु पाटलसुमाञ्जलिभिः सुगन्धैर्वातो
वहत्येव तवाभितः सदा।
तां दिशं मम शुभदां समृद्धिदां
कुरु शतपत्रिके देवि॥७॥

​अर्थ— हे देवी! आपके केशों में लगे पाटल-पुष्पों की सुगन्ध चारों ओर फैलती रहती है। आप जिस दिशा को स्पर्श करें, वह मेरे लिए शुभ और समृद्धिदायिनी हो।

​🍁
भ्रूवल्लीं तव निरीक्ष्य सुराः सर्वे
मौनं यान्ति सौम्यलहरीं विलोक्य।
सा मे मनोगतसन्देहान् नाशयतु
शतपत्रिके॥८॥

​अर्थ— आपकी मनोहर भ्रूवल्ली की सौम्य लहर को देखकर देवगण भी मानो मौन हो जाते हैं। वही सौम्य शक्ति मेरे मन के सभी संशयों को नष्ट करे।

​🍁
वक्त्रं तव स्मितसुधापूर्णचन्द्रं
सौम्यदर्शनं मे जीवनार्थं भवतु।
तेन स्फुरतु मे सौभाग्यं
संसारतापश्च विनश्यतु॥९॥

​अर्थ— आपका मुख मुस्कानरूपी अमृत से पूर्ण चन्द्रमा के समान है। आपका सौम्य दर्शन मेरे जीवन को सफल करे, सौभाग्य जगाए और संसार के ताप को नष्ट करे।

​🍁
नैव प्रार्थनां रचयितुं मम शक्तिर्न
स्तुतिं शास्त्रसमन्वितां कर्तुम्।
तव कटाक्षलेशः पततु मयि चेत्
सर्वं सिद्धमिति मन्ये॥१०॥

​अर्थ— हे देवी! मुझमें न उचित प्रार्थना करने की शक्ति है, न शास्त्रसम्मत स्तुति करने की क्षमता। यदि आपका अल्प-सा कटाक्ष भी मुझ पर पड़ जाए तो मैं सब कुछ सिद्ध मानूँगा।

​🍁
या नेत्रयोस्तव चलत्सरसीव शोभा
हृदये मेऽनन्तचेतनां जनयति।
सा दृष्टिरेव मम नित्यशरणं भवतु
शतपत्रिके काम्ये॥११॥

​अर्थ— आपकी आँखों की चंचल सरोवर जैसी शोभा मेरे हृदय में अनन्त चेतना जगाती है। हे काम्ये शतपत्रिके! आपकी वही दृष्टि मेरी नित्य शरण बने।

​🍁
पादाम्बुजं तव यदा धरणीं स्पृशेत्
सा भूमिः सौभाग्यसमृद्धिमती भवेत्।
तथैव मां कुरु कृतकृत्यभावयुक्तं
शतपत्रिके प्रेमदायिनि॥१२॥

​अर्थ— जब आपके चरणकमल पृथ्वी को स्पर्श करें तो वह भूमि सौभाग्य और समृद्धि से पूर्ण हो जाए। उसी प्रकार मुझे भी जीवन में कृतकृत्य होने का अनुभव प्रदान करें।

​🍁
या नूपुरस्वनलहरी त्रिजगत्प्रबोधं
करोति हृदि मे प्रविशन्ती।
सा नित्यं ममाज्ञाननिद्रां विनाशयतु
शतपत्रिकालक्ष्मि॥१३॥

​अर्थ— आपके नूपुरों की मधुर ध्वनि तीनों लोकों को जाग्रत करने वाली है। वही दिव्य नाद मेरे हृदय में प्रवेश करके अज्ञानरूपी निद्रा को नष्ट करे।

​🍁
त्वं केवलं धनदात्री न च लौकिकविभावरूपा
चेतोनिविष्टा।
परमात्मशक्तिरूपासि तवाकृपां विना
सिद्धिर्नास्ति त्रिषु लोकेषु॥१४॥

​अर्थ— हे देवी! आप केवल धन देने वाली लौकिक शक्ति नहीं हैं; आप चेतना में स्थित परमात्मशक्ति हैं। आपकी कृपा के बिना तीनों लोकों में कोई सिद्धि पूर्ण नहीं होती।

​🍁
काम्या त्वमेव जनस्य मनोगतार्था
न भोगतृष्णा त्वमिहेच्छाशक्तिः।
सङ्कल्पबीजं मम शान्तिसिद्धिप्रदं
कुरु देवि॥१५॥

​अर्थ— हे देवी! आप मनुष्य की शुद्ध और मंगलमयी कामना हैं, केवल भोगतृष्णा नहीं। आप इच्छा-शक्ति हैं। मेरे संकल्प के बीज को शान्ति और सिद्धि प्रदान करने वाला बनाएं।

​🍁
यत्र त्वत्स्मरणं क्षणमपि जातं
तत्रैव शोकलहरी विनश्यति क्षिप्रम्।
तत्स्मरणं मम नित्यं हृदि तिष्ठतु
शतपत्रिकालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥१६॥

​अर्थ— जहाँ आपका क्षणमात्र भी स्मरण होता है वहाँ शोक की लहर शीघ्र शांत हो जाती है। हे शतपत्रिका लक्ष्मी! आपका वह पवित्र स्मरण मेरे हृदय में सदा स्थित रहे।

​🍁
सौभाग्यसारमखिलं तव दृष्टिबिन्दौ
बद्धं यथा कनकधारासमं प्रवहति।
सा धारिका मम गृहे हृदि च प्रविश्य
नित्यं वसन्तमिव सन्निधिं करोतु॥१७॥

​अर्थ— समस्त सौभाग्य का सार आपकी दृष्टि के एक बिन्दु में मानो स्वर्णधारा के समान प्रवाहित होता है। वह मंगलमयी धारा मेरे घर और हृदय में प्रवेश करके सदा वसन्त जैसी शुभता बनाए रखे।

​🍁
नैवास्ति मे गणनया गुणकीर्तनं ते
नापि स्तुतौ योग्यपदप्रयोगः।
मौनं तु यत् ते परमं रहस्यं
तत्रैव मे मनसि भक्तिरचलास्तु॥१८॥

​अर्थ— आपके गुणों का पूर्ण वर्णन करने की मुझमें सामर्थ्य नहीं है। उचित शब्दों से स्तुति करने की योग्यता भी नहीं है। आपके मौनमय परम रहस्य में ही मेरी भक्ति अचल बनी रहे।

​🍁
या सौम्यता तव वपुः परितो वहन्ती
मातृभावमधुरेण जगत् पुनाति।
तां त्वां विलोकयतो मे न भयस्य छाया
प्रसरेत् कदाचन॥१९॥

​अर्थ— आपके स्वरूप से प्रवाहित होने वाली सौम्यता मातृभाव की मधुरता से जगत् को पवित्र करती है। आपका दर्शन करने वाले मेरे जीवन में भय की छाया भी कभी न रहे।

​🍁
त्वं जीवितस्य परमा परिपूर्णता च
त्वं शान्तिरन्तरहृदि विहिता सुगूढा।
त्वत्सन्निधौ न खलु याचनया प्रयोजनं
दृष्टिस्तवैव वरदा हि सर्वसिद्धिः॥२०॥

​अर्थ— आप जीवन की परम पूर्णता और हृदय में स्थित गूढ़ शान्ति हैं। आपके सान्निध्य में अलग से याचना की आवश्यकता नहीं; आपकी वरद दृष्टि ही समस्त मंगल और सिद्धि प्रदान करने वाली है।

​🍁
एवं शतपत्रिकापाटलप्रभे त्वां नित्यं
ये चिन्तयन्ति हृदि सौम्यरूपाम्।
तेषां गृहे स्वयमिव सौभाग्यलक्ष्मीः
सानन्दनृत्यमिव नित्यं प्रविशेत्॥२१॥

​अर्थ— जो साधक शतपत्रिका-पाटलप्रभा लक्ष्मी के सौम्य स्वरूप का नित्य हृदय में ध्यान करते हैं, उनके घर में सौभाग्य और मंगल की श्री मानो आनन्दपूर्वक नृत्य करती हुई प्रवेश करती है।

​🍁
पाटलपुष्पसुगन्धं तव गात्रे वहन्ती
शतपत्रं हृदि नादयति प्रेमरागम्।
या त्वं त्रिजगतीश्वरी शक्तिरूपा
सा मे कष्टानि हरतु लक्ष्मि नमस्ते॥२२॥

​अर्थ— आपके शरीर से पाटल-पुष्प की सुगन्ध प्रवाहित होती है और शतपत्री-पुष्प की मधुर सुगन्ध एवं कोमलता के समान मेरे हृदय में प्रेम और अनुराग का मधुर स्पन्दन जाग्रत होता है। हे त्रिभुवन की अधीश्वरी लक्ष्मी! आप शक्तिरूपिणी होकर मेरे सभी कष्टों को दूर करें।

​🍁
पाटलकामकुसुमकोमलकान्तिरूपे
रक्तारुणांशुरिव भासि महेशि।
यस्य त्वदीयं करुणामृतदर्शनं स्यात्
तस्यालये नित्यसुखं विवर्धेत्॥२३॥

​अर्थ— हे देवी! आप पाटल-कामकुसुम की कोमल कान्ति के समान तथा अरुण सूर्यकिरण के समान प्रकाशित होती हैं। जिसे आपका करुणामृतमय दर्शन प्राप्त हो, उसके घर में नित्य सुख की वृद्धि हो।

​🍁
शतपत्रस्य सौगन्ध्यं यथा वायुं प्रपूरयति देवि।
तथैव त्वत्कृपा गृहं पूरयतु श्रीधनधान्यैः॥
काम्ये लक्ष्मि पाटलप्रभे नमामि त्वां पुनः पुनः।
दारिद्र्यदोषं नाशय प्रेमसौख्यं प्रदेहि मे॥२४॥

​अर्थ— जैसे शतपत्री-पुष्प की सुगन्ध वायु को भर देती है, वैसे ही आपकी कृपा मेरे घर को धन-धान्य और श्री से भर दे। हे काम्ये पाटलप्रभा लक्ष्मी! दरिद्रता का नाश करके प्रेम और सुख प्रदान करें।

​🍁
पाटलदलसुकुमारं तव नेत्रयुगलं रागसारस्पन्दितम्।
या दृष्टिः शोकसन्तापं हरति सा मे प्रसन्नमुखचन्द्रमाधारः॥२५॥

​अर्थ— आपके नेत्र पाटल की कोमल पंखुड़ियों के समान हैं और अनुराग से स्पन्दित हैं। आपकी जो कृपादृष्टि शोक और संताप को दूर करती है, वही मेरे जीवन का आधार बने।

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पाटलपुष्पस्य यथा वसन्ते रसः समुल्लसति हृदि हर्षयन्।
तथैव त्वं प्रेमबीजं मम हृदि रोपयित्वा दाम्पत्यं माधुर्ययुक्तं कुरु।
कलहं हर देवि शतपत्रिके नमोऽस्तु ते॥२६॥

​अर्थ— जैसे वसन्त में पाटल-पुष्प का रस प्रस्फुटित होकर आनन्द देता है, वैसे ही मेरे हृदय में प्रेम का बीज स्थापित करें। दाम्पत्य जीवन में माधुर्य भरें और कलह दूर करें।

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पाटलपुष्पमध्यस्था सुवर्णाभेव भासि त्वम्।
शतपत्रं विकास्यैव धनधान्यप्रदायिनि।
त्वत्पादपङ्कजरजःस्पर्शपावितं गृहं मे समृद्धिमद्भवतु॥२७॥

​अर्थ— हे देवी! आप पाटल-पुष्प के मध्य स्वर्णाभा के समान प्रकाशित होती हैं। शतपत्री-पुष्प को विकसित करने वाली और धन-धान्य प्रदान करने वाली हैं। आपके चरणकमल की कृपा से मेरा घर समृद्ध हो।

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सुगन्धिपाटलदलवत् कोमलं भवतु मे मनः।
तथैव त्वत्स्मितसुधा हृदयं मे शीतलं करोतु।
कष्टं निवारय सौभाग्यं विवर्धय काम्ये लक्ष्मि गृहशान्तिं प्रदेहि मे॥२८॥

​अर्थ— मेरा मन सुगन्धित पाटल की पंखुड़ी के समान कोमल बने और आपकी मुस्कानरूपी अमृतधारा मेरे हृदय को शीतल करे। मेरे कष्ट दूर कर सौभाग्य और गृहशान्ति प्रदान करें।

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शतपत्रे तव संनादादुद्भवन्तु प्रेमरागध्वनयः।
दुःखकाननं विनाश्य प्रेमसागरं प्रदेहि मे।
संसारसुखसिद्धिश्च नित्यं मम जायेत॥२९॥

​अर्थ— हे शतपत्रिके! आपके शतपत्री-पुष्पस्वरूप की मधुर सुगन्ध और स्पन्दन से प्रेम एवं अनुराग के भाव उत्पन्न हों। वे दुःखरूपी वन का नाश करें और प्रेम का सागर प्रदान करें। मेरे जीवन में मंगलमय सांसारिक सुख की सिद्धि हो।

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पाटलस्येव स्पन्देन प्राणाः संनादिता इव।
तथैव त्वं मम चेतो जागरय सौम्यरूपिणि।
समृद्धिं सौख्यदाम्पत्यं च प्रदेहि शतपत्रिके॥३०॥

​अर्थ— जैसे पाटल-पुष्प का सूक्ष्म स्पन्दन प्राणों को आनन्दित करता है, वैसे ही आप मेरे चित्त को जाग्रत करें। समृद्धि, सुख और दाम्पत्य-सौहार्द प्रदान करें।

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पाटलसौरभसङ्गिनि तव गात्रलावण्यदीप्तिः।
रक्तारुणप्रभया त्रिगुणमध्यं विराजते।
करुणादृष्टिमयी लक्ष्मि गृहेषु नित्यं सुखं वसतु॥३१॥

​अर्थ— पाटल की सुगन्ध से युक्त आपका लावण्य रक्तारुण प्रभा से प्रकाशित है। आपकी करुणामयी दृष्टि से भक्तों के घरों में नित्य सुख का वास हो।

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पाटलप्रभासमुद्भूते श्रींह्रींमन्त्रस्वरूपिणि।
रागशक्तिसमाविष्टे गुह्यलक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥३२॥

​अर्थ— हे पाटलप्रभा से प्रकाशित, श्रीं-ह्रीं मन्त्रस्वरूपिणी तथा अनुरागशक्ति से युक्त गुह्यलक्ष्मी! आपको नमस्कार है।

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शतपत्रान्तरे नित्यं हृदयाम्भोजमध्यगा।
अदृश्या दृश्यरूपेण सिद्धिं ददासि नित्यदा॥३३॥

​अर्थ— आप शतपत्री-पुष्प के मध्य तथा हृदय-कमल के मध्य नित्य स्थित रहती हैं। सूक्ष्म रूप से अदृश्य होते हुए भी साधक को सिद्धि प्रदान करती हैं।

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पाटलप्रभया देवि मनोमण्डलमावृतम्।
यत्र त्वं तिष्ठसे तत्र क्लेशो नोपपद्यते॥३४॥

​अर्थ— हे देवी! जहाँ आपकी पाटलप्रभा मनोमण्डल को आवृत कर लेती है, वहाँ मानसिक क्लेश टिक नहीं पाता।

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रक्तारुणे रागरते सौम्ये सर्वार्थदायिनि।
काम्यशक्तिस्वरूपे त्वं मम गुह्यं सदावतु॥३५॥

​अर्थ— हे रक्तारुण, अनुरागमयी, सौम्य और सर्वार्थदायिनी देवी! आप काम्यशक्ति के स्वरूप में मेरे आन्तरिक रहस्यों की रक्षा करें।

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न गृह्यसे त्वया शब्दैर्न केवलं कर्मणा शुभे।
भक्त्या त्वं प्रसन्ना स्याः गुह्यलक्ष्मि प्रकाशसे॥३६॥

​अर्थ— हे शुभे! आप केवल शब्दों अथवा कर्मकाण्ड से प्राप्त नहीं होतीं; शुद्ध भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं प्रकट होती हैं।

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पाटलप्रभया लक्ष्मीः प्रकटाऽप्रकटस्वरूपिणी।
सा मे नित्यं गृहे तिष्ठेद् हृदि चापि स्थिरा भवेत्॥३७॥

​अर्थ— पाटलप्रभा-लक्ष्मी प्रकट और अप्रकट दोनों स्वरूपों में विद्यमान हैं। वे मेरे घर में नित्य निवास करें और मेरे हृदय में भी स्थिर रहें।

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ॐ गुह्यलक्ष्मीः शिरः पातु पाटलप्रभया मम।
नेत्रे रागमयी पातु हृदि श्रींकाररूपिणी॥३८॥

​अर्थ— गुह्यलक्ष्मी पाटलप्रभा के रूप में मेरे मस्तक की रक्षा करें, रागमयी शक्ति मेरे नेत्रों की तथा श्रींकाररूपिणी शक्ति मेरे हृदय की रक्षा करे।

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कण्ठे ह्रींकारसंयुक्ता वाचं मे शुद्धयेत् शुभा।
हस्तयोः सिद्धिदा पातु पादयोः सौभाग्यदायिनी॥३९॥

​अर्थ— ह्रींकारशक्तियुक्त देवी मेरी वाणी को शुद्ध करें, मेरे हाथों की रक्षा करके सिद्धि दें और मेरे चरणों को सौभाग्य प्रदान करें।

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गृहे पाटलसौरभ्यं कलहं नाशयेद् ध्रुवम्।
दृष्टिदोषं दरिद्रत्वं पाटलप्रभया हर॥४०॥

​अर्थ— हे देवी! आपके पाटल-सौरभ से घर का कलह दूर हो और आपकी पाटलप्रभा से दरिद्रता तथा सभी अमंगलकारी दृष्टिदोषों का निवारण हो।

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यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र स्थिरा भव।
गुह्यभावेन मां देवि रक्ष सर्वत्र सर्वदा॥४१॥

​अर्थ— जहाँ-जहाँ मेरा मन जाए, वहाँ-वहाँ आपकी सूक्ष्म उपस्थिति बनी रहे। हे देवी! अपने दिव्य भाव से मेरी हर समय और हर दिशा में रक्षा करें।

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न दृश्यसे न विज्ञेया न स्पृश्यसे न चोच्यसे।
एवं त्वां साधये लक्ष्मि गुह्यभावेन सर्वदा॥४२॥

​अर्थ— हे लक्ष्मी! आप स्थूल इन्द्रियों से न देखी जाती हैं, न पूर्णतः जानी जाती हैं, न स्पर्श की जा सकती हैं, न शब्दों में बाँधी जा सकती हैं। मैं सदैव इसी सूक्ष्म भाव से आपकी साधना करता हूँ।

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पाटलप्रभया देवि हृदि नित्यं प्रतिष्ठिता।
मम वंशे मम गेहे श्रीः स्थिरा भव सर्वदा॥४३॥

​अर्थ— हे देवी! पाटलप्रभा के रूप में आप मेरे हृदय में नित्य प्रतिष्ठित रहें तथा मेरे घर और वंश में श्री स्थिर बनी रहे।

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हे पाटलप्रभे देवि काम्ये लक्ष्मि कृपामयि।
अमृतं ते कटाक्षाख्यं कवचं मे सदावतु॥
सर्वतो मां सदा रक्ष दुःखशोकौ विनाशय।
जय त्वं शतपत्रिके॥४४॥

​अर्थ— हे पाटलप्रभा, काम्य लक्ष्मी! आपका अमृतमय कृपाकटाक्ष मेरे लिए कवच बने। चारों ओर से मेरी रक्षा करे तथा दुःख और शोक का नाश करे। हे शतपत्रिके! आपकी जय हो।

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पाटलप्रभा गुह्यलक्ष्मीः साक्षाच्छ्रीनारायणप्रिया।
रक्षतु मां गृहं वंशं हृदिस्था मे नमोऽस्तु ते॥४५॥

​अर्थ— पाटलप्रभा गुह्यलक्ष्मी, जो साक्षात् श्रीनारायण की प्रिया हैं, मेरे, मेरे घर और वंश की रक्षा करें। हृदय में स्थित उन देवी को नमस्कार है।

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शतपत्रिकेति या प्रोक्ता लौकिके केवलं कुसुमम्।
साधकानां हृदि सा तु चेतनाचक्ररूपिणी॥४६॥

​अर्थ— संसार में जिसे सामान्यतः केवल शतपत्री पुष्प कहा जाता है, साधक के हृदय में वही शतपत्रिका सूक्ष्म चेतना के विस्तृत चक्ररूप में अनुभव की जाती है।

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पाटलारुणवर्णा त्वं न रागे न विरागिणी।
रजःसत्त्वसमायुक्ता मध्यशक्तिरुदाहृता॥४७॥

​अर्थ— हे देवी! आपकी पाटल-अरुण आभा है। आप न आसक्ति में बँधी हैं, न विरक्ति में। रज और सत्त्व के संतुलित संयोग से युक्त मध्यशक्ति के रूप में आपका ध्यान किया जाता है।

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काम्या न कामभोगार्थं काम्या चित्तप्रबोधिनी।
इच्छाशक्तिस्वरूपा त्वं सङ्कल्पसिद्धिदायिनी॥४८॥

​अर्थ— हे देवी! आपकी काम्यता केवल भोग के लिए नहीं, बल्कि चित्त को जाग्रत करने वाली मंगलमयी इच्छा है। आप इच्छा-शक्ति की अधिष्ठात्री और संकल्प-सिद्धि प्रदान करने वाली हैं।

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कटाक्ष इति यो लोके नेत्रचेष्टा प्रकीर्तिता।
स एव शक्तिसञ्चारः साधकस्य शुभे पथि॥४९॥

​अर्थ— संसार में जिसे केवल नेत्रों की चंचलता कहा जाता है, साधक के लिए वही करुणामयी शक्ति के सूक्ष्म संचार का प्रतीक बन सकता है।

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यन्मुखं तव सौन्दर्यं विष्णोरपि मनोहरम्।
न मोहः स तु देवेशि प्रकृतिपुरुषैक्यम्॥५०॥

​अर्थ— हे देवेशि! आपका मुख-सौन्दर्य स्वयं विष्णु के मन को भी आनन्दित करता है। यह लौकिक मोह नहीं, बल्कि प्रकृति और पुरुष के दिव्य सामंजस्य का प्रतीक है।

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यत्र पादाम्बुजस्पर्शाद् वसुधा स्पन्दते पुनः।
तत्र मूलाधरे देवि चेतनाशक्तिरुद्बुध्यते॥५१॥

​अर्थ— जहाँ आपके चरणकमल का स्पर्श होता है, वहाँ पृथ्वी पुनः स्पन्दित होती है और साधक के मूलाधार में सुप्त चेतना-शक्ति के जागरण का भाव उत्पन्न होता है।

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नाडीमध्ये यदा ध्याने शतपत्री प्रबुध्यते।
तदा प्राणः प्रसन्नात्मा सौम्यं पदमवाप्नुयात्॥५२॥

​अर्थ— जब ध्यान में नाड़ियों के मध्य शतपत्री-शक्ति का भाव जाग्रत होता है, तब प्राण अधिक शान्त और सौम्य अवस्था की ओर अग्रसर होते हैं।

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या दृष्टिः करुणायुक्ता या दृष्टिर्मौनभूषिता।
सा शक्तिः परमा देवि न केवलं मन्त्रयन्त्रयोः॥५३॥

​अर्थ— करुणा और मौन से युक्त आपकी दृष्टि परम शक्ति का अनुभव कराती है। देवी की कृपा केवल बाहरी मन्त्र और यन्त्र तक सीमित नहीं है।

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न जपे न तपःक्लेशे न बाह्याचारविस्तरे।
त्वत्स्मरणप्रसादेन चित्तं शुद्धिमश्नुते॥५४॥

​अर्थ— केवल बाहरी आडम्बर या तप के क्लेश से नहीं, बल्कि आपके पवित्र स्मरण से चित्त में शुद्धि और शान्ति उत्पन्न होती है।

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यत्र त्वं शतपत्रीति हृदि भावेन संस्थिता।
तत्र श्रीः सर्वदा तिष्ठेत् त्वमेव श्रीः सनातनी॥५५॥

​अर्थ— जहाँ आप शतपत्री-पुष्पस्वरूपिणी के भाव से हृदय में स्थित हैं, वहाँ श्री का नित्य वास रहता है; क्योंकि आप स्वयं सनातन श्रीस्वरूपा हैं।

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न रूपे न च नाम्नि त्वं न स्त्री न च पुमानसि।
साक्षिशक्तिस्वरूपा त्वं स्पन्दमात्रस्वरूपिणी॥५६॥

​अर्थ— परम तत्त्व में आप किसी सीमित रूप या नाम में बँधी नहीं हैं। आप साक्षीशक्ति और चेतन-स्पन्दनस्वरूपिणी हैं।

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मौनं तव परं रूपं मौनं ते परमा क्रिया।
मौनात् स्पन्दः समुत्पन्नो जगदाकाररूपधृक्॥५७॥

​अर्थ— मौन आपका परम रूप और परम क्रिया है। उसी मौन से चेतना का स्पन्दन प्रकट होकर जगत् के विविध रूपों को धारण करता है।

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यत्र त्वं तत्र न क्लेशो न शून्यता न वै भयम्।
त्वद्भावस्पर्शमात्रेण पुष्पायति मनोवनम्॥५८॥

​अर्थ— जहाँ आपका दिव्य भाव है वहाँ क्लेश, रिक्तता और भय नहीं टिकते। आपके भाव-स्पर्श मात्र से मन का वन पुष्पित हो उठता है।

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शतपत्रिसुगन्धेन यथा कक्षः प्रपूर्यते।
तथा त्वं प्रेमभावेन गृहं सर्वं सुवासय॥५९॥

​अर्थ— जैसे शतपत्री-पुष्प की सुगन्ध पूरे कक्ष को भर देती है, वैसे ही आप प्रेमभाव से मेरे सम्पूर्ण गृह को मधुरता, सौहार्द और शुभता से सुवासित करें।

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सौन्दर्यलावण्यनिधे कान्तिकान्तारहारिणि।
हृदयानन्दजननि काम्ये लक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥६०॥

​अर्थ— हे सौन्दर्य और लावण्य की निधि, हृदय में आनन्द उत्पन्न करने वाली काम्य लक्ष्मी! आपको नमस्कार है।

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अनुरागरसे स्निग्धे सौम्यभावप्रकाशिनि।
दाम्पत्यसुखदात्र्यै श्रीलक्ष्म्यै सततं नमः॥६१॥

​अर्थ— अनुराग-रस से स्निग्ध, सौम्यभाव को प्रकाशित करने वाली तथा दाम्पत्य-सुख देने वाली श्रीलक्ष्मी को सदा नमस्कार है।

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पतिप्रिये पतिव्रत्यसौभाग्यसमन्विते।
यया विना न शोभन्ते गृहाः प्रेमविवर्जिताः॥६२॥

​अर्थ— हे पति-प्रिये, पतिव्रत-धर्म और सौभाग्य से युक्त देवी! आपके बिना प्रेमरहित गृह अपनी वास्तविक शोभा खो देते हैं।

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कलहक्षयकारिण्यै मैत्रीसंवर्धिनि शुभे।
दाम्पत्यरसमाधुर्ये नित्यं नृत्यन्तु ते गुणाः॥६३॥

​अर्थ— हे कलह का नाश करने वाली और मैत्री बढ़ाने वाली शुभे! आपके गुण दाम्पत्य के मधुर प्रेम में नित्य प्रकट होते रहें।

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शीतलास्ये प्रसन्नाङ्गि चन्द्रकान्तिसमप्रभे।
शोकतापप्रशमिन्यै शतपत्रिके नमो नमः॥६४॥

​अर्थ— हे शीतल मुख वाली, प्रसन्न अंगों वाली और चन्द्रकान्ति के समान प्रभायुक्त शतपत्रिके! शोक और ताप को शांत करने वाली आपको बार-बार नमस्कार है।

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परस्परसमर्पणं यद् भावेनैव विराजते।
अहङ्कारविनाशिन्यै लक्ष्म्यै ते सततं नमः॥६५॥

​अर्थ— जो देवी परस्पर समर्पण और प्रेम को सुशोभित करती हैं तथा अहंकार का नाश करती हैं, उन लक्ष्मी को सदा नमस्कार है।

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यत्र त्वं तत्र वाक्सौम्यं यत्र त्वं तत्र सौहृदम्।
यत्र त्वं तत्र सौभाग्यं शतपत्रिके नमो नमः॥६६॥

​अर्थ— जहाँ आपका वास है वहाँ वाणी में मधुरता, हृदय में सौहृदय और जीवन में सौभाग्य रहता है। हे शतपत्रिके! आपको बार-बार नमस्कार है।

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क्रोधलोभमलान् सर्वान् मोहदोषांश्च नाशय।
सौम्यभावं जनाः सर्वे लभन्तां त्वत्प्रसादतः॥६७॥

​अर्थ— क्रोध, लोभ और मोह के सभी दोषों का नाश करें। आपकी कृपा से सभी प्राणी सौम्यभाव और सद्भाव प्राप्त करें।

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भक्तिहीनं च शुष्कं च चेतो मे यदा भवेत्।
तदा त्वं पाटलप्रभे प्रेमामृतरसेन सिञ्च॥६८॥

​अर्थ— जब मेरा चित्त भक्ति से रहित और शुष्क हो जाए, तब हे पाटलप्रभे! उसे प्रेमरूपी अमृत से सींचकर पुनः सरस बना दें।

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प्रेम्णा संयोज्य दाम्पत्यं सौहार्दे स्थापयस्व नः।
परिवारं सुखपूर्णं कुरु देवि दयामयि॥६९॥

​अर्थ— हमारे दाम्पत्य को प्रेम से जोड़कर सौहार्द में स्थिर करें और हे दयामयी देवी! हमारे परिवार को सुख और पूर्णता से भर दें।

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पुत्रपौत्रकलत्रैश्च स्नेहबन्धं दृढं कुरु।
कुटुम्बे तव वासेन स्वर्गसौख्यं प्रवर्धताम्॥७०॥

​अर्थ— पुत्र, पौत्र और जीवनसाथी के साथ स्नेह का बन्धन दृढ़ करें। आपके मंगलमय वास से परिवार में स्वर्गसदृश सुख की वृद्धि हो।

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शतपत्रिके काम्ये लक्ष्मि गृहेषु नित्यवासिनि।
अनुरागं सुखं शान्तिं वर्धयस्व नमोऽस्तु ते॥७१॥

​अर्थ— हे शतपत्रिका, काम्ये लक्ष्मी! जो गृहों में नित्य निवास करने वाली हैं, आप प्रेम, सुख और शान्ति को निरन्तर बढ़ाएँ। आपको नमस्कार है।

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यया संयोज्यते हृद्योर् द्वयोः प्रेमसुधास्रवः।
तस्याः प्रसादतः श्रीस्तु गृहे वसति नित्यशः॥७२॥

​अर्थ— जिनकी कृपा से दो हृदय प्रेमामृत की धारा से जुड़ते हैं, उन्हीं की कृपा से उस गृह में श्री का नित्य वास होता है।

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शतपत्रे तव संनादादुद्भवन्तु सुगन्धयः।
तथैव प्रेमसङ्गीतं कलहं वारयेद् नृणाम्॥७३॥

​अर्थ— हे शतपत्रिके! आपके शतपत्री-पुष्पस्वरूप से प्रस्फुटित होने वाली सुगन्ध चारों ओर फैलती रहे और उसी प्रकार प्रेम का मधुर संगीत मनुष्यों के कलह को दूर करे।

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मूलादूर्ध्वं प्रचलन्तु नाडीसौम्यस्पन्दनानि ते।
त्वत्प्रसादेन मे सर्वे सङ्कल्पाः सिद्धिमाप्नुयुः॥७४॥

​अर्थ— हे देवी! आपकी कृपा से नाड़ियों में मूलाधार से ऊपर की ओर सौम्य चेतन-स्पन्दन प्रवाहित हों और मेरे सभी मंगलमय संकल्प सिद्ध हों।

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काम्ये देवि तव कटाक्षेण धनधान्यविवर्धनम्।
पूर्णचन्द्रप्रभेवैव पूर्णतां मे प्रयच्छ नः॥७५॥

​अर्थ— हे काम्ये देवी! आपके कृपाकटाक्ष से धन और धान्य की वृद्धि हो तथा पूर्णिमा के चन्द्रमा की पूर्ण प्रभा के समान मेरे जीवन में पूर्णता और समृद्धि आए।

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🌺॥ पाठफल प्रार्थना ॥🌺

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हे मातर्जगतां जननि स्तोत्रमेतदनुत्तमम्।
यः पठेच्छ्रद्धया भक्त्या तव पादपरायणः।
तस्य त्वं करुणापूर्णा प्रसन्ना भव शाश्वती।
सुखशान्तिसमृद्ध्यर्थं कृपादृष्टिं निवेशय॥७६॥

​अर्थ— हे जगत् की जननी माता! जो साधक आपके इस स्तोत्र का श्रद्धा और भक्ति के साथ, आपके चरणों में समर्पित होकर पाठ करता है, उस पर आप सदा करुणापूर्वक प्रसन्न रहें और उसके जीवन में सुख, शान्ति, सौभाग्य तथा समृद्धि के लिए अपनी कृपादृष्टि बनाए रखें।

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🌷 ॥ इति श्रीपण्डित-अनिरुद्ध-शास्त्रिविरचितं
श्रीशतपत्रिका-पाटलप्रभा-लक्ष्मीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ 🌷

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🌷🌷श्री अष्टप्रासाष्टकम्  हिन्दी अर्थ सहित 🌷🌷🍁​शक्राद्यामरसन्नुताङ्घ्रियुगलं चक्रायुधाद्यर्चितं नक्रग्रस्तशिशुप्रदानचतुरं...
21/08/2026

🌷🌷श्री अष्टप्रासाष्टकम् हिन्दी अर्थ सहित 🌷🌷

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​शक्राद्यामरसन्नुताङ्घ्रियुगलं चक्रायुधाद्यर्चितं नक्रग्रस्तशिशुप्रदानचतुरं शुक्राविसोमाक्षिकम्।
विक्रान्तं श्रुतिमस्तकेषु चरणाब्जाक्रान्तयम्याशयं चक्रारिष्टरसाशताङ्गसुमहच्चक्रं महेशं भजे ॥ १॥
​अर्थ:
जिनके चरण-युग्म इन्द्र आदि देवताओं द्वारा पूजित हैं, चक्रधारी विष्णु आदि द्वारा जो अर्चित हैं, जो ग्राह (मगरमच्छ) के चंगुल से फंसे शिशु (गजेन्द्र या अन्य भक्त) की रक्षा करने में चतुर हैं, जिनके नेत्र सूर्य, अग्नि और चन्द्रमा हैं, जो वेदों के शीर्ष (उपनिषदों) पर विराजमान हैं, जिनके चरण-कमलों ने यमराज के आशय/बल को पददलित कर दिया है, और जो महान चक्रस्वरूप हैं, उन महेश्वर का मैं भजन करता हूँ।
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​अष्टात्मानमपारसंसृतिदवप्लुष्टात्मनां शान्तिदं शिष्टान्विष्टपदारविन्दमुमया श्लिष्टाङ्गमत्याशया।
दिष्टान्तानभियुक्तमौनितनयं कष्टापहं सेवतामिष्टं सज्जनसंहतेर्विधिसमादिष्टात्मकाङ्घ्रिं भजे ॥ २॥
​अर्थ:
जो आठ रूपों वाले (अष्टमूर्ति), अपार संसार रूपी दावानल से तप्त जीवों को शान्ति देने वाले, सज्जनों द्वारा अभीष्ट पदाविन्द वाले, माता उमा से आलिंगित अंगों वाले, भक्तों के कष्टों को दूर करने वाले तथा सज्जन समूह के लिए अभीष्ट फलदायक हैं, ब्रह्मा जी द्वारा जिनके चरणों की वंदना की गई है, उन भगवान शिव का मैं भजन करता हूँ।
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​श‍ृङ्गारामितलोलमद्रिसुतया सङ्गं वृषे गामिनं गङ्गाचन्द्रजटाविराजिमकुटं पिङ्गाननातिप्रियम्।
अङ्गासङ्गितमन्मथा बहुकृपापाङ्गं त्रिशूलायुधं लिङ्गार्चापरदत्तसर्वपुरुषार्थं गेयवीर्यं भजे ॥ ३॥
​अर्थ:
जो पर्वतराज पुत्री (पार्वती जी) के साथ शृंगार भाव में लीन रहते हैं, वृषभ पर सवारी करते हैं, जिनकी जटाओं में गंगा और चंद्रमा सुशोभित हैं, जिन्हें पिङ्गानन (नंदी आदि) अत्यंतप्रिय हैं, जिनके अंग से मन्मथ (कामदेव) जुड़े हैं (या जिन्होंने कामदेव को भस्म किया/अंगहीन किया), जिनकी कृपा दृष्टि अपार है, जो त्रिशूल धारण करते हैं, और लिंग रूप में पूजा करने वालों को सभी पुरुषार्थ प्रदान करते हैं, जिनके पराक्रम गाने योग्य हैं, उन शिव का मैं भजन करता हूँ।
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​कुण्ठं भक्तजनाहितस्य परमोत्कण्ठास्पदं स्वस्त्रियः कण्ठालङ्कृतनागमाशुगि(जि)तवैकुण्ठाधिपं शङ्करम्।
कण्ठस्थापितकालकूटविषमुत्कण्ठादिषट्कापहं कुण्ठात्मानभिगम्यमानचरितं कण्ठातिनीलं भजे ॥ ४॥
​अर्थ
: जो भक्तों के शत्रुओं के लिए कुण्ठ (अमोध/प्रखर), अपनी शक्ति (पार्वती) के लिए परम प्रेम केस्पद, गले में सर्प आभूषण के रूप में धारण करने वाले, जिन्होंने अपने वेग से वैकुण्ठनाथ (विष्णु) को भी जीत लिया है (या जिनके अधीन वैकुण्ठ है), जिनके कंठ में कालकूट विष स्थापित है, जो काम-क्रोध आदि छह विकारों को दूर करने वाले हैं, और जिनका कंठ अत्यंत नीला (नीलकंठ) है, उन शंकर का मैं भजन करता हूँ।
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​अण्डानामखिलस्य नाथमुडुराट्कुण्डं कृपासागरं शुण्डावक्त्रमुखोग्रपाण्ड्यजनकं दण्डायुधारिं शिवम्।
काण्डाकारितवेदफेरु(रूप)ममरोद्दण्डं पुरद्वेषिणं चण्डीप्राणपतिं सुधाशनपतेः शुण्डावदर्च्यं भजे ॥ ५॥
​अर्थ:
जो संपूर्ण ब्रह्मांडों के नाथ, नक्षत्रराज (चंद्रमा) के कुंड, कृपा के सागर, गजानन (सुण्डावक्त्र) के पिता, दण्ड धारण करने वाले, पुरद्वेषी (त्रिपुरासुर का नाश करने वाले), माता चण्डी के प्राणवल्लभ और देवताओं द्वारा पूजित हैं, उन शिव का मैं भजन करता हूँ।
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​हिक्कामुख्यगदाधितापपटलीधिक्कारिदिव्याह्वयं ढक्कादुन्दुभिकाहलाद्यविरमसृक्काबृहत्कुक्षिखम्।
ढक्कामद्रुहमीशितारमतसी सृक्कालिमग्रीवमुं त्वक्कायच्छदमीदृशं खनिजभान्यक्कारिदेहं भजे ॥ ६॥
​अर्थ:
जिनकी दिव्य संज्ञा हिक्का आदि शारीरिक रोगों के समूह का धिक्कार करने वाली (उन्हें दूर करने वाली) है, जिनके उत्सव में ढक्का, दुन्दुभि और काहल आदि वाद्य गूँजते हैं, जो बड़े उदर वाले और डमरू (ढक्का) बजाने में ईशितार हैं, जिनके कंठ की रेखाएँ असी के फूल या नीले कमल जैसी हैं, और जिनका शरीर सूर्य की प्रभा को भी तिरस्कृत करने वाला है, उन महेश्वर का मैं भजन करता हूँ।
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​भर्गाख्यं परमेश्वरं त्रिजगतां सर्गादिहेतुं मृडं
दुर्गाधीशमनन्तमेकमजरं दुर्गापहं ध्यायताम्।
​अर्थ:
जिन्हें 'भर्ग' कहा जाता है, जो तीनों लोकों के परमेश्वर, सर्ग (सृष्टि) आदि के कारण, कल्याणकारी (मृड), दुर्गा (पार्वती) के स्वामी, अनंत, एक, अजर, और स्मरण करने वालों के सभी संकटों (दुर्गा) को हरने वाले हैं, उन भगवान का मैं ध्यान करता हूँ।
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​गर्गागस्त्यवसिष्ठमुख्यसुतपद्वर्गान्तरङ्गालयं
स्वर्गानोकहमर्थिनां पशुपतिं स्वर्गामिवन्द्यं भजे ॥ ७॥
​अर्थ: जो गार्ग्य, अगस्त्य और वशिष्ठ जैसे महान ऋषियों व तपस्वियों के अंतःकरण में निवास करते हैं, जो याचकों के लिए कल्पवृक्ष (स्वर्गानोकह) के समान हैं, जो समस्त जीवों के स्वामी (पशुपति) हैं और जिनकी वंदना स्वर्ग के देवता भी करते हैं, उन पशुपति का मैं भजन करता हूँ।
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​अष्टप्रासाष्टकं शम्भोरिष्टं भक्त्या पठन्ति ये।
इष्टा भवन्ति श्रीगन्धपुष्टिकाननवासिनः ॥ ८॥
​अर्थ: जो लोग शंभु के इस प्रिय 'अष्टप्रासाष्टक' का भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं, वे श्री, यश, पुष्टि और आरोग्य से युक्त होकर अंततः परम पद को प्राप्त होते हैं।
​॥ इति श्रीअष्टप्रासाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

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