LIC_ Life Insurance corporation of India

LIC_ Life Insurance corporation of India New Knowledge

28/08/2026
04/08/2026

*राष्ट्रीय जागृति विमर्श: वैचारिक मसौदा (Draft)*

*प्रस्तुतकर्ता: संजय कुमार चौटाला*

विषय: आदिगुरु शंकराचार्य के अद्वैत ज्ञान की 'वैचारिक हत्या' और आधुनिक भारत का आध्यात्मिक पुनर्जागर

1. प्रस्तावना (Introduction)
भारत का मूल आधार 'ज्ञान' और 'विवेक' रहा है, न कि अंधाधुंध अंधविश्वास। आज से 1300 वर्ष पूर्व एक 16 वर्षीय युवा संन्यासी आदिगुरु शंकराचार्य ने देश के बड़े-बड़े कर्मकांडी विद्वानों (जैसे मंडन मिश्र) को पराजित कर यह सिद्ध किया था कि मोक्ष या स्वतंत्रता केवल 'आत्मज्ञान' (Self-Realization) से मिल सकती है, बाहरी कर्मकांडों या यज्ञों से नहीं। लेकिन आज विडंबना यह है कि उन्हीं के द्वारा स्थापित चारों धाम और मठ केवल कर्मकांड के व्यापारिक केंद्र बनकर रह गए हैं। देश को इस ऐतिहासिक और वैचारिक विरोधाभास से अवगत कराना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है।
------------------------------
2. मुख्य विमर्श बिंदु (Core Discussion Points) # # क) मात्र 32 वर्ष की आयु में महासमाधि: रहस्य या ऐतिहासिक षड्यंत्र?

* आधुनिक दृष्टिकोण: एक ऐसा योगी जिसने पूरे भारत को वैचारिक रूप से जीत लिया, जिसने सनातन धर्म को पुनर्जीवित किया, वह मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में अचानक केदारनाथ की बर्फ में विलीन (महासमाधि) कैसे हो गया?
* तर्क: इतिहास गवाह है कि आदिगुरु ने उस समय के उग्र, हिंसक और तामसिक संप्रदायों (कापालिक, शाक्त आदि) की दुकान बंद करवा दी थी। प्राचीन ग्रंथों में भी 'नवगुप्त' जैसे विरोधियों द्वारा उन्हें धीमा जहर (अभिचार कर्म) देने का उल्लेख है।
* निष्कर्ष: देश को यह सोचने की जरूरत है कि क्या उनकी महासमाधि महज़ एक योगिक क्रिया थी या उस समय के पराजित कर्मकांडियों और तांत्रिकों द्वारा वेदों का सहारा लेकर की गई एक 'नियोजित वैचारिक या भौतिक हत्या' थी?

# # ख) ज्योतिपुंज (ऊर्जा) का 'रूढ़िवादी' नामकरण

* आधुनिक दृष्टिकोण: शंकराचार्य एक महान वैज्ञानिक और योगी थे। उन्होंने जिन 'स्फटिक शिवलिंगों' की स्थापना की, वे वास्तव में ब्रह्मांडीय ऊर्जा के 'ज्योतिपुंज' (Energy Vortexes) थे, जिन्हें ध्यान और मानसिक एकाग्रता के लिए स्थापित किया गया था।
* तर्क: बाद के समय के स्वार्थी तत्वों और व्यवस्थापकों ने इन वैज्ञानिक ऊर्जा केंद्रों को साधारण 'देवी-देवता की मूर्ति और लिंग' की पौराणिक कथाओं में समेट दिया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि आम जनता ज्ञानमार्ग को छोड़कर केवल पूजा-पाठ और चढ़ावे तक सीमित रहे।

# # ग) विचारधारा का संस्थागत अपहरण (Systemic Hijacking)

* आधुनिक दृष्टिकोण: आदिगुरु ने नारा दिया था—"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" (अर्थात हर जीव स्वयं ब्रह्म है, कोई छोटा-बड़ा नहीं है)। उन्होंने जातिवाद और ऊंच-नीच का खंडन किया था।
* तर्क: उनके जाने के बाद, उन्हीं के मठों पर उन्हीं कर्मकांडी पुरोहितों और ब्राह्मणों का कब्ज़ा हो गया जिन्हें आदिगुरु ने शास्त्रार्थ में हराया था। जिसके परिणामस्वरूप, जो मठ 'ज्ञान और शोध' के विश्वविद्यालय होने चाहिए थे, वे आज केवल कर्मकांड के उद्गम स्थल बन गए हैं।

------------------------------
3. देश के समक्ष राष्ट्रीय आह्वान (Call to Action)
संजय कुमार चौटाला के आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार, भारत को पुनः 'विश्वगुरु' बनाने के लिए धार्मिक व्यवस्था में निम्नलिखित सुधार अनिवार्य हैं:

* मठों का लोकतांत्रीकरण और वैज्ञानिकरण: चारों धामों और मठों को केवल पूजा-पाठ के केंद्र से हटाकर 'वेदांत, विज्ञान और दर्शन' के अनुसंधान केंद्रों में बदला जाए।
* कर्मकांड के एकाधिकार की समाप्ति: धर्म के नाम पर आम जनता का आर्थिक और मानसिक शोषण बंद होना चाहिए। आदिगुरु के मूल संदेश "अहं ब्रह्मास्मि" को जन-जन तक पहुँचाया जाए, ताकि हर व्यक्ति आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बने।
* ऐतिहासिक शोध की मांग: आदिगुरु शंकराचार्य के अंतिम दिनों और उनकी महासमाधि के वास्तविक कारणों पर आधुनिक इतिहासकारों और वैज्ञानिकों द्वारा गहन शोध होना चाहिए, ताकि इतिहास के छिपे हुए सच सामने आ सकें।

------------------------------
4. उपसंहार (Conclusion)
"आदिगुरु शंकराचार्य ने शरीर छोड़ा था, लेकिन उनके विचार अमर थे। आज समय आ गया है कि हम पत्थरों और कर्मकांडों में उलझने के बजाय, आदिगुरु के उस 'ज्योतिपुंज' और 'ज्ञानमार्ग' को पहचानें जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। सनातन धर्म की असली रक्षा कर्मकांड की रक्षा में नहीं, बल्कि विवेक और ज्ञान की रक्षा में है।"

03/08/2026

*विषय: उत्तर प्रदेश विधानसभा के घटते कार्य दिवसों और निरंतर हंगामे के संबंध में जन-सरोकार का खुला पत्र।*

सेवा में,
उत्तर प्रदेश के सभी माननीय विधायक गण,
उत्तर प्रदेश विधानसभा, लखनऊ।

महोदय/महोदया,
मैं संजय कुमार चौटाला, उत्तर प्रदेश का एक सजग और सामान्य नागरिक, इस खुले पत्र के माध्यम से आप सभी माननीय जनप्रतिनिधियों का ध्यान एक अत्यंत गंभीर और चिंताजनक विषय की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। यह विषय किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा और उत्तर प्रदेश की जनता के हितों से जुड़ा है।
हम बड़े चाव और उम्मीद से आप सभी को अपना प्रतिनिधि चुनकर सदन में भेजते हैं ताकि आप हमारे क्षेत्र की समस्याओं, विकास कार्यों और प्रदेश की नीतियों पर सार्थक चर्चा कर सकें। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उत्तर प्रदेश विधानसभा के सत्रों की अवधि जिस तेजी से घट रही है, उसने हम आम नागरिकों को गहरे असमंजस और चिंता में डाल दिया है।
सदन की नियमावली के अनुसार साल भर में कम से कम 90 दिन बैठकें होनी चाहिए। लेकिन आज स्थिति यह है कि मॉनसून और शीतकालीन सत्र महज 3 से 4 दिनों में ही सिमट जा रहे हैं। इन संक्षिप्त सत्रों का अधिकांश समय भी रचनात्मक बहस के बजाय राजनीतिक गतिरोध, हंगामे, नारेबाजी और सदन के स्थगन की भेंट चढ़ जाता है।
*एक आम नागरिक के रूप में हमारे मन में कुछ गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं:

1. सदन की संक्षिप्तता: क्या मात्र 3-4 दिनों के इस संक्षिप्त सत्र में उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य की जन-समस्याओं के साथ न्याय संभव है?
2. जवाबदेही: यदि सदन में चर्चा ही नहीं होगी, तो जनहित और जनकल्याण के कार्यों पर अफसरशाही (Bureaucracy) की जवाबदेही कैसे तय होगी?
3. करदाताओं के पैसे का नुकसान: सदन की कार्यवाही चलाने में जनता के टैक्स का भारी पैसा खर्च होता है। हंगामे के कारण जब एक भी दिन नष्ट होता है, तो वह सीधे तौर पर जनता की गाढ़ी कमाई की बर्बादी है।*

लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष के बीच वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक और आवश्यक है, परंतु इन मतभेदों को प्रकट करने का माध्यम सदन का बहिष्कार या हंगामा नहीं, बल्कि तार्किक और गंभीर बहस होना चाहिए। जब सदन सुचारू रूप से नहीं चलता, तो आम जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं से भरोसा उठने लगता है।
अतः एक सामान्य नागरिक के तौर पर मेरी आप सभी माननीय विधायकों से विनम्र अपील है कि:

* सदन के भीतर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर गंभीर और अनुशासित संसदीय आचरण का परिचय दें।
* विधानसभा के सत्रों की अवधि बढ़ाने और जनहित के ज्वलंत मुद्दों पर विस्तृत चर्चा के लिए विधानसभा अध्यक्ष और अपनी-अपनी पार्टियों पर लोकतांत्रिक दबाव बनाएं।
* सरकार और विपक्ष मिलकर यह सुनिश्चित करें कि जनता की आवाज सदन के पटल पर गूंजे, न कि वह हंगामे के शोर में दब जाए।

मुझे पूरी उम्मीद है कि आप एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि के रूप में इस पत्र की भावना को समझेंगे और आगामी सत्रों को अधिक सार्थक, लंबा और परिणामोन्मुखी बनाने के लिए ठोस प्रयास करेंगे।
भवदीय,
संजय कुमार चौटाला
एक जागरूक नागरिक, उत्तर प्रदेश

30/07/2026

# सेवा में,
माननीय सांसद महोदय,
[लोकसभा / राज्यसभा निर्वाचन क्षेत्र का नाम यहाँ लिखें]
[आपके शहर/क्षेत्र का नाम]
विषय: भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के लाखों अभिकर्ताओं (एजेंटों) के रोजगार संकट, जनविरोधी नीतियों एवं नागरिकों की बचत की आदत को समाप्त करने वाली कर नीतियों के संबंध में देश के जागरूक नागरिक
एवं समस्त अभिकर्ताओं की ओर से मांग पत्र।
महोदय,
हम आपका ध्यान देश की सबसे बड़ी वित्तीय रीढ़, भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के लगभग 14 लाख अभिकर्ताओं (एजेंटों) के रोजगार और देश के करोड़ों मध्यम व गरीब वर्ग के पॉलिसीधारकों के भविष्य से जुड़े अत्यंत गंभीर आर्थिक विषय की ओर आकर्षित करना चाहते हैं।
विगत कुछ समय से वित्त मंत्रालय, IRDAI और LIC प्रबंधन द्वारा लागू की जा रही नीतियां जमीनी स्तर पर दिन-रात मेहनत करने वाले अभिकर्ताओं और देश के पारंपरिक 'बचत ढांचे' (Savings Structure) के पूरी तरह विपरीत हैं।
अतः हम आपसे विनम्र प्रार्थना करते हैं कि संसद के आगामी सत्र में शून्य काल (Zero Hour) या नियम 377 के तहत वित्त मंत्री जी के समक्ष हमारे निम्नलिखित मुख्य मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाने की कृपा करें:
# # हमारी मुख्य मांगें एवं समस्याएं:

1. नई कर व्यवस्था (New Tax Regime) में जीवन बीमा बचत पर विशेष टैक्स छूट दी जाए:
पूर्व में आयकर की धारा 80C के तहत मिलने वाली छूट के कारण देश का सामान्य और मध्यम वर्ग नियमित रूप से LIC पॉलिसियों में निवेश करता था। इससे नागरिक आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनते थे और देश को बुनियादी ढांचे के विकास के लिए दीर्घकालिक पूंजी मिलती थी। नई व्यवस्था में टैक्स-फ्री लिमिट (12 लाख तक की आय पर राहत) बढ़ाकर बचत की अनिवार्यता को व्यावहारिक रूप से खत्म कर दिया गया है, जिससे जनता में बचत के बजाय खर्च करने की प्रवृत्ति (Consumption Culture) बढ़ रही है। सरकार से मांग है कि देशवासियों में बचत की आदत को पुनर्जीवित करने के लिए नई टैक्स व्यवस्था में भी 'जीवन बीमा' के प्रीमियम पर अलग से विशेष टैक्स छूट का प्रावधान किया जाए।
2. कमीशन में कटौती और दमनकारी 'क्लॉबैक क्लॉज' (Clawback Clause) को तुरंत वापस लिया जाए:
नियमों के बदलाव के नाम पर अभिकर्ताओं के पहले वर्ष के कमीशन में भारी कटौती की गई है। इसके साथ ही बेहद अन्यायपूर्ण 'क्लॉबैक क्लॉज' लागू किया गया है, जिसके तहत यदि कोई पॉलिसीधारक किन्हीं कारणों से पॉलिसी बीच में छोड़ता है, तो एजेंट से उसकी मेहनत की फीस (कमीशन) वापस वसूल ली जाएगी। यह श्रम अधिकारों का खुला उल्लंघन है।


3. न्यूनतम 'सम एश्योर्ड' (Minimum Sum Assured) की सीमा को घटाया जाए:
LIC द्वारा न्यूनतम सम एश्योर्ड को बढ़ाकर 2 लाख रुपये कर दिया गया है। इस नीति के कारण ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के वो गरीब लोग बीमा के दायरे से बाहर हो रहे हैं जो छोटी बचत (जैसे 50,000 या 1 लाख की पॉलिसी) करना चाहते थे। इससे ग्रामीण क्षेत्रों के अभिकर्ताओं का काम पूरी तरह ठप हो रहा है।
5. अभिकर्ताओं को सम्मानजनक सामाजिक सुरक्षा (ग्रेच्युटी, पेंशन और मेडिक्लेम) दी जाए:
देश की घरेलू बचत को बढ़ाने वाले अभिकर्ताओं को खुद कोई बुढ़ापे की सुरक्षा नहीं मिलती। हमारी मांग है कि ग्रेच्युटी की सीमा को सम्मानजनक रूप से बढ़ाया जाए और सभी सक्रिय अभिकर्ताओं के लिए अनिवार्य सरकारी पेंशन व सामूहिक मेडिक्लेम की व्यवस्था की जाए।

महोदय से प्रार्थना:
आप हमारे क्षेत्र के लोकप्रिय और जागरूक जनप्रतिनिधि हैं। देश के 14 लाख परिवारों और करोड़ों पॉलिसीधारकों के भविष्य को बचाने के लिए कृपया संसद के भीतर देश की वित्त मंत्री जी से इन नीतियों की समीक्षा करने और इन्हें वापस लेने की मांग करें। हम सभी क्षेत्रवासी आपके इस सहयोग के लिए सदैव आभारी रहेंगे।
धन्यवाद।
भवदीय,

[समस्त जागरूक देशवासी एवं अभिकर्ताओं के नाम और हस्ताक्षर]
[दिनांक और स्थान]

(सभी देशवासी और अभिकर्ता मिलकर अपने अपने क्षेत्र के सांसद को ये पत्र सौंपे)

*सार्वजनिक वक्तव्य**विषय: उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव टालने, पिछड़ा वर्ग व वंचित समाज के अधिकारों की उपेक्ष...
26/07/2026

*सार्वजनिक वक्तव्य*

*विषय: उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव टालने, पिछड़ा वर्ग व वंचित समाज के अधिकारों की उपेक्षा पर सरकार की प्रशासनिक शिथिलता का पर्दाफाश।*

दिनांक: 26 जुलाई 2026

स्थान: नई दिल्ली/लखनऊ
जारीकर्ता: संजय कुमार चौटाला
------------------------------
साथियों, नमस्कार।

आज मैं आप सभी के माध्यम से देश और उत्तर प्रदेश की जनता के सामने एक अत्यंत गंभीर विषय लेकर आया हूँ। उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार ने जिस तरह से ग्रामीण लोकतंत्र की आत्मा कहे जाने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को अनिश्चितकाल के लिए टाला है, वह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि यह हमारे संविधान, पिछड़े वर्गों (OBC) और वंचित समाज के लोकतांत्रिक अधिकारों पर एक गहरा आघात है।
मैं इस मंच से सरकार की इस टालमटोल की नीति और जनता के अधिकारों को बंधक बनाने के प्रयासों के खिलाफ निम्नलिखित प्रमुख बिंदु देश के सामने रख रहा हूँ:
# # 1. स्थानीय शासन और संविधान की मर्यादा का हनन
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243E स्पष्ट रूप से कहता है कि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव संपन्न हो जाने चाहिए। मई 2026 में कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद सरकार ने चुनाव नहीं कराए। अधिकारियों के बजाय पूर्व प्रधानों को ही पिछले दरवाजे से प्रशासक बनाकर ग्रामीण विकास को जिलाधिकारी कार्यालयों की फाइलों में कैद कर दिया गया है। यह ग्रामीण जनता के स्वशासन के अधिकार का खुला उल्लंघन है।
# # 2. पिछड़ा वर्ग (OBC) के साथ राजनीतिक छलावा
सरकार का यह तर्क पूरी तरह बेबुनियाद है कि वे पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को सुरक्षित करने के लिए समय ले रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में ही 'ट्रिपल टेस्ट' (Triple Test) का आदेश दे दिया था। इसके बावजूद, सरकार ने जानबूझकर अक्टूबर 2025 में नया समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग गठित नहीं किया। जब फरवरी 2026 में माननीय इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ी चेतावनी दी, तब भी सरकार सोती रही और मई 2026 के अंत में जाकर आयोग का गठन किया गया। इस जानबूझकर की गई देरी का सीधा मकसद ओबीसी समाज को उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित रखना और चुनाव को 2027 के विधानसभा चुनाव तक खींचना है।
# # 3. वंचित और सफाई कर्मचारी वर्ग की घोर उपेक्षा
यह सरकार केवल पिछड़ों के प्रति ही उदासीन नहीं है, बल्कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े सफाई कर्मचारी वर्ग के प्रति भी इसकी नीतियां शून्य हैं। राज्य सफाई कर्मचारी आयोग को पूरी तरह निष्क्रिय रखना और उसमें पदों को खाली छोड़ना यह साबित करता है कि जमीन पर काम करने वाले दलितों और वंचितों की बुनियादी समस्याओं, उनके मानदेय और उनकी सुरक्षा की इस सरकार को कोई परवाह नहीं है।
# # हमारा संकल्प और मांग:
यह देश और उत्तर प्रदेश की जागरूक जनता सब देख रही है। लोकशाही को अफसरशाही और राजनीतिक लाभ की वेदी पर चढ़ने नहीं दिया जाएगा। हम मांग करते हैं कि:

* माननीय इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देशों का सम्मान करते हुए 10 अगस्त 2026 की सुनवाई पर सरकार चुनाव की तत्काल और स्पष्ट समय-सीमा प्रस्तुत करे।
* पिछड़ा वर्ग आयोग के सर्वे को पारदर्शी और त्वरित बनाकर बिना किसी भेदभाव के आरक्षण की स्थिति साफ की जाए।
* ग्रामीण विकास कार्यों पर लगी वित्तीय अड़चनों को दूर कर गांवों को उनका अधिकार वापस दिया जाए।

हम इस लोकतांत्रिक लड़ाई को सड़क से लेकर अदालत तक मजबूती से लड़ेंगे और सरकार की इस विफलता को देश के कोने-कोने तक लेकर जाएंगे।
धन्यवाद।
जय हिंद! जय संविधान!
(संजय कुमार चौटाला)

11/07/2026

नया फोन बनाम लाइफ इंश्योरेंस
कम उम्र में बीमा लेने के फायदे

Address

Delhi
110044

Telephone

9250608451

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when LIC_ Life Insurance corporation of India posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share