03/08/2026
*विषय: उत्तर प्रदेश विधानसभा के घटते कार्य दिवसों और निरंतर हंगामे के संबंध में जन-सरोकार का खुला पत्र।*
सेवा में,
उत्तर प्रदेश के सभी माननीय विधायक गण,
उत्तर प्रदेश विधानसभा, लखनऊ।
महोदय/महोदया,
मैं संजय कुमार चौटाला, उत्तर प्रदेश का एक सजग और सामान्य नागरिक, इस खुले पत्र के माध्यम से आप सभी माननीय जनप्रतिनिधियों का ध्यान एक अत्यंत गंभीर और चिंताजनक विषय की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। यह विषय किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा और उत्तर प्रदेश की जनता के हितों से जुड़ा है।
हम बड़े चाव और उम्मीद से आप सभी को अपना प्रतिनिधि चुनकर सदन में भेजते हैं ताकि आप हमारे क्षेत्र की समस्याओं, विकास कार्यों और प्रदेश की नीतियों पर सार्थक चर्चा कर सकें। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उत्तर प्रदेश विधानसभा के सत्रों की अवधि जिस तेजी से घट रही है, उसने हम आम नागरिकों को गहरे असमंजस और चिंता में डाल दिया है।
सदन की नियमावली के अनुसार साल भर में कम से कम 90 दिन बैठकें होनी चाहिए। लेकिन आज स्थिति यह है कि मॉनसून और शीतकालीन सत्र महज 3 से 4 दिनों में ही सिमट जा रहे हैं। इन संक्षिप्त सत्रों का अधिकांश समय भी रचनात्मक बहस के बजाय राजनीतिक गतिरोध, हंगामे, नारेबाजी और सदन के स्थगन की भेंट चढ़ जाता है।
*एक आम नागरिक के रूप में हमारे मन में कुछ गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं:
1. सदन की संक्षिप्तता: क्या मात्र 3-4 दिनों के इस संक्षिप्त सत्र में उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य की जन-समस्याओं के साथ न्याय संभव है?
2. जवाबदेही: यदि सदन में चर्चा ही नहीं होगी, तो जनहित और जनकल्याण के कार्यों पर अफसरशाही (Bureaucracy) की जवाबदेही कैसे तय होगी?
3. करदाताओं के पैसे का नुकसान: सदन की कार्यवाही चलाने में जनता के टैक्स का भारी पैसा खर्च होता है। हंगामे के कारण जब एक भी दिन नष्ट होता है, तो वह सीधे तौर पर जनता की गाढ़ी कमाई की बर्बादी है।*
लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष के बीच वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक और आवश्यक है, परंतु इन मतभेदों को प्रकट करने का माध्यम सदन का बहिष्कार या हंगामा नहीं, बल्कि तार्किक और गंभीर बहस होना चाहिए। जब सदन सुचारू रूप से नहीं चलता, तो आम जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं से भरोसा उठने लगता है।
अतः एक सामान्य नागरिक के तौर पर मेरी आप सभी माननीय विधायकों से विनम्र अपील है कि:
* सदन के भीतर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर गंभीर और अनुशासित संसदीय आचरण का परिचय दें।
* विधानसभा के सत्रों की अवधि बढ़ाने और जनहित के ज्वलंत मुद्दों पर विस्तृत चर्चा के लिए विधानसभा अध्यक्ष और अपनी-अपनी पार्टियों पर लोकतांत्रिक दबाव बनाएं।
* सरकार और विपक्ष मिलकर यह सुनिश्चित करें कि जनता की आवाज सदन के पटल पर गूंजे, न कि वह हंगामे के शोर में दब जाए।
मुझे पूरी उम्मीद है कि आप एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि के रूप में इस पत्र की भावना को समझेंगे और आगामी सत्रों को अधिक सार्थक, लंबा और परिणामोन्मुखी बनाने के लिए ठोस प्रयास करेंगे।
भवदीय,
संजय कुमार चौटाला
एक जागरूक नागरिक, उत्तर प्रदेश