Manoj Kumar Sharma

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29/02/2024

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MANOJ KUMAR SHARMA
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02/12/2019

ज्ञान चर्चा

कार्य सब समान

एक यज्ञ का आयोजन होना था सभी लोग बैठे हुये थे तभी श्री कृष्ण उनके बीच मे आये तो उन्होंने पूछा मेरे लिये क्या काम है। तब सबने कहा कि सब काम तो हमने बांट लिये है। आप तो सिर्फ देख रेख करे। फिर श्रीकृष्ण ने पूछा कि मैं सबकी पत्तल उठाने का काम करूंगा।

इसी तरह गुरुघरो में कार सेवा यानी जो सेवा हाथों द्वारा की जाए उसे श्रेष्ठ कहा गया है इसलिये जूता रखना ही नही उसकी सफाई बड़े बड़े लोगो द्वारा स्वयं हाथों से कर रखना,

इसी तरह हमारे प्रधानमंत्री का स्वच्छता अभियान को अपने हाथ मे लेना। एक घटना आती है कि उन्होंने किसी चीज का उदघाटन किया और कागज उनके हाथ मे रह गया सभी कैमरे उनकी तरफ दे कि ये स्वच्छता की दुहाई देने वाले इस कागज़ को कहा फेकेंगे तभी उन्होंने इसे मोड़ कर अपनी जेब मे रख लिया।

कहने का भाव यह है कि भगवान कृष्ण से लेकर आज के बड़े नेता यही समाज को यही संदेश देते है कोई काम न छोटा है न बड़ा। न कोई दायित्व बड़ा है न छोटा। आप अपने को सम्मलित कर ले जहा कोई न लगा हो। हम सब अगर इनसे प्रेरणा ले ले तो न कोई छोटा रहेगा न बड़ा। सभी समान, हमारा सभी का एक ही लक्ष्य भारत माता को परम वैभव पर तक लेकर जाना।

मनोज शर्मा "मन"

24/11/2019

ज्ञान चर्चा

नाम का अर्थ

हम सभी के नाम जो हमारे माता पिता जी ने रखे उनका एक अर्थ होता है। जैसे हरिहर मतलब हरि को जपना, ऐसे ही देवताओं के नाम पर नाम रखे जाते थे ताकि उन्हें आवाज़ दे तो भगवान का भी सिमरन हो जाये।

वक्त बदला नाम छोटे रखने लगे जैसे पोंटी, मोंटी, बिल्लू, पप्पू, चंगा, रोमी जिनका कोई अर्थ नही होता इनका प्रचलन हो गया।

ऐसे ही पहले घर मे माताजी, पिताजी, चाचाजी, ताऊजी जैसे नाम से पुकारते थे आज उसकी जगह मम्मी, पापा, डेड, मोम, पा, अंकल, आंटी, कज़न ने ले ली है। जिनका भी अर्थ ढूंढो तो और ही निकलता है। मतलब बिना अर्थ या द्विअर्थी अर्थ निकलते दिखते है। और लोग इसमे ढलते गए और आप इस पर किसी से बात करेंगे तो वो आपको घूरेगा ये कौन सी नई दुनिया से आया है।

इस पर एक रोचक कहानी है जो मेरे मित्र ने भेजी थी कि एक बार एक पिंजरे में कुछ बंदरो को रखा गया और ऊपर एक केले का गुच्छा टांग दिया गया। और एक सीढ़ी लगाई गई।अब एक बंदर ने केले देखे वो जैसे ही सीढ़ी पर चढ़ा उस पर ठंडे पानी की बौछार फेंकी गई और बाकी बंदरो पर भी फेंकी गई। फिर थोड़ी देर बाद दूसरा बन्दर चढ़ा तो फिर पानी की बौछार पड़ी और सभी बंदरो पर पड़ी। अब बंदर समझ गए। जैसे ही कोई बन्दर केले के लालच में ऊपर चढ़ता सभी बन्दर उसे खींच लेते और खूब पिटाई करते।

कुछ समय बाद उन्होंने एक बंदर को पिंजरे से निकाल कर एक दूसरा नया बन्दर पिंजरे में डाल दिया । वो नया बन्दर केलो को देख जैसे चढ़ा सभी ने मिलकर उसे पीट दिया। अब वो बन्दर आराम से बैठ गया। धीरे धीरे उन्होंने सारे पुराने बन्दर बदल कर नए कर दिए। पर जैसे ही कोई बन्दर चढ़ता सब पीटते।

पुराने बंदरो को तो पता था कि पानी पड़ेगा इसलिये पीटते थे पर नए बंदरो को तो पता नही था फिर भी वो नये बन्दर को पीटते थे।

इस कहानी का अर्थ यह है कि हम भी उन्ही में से है अगर कोई अब कुछ नया करना चाहे तो.....

मंनोज शर्मा "मन"

22/11/2019

ज्ञान चर्चा

मेरा और हमारा

चर्चा में आया
मेरा क्या है। मेरा मैं, मेरे बच्चे, मेरी पत्नी, मेरा घर, मेरा काम , मेरा घर, मेरा व्यापार

हमारा क्या हमारा मोहल्ला, हमारा पार्क हमारा देश , हमारी शाखा, हमारा मन्दिर, हमारा समाज

जहाँ मैं लगता है वहां व्यक्ति ज्यादा जिम्मेदार दिखाई देता है। जैसे बच्चे को छोड़ना है 07.30 बजे तो छोड़ना है प्राथमिकता है। ये ही मन्दिर जाना है 07.30 बजे। वहां उसके लिये ये प्राथमिकता में नही होता। समाज का कोई काम हो तो वहां से कैसे बचना कैसे निकलना कोई दुर्घटना हो तो वहां से अपनी गाड़ी कितनी तेजी से निकालना, पड़ोस में किसी को हमारी जरूरत हो तो कैसे अपने को असहाय बताना और अपने को समस्या हो तो दूसरों से अपेक्षा की वो हमारे यहां समय पर उपस्थित हो।

कहने का भाव है जिसमे आप मेरा लगा देंगे जैसे देश मेरा है तो कोई सड़क पर थूकेगा तो आपको तनाव होगा। पार्क में कोई गंदगी करेगा तो आपको परेशानी होगी। मंदिर में आप प्रसन्नता अनुभव करोगे। जो प्रसन्नता बच्चे को छोड़ने में आपको मिलती है कि मैं नही छोडूंगा तो कौन छोड़ेगा।

ऐसा ही आपका शरीर भी है इसको भी हम अपना न मान कर दुनिया का मान लेते है इसकी ऊपरी तो देखभाल का ध्यान रखते है पर अंदरूनी लापरवाही रखते है पर जैसे ही बच्चे के साथ कोई घटना हो तो उसको पूरी सलाह देंगे या चिंतित होंगे।

कहने का भाव यह है कि हम जिसमे मैं जोड़ देते है उसके लिये सब मैनेज कर लेते है और जिसको हमारा वही उसके लिये बहाने बताना शुरू करते है। और कुछ नही हो सकता इस समाज का, देश का मोहल्ले का, कोई जागरूक नही है। अपने काम पर निकल जाते है।

मनोज शर्मा "मन"

02/09/2019

ज्ञान चर्चा
विषय सार्वजनिक रूप से ही त्यौहार मनाना

चर्चा रही अगस्त ,सितंबर और अक्टूबर में त्यौहारों का महीना है। अभी जन्माष्टमी गई है।अब गणेश चतुर्थी है जगह जगह पंडाल लगे है। फिर रामलीलाये होंगी, दशहरा , काली पूजा,और फिर दीपावली। सभी को बड़ा त्यौहार माना जाता है। क्योंकि ये सब त्यौहारों को हम सार्वजनिक जगहों पर ही एक साथ मनाते है।

इनको शुरू करवाने के पीछे महापुरुषों का ध्येय भी यही था। कि लोग अपने घरों से बाहर निकले मन्दिरो में इकट्ठा हो , सार्वजनिक जगह पर एकत्र होकर ये पर्व मनाये।अपने अपने घर मे रावण न फूंके। सार्वजनिक जगह पर फूंके। कथाओं के माध्यम से रामलीलाये करे और सभी भाग ले जिससे बुजुर्ग, महिलाओं और युवाओ और बच्चो को एक साथ एक जगह पर मिलने का और धार्मिक चर्चाओं का अवसर मिले।

श्री बाल गंगाधर तिलक जी ने महाराष्ट्र में श्री गणेश चतुर्थी कार्यक्रम आरम्भ किया। तुलसीदास जी ने श्री राम चरित मानस की रचना की और अपने द्वारा 500 से अधिक गांव गांव जाकर रामलीलाये प्रारम्भ की। आज पूरे देश मे इन पर्वो की धूम है।

हमे भी चाहिये कि इन पर्वो को हम निजी की जगह सार्वजनिक अपने क्षेत्र में होने वाले कार्यक्रमो में ही मनाये और जो हो सके अपना तन मन धन का सहयोग करे। उनकी आलोचना न करे। क्योंकि वो समाज को एकत्र करने का बहुत बड़ा कार्य कर रहे। और हमे भी परिवार सहित इन कार्यक्रमो में उत्साह पूर्वक भाग लेना चाहिये।

मनोज शर्मा "मन"

27/08/2019

ज्ञान चर्चा

महापुरुषों का गलत चित्रण करते हम

चर्चा में आया तो सबने ये ही बताया कि भगवान वाल्मीकि पहले वो डाकू थे फिर वो नारद जी के सम्पर्क में आये तो साधु बन गये।

आप देखे की एक महान ऋषि के साथ ये जोड़ना, ऐसे ही भगवान कृष्ण के साथ चोर जोड़ना, भगवान महाशिव के साथ गांजा का और भांग का सेवन जोड़ना,
सन्त तुलसीदास जी के साथ जोड़ना की उनकी पत्नी ने दुत्कारा तो वो संत बने । जबकि वो 5 वर्ष की अवस्था से ही संतो के संसर्ग में थे।

ऐसा नही लगता हम अपने भगवानों के साथ ऐसा कह कह कर सामने वाले को उनका नकारात्मक पहलू बताते है।
आप कभी अपने माता का परिचय ऐसे करा सकते है कि पहले ये गलत थी अब देवी बन गई क्योंकि ये मेरी माँ है या आप अपने पिता का परिचय ऐसे करा सकते है कि पहले ये छंटे हुये बदमाश थे लेकिन अब प्रोफ़ेसर है। या कोई आपके सामने उनके बारे में ऐसा परिचय दे सकता है।
नही दे सकता न आप दे सकते है आप उसे मरने मारने पर उतारू हो जायेंगे। पर जैसे ही आपके महान पुरुषों, देवी देवताओं के बारे में पूछा जाये तो आप ही शुरू हो जाते है। आपको अपने माता पिता की तरह ही उनका भी अच्छा पक्ष रखना चाहिये। क्या आप सोच भी सकते है कि जो हमारे पूजनीय है वो इतने बुरे हो सकते है। ये सब कुछ वर्षों में हमारे पूजनीय महापुरुषों और देवताओं के साथ जोड़ दिया गया ।
हमारे कथावाचक भी रस ले लेकर इसको आगे बढ़ाते गये। तो अब जो युवा पीढ़ी है उसको दूसरे पक्ष वाले ये बाते कह कर उसका मजाक उड़ाते है। और हमे भी पूरा ज्ञान न होकर उसे ही ठीक बताने लगते है।

इसलिये हमे हमेशा अपने महापुरुषों, देवी देवताओं, ऋषि मुनियों की ऐसी कहानियों को नही बोलना है उन्होंने जो अच्छे कर्म किये है सिर्फ उनको बताना है। जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने गीता सुनाई सर्वप्रथम सूर्य को , ऐसे ही भगवान वाल्मीकि ने रामायण लिखी, भगवान शिव आदि देव है। सन्त तुलसीदास जी महान संत है जिन्होंने रामचरित मानस जैसा पूजनीय ग्रथ हमे दिया। स्वामी विवेकानंद ऐसे सन्त है जिन्होंने शिकागो में जाकर धर्म का झंडा बुलंद किया। बुरी बाते बताने का सामने वाला हमारे सामने साहस भी न कर पाये। अब ऐसा वातावरण बनाना है।

मंनोज शर्मा "मन"

22/08/2019

ज्ञान चर्चा

बाढ़ के बाद भी पानी की कमी

चर्चा में आया कि पहले जब वर्षा होती थी तो गांव के बाहर तालाब और गांव के अंदर कुँए होते थे। और एक गांव दूसरे गांव से 2 से तीन किलोमीटर पर होता था। ये कुँए और तालाब पूरे वर्ष भरे रहते थे। और एक तालाब से दूसरे तालाब की दूरी 2 किलोमीटर की होने से ये उतनी दूरी तक जल का स्तर बनाये भी रखते थे। तो किसी भी जगह आप बीच मे खोदो तो पानी दस से बीस फुट तक निकल आता था।

पर जैसे जैसे शहरीकरण बड़ा। पगडंडिया सड़के हो गई। सड़को के किनारे फुटपाथ हो गये। तालाब और कुँए लुप्त हो गये। वर्षा का पानी सड़को से नालियों और नालियों से नाले में और फिर नदियों में , नदियों से समुंदर में।

मतलब कही भी पानी का संग्रहण नही।
पानी का दोहन जारी रहा। जमीन में खेती के लिये ट्यूबेल, घरों में समर्सिबल, जानवरो को नहाने के लिये तालाब की जगह मोटर चला कर पानी बहाना। घरों में पीने से ज्यादा मशीनों में पानी लगना, फ़्लैश में पानी का बहाना।

इन सबसे पानी का ज़मीन में स्तर 300 फुट तक दिल्ली में और तमिलनाडु में 2000 फुट तक चला गया है। कई क्षेत्र सूखा ग्रस्त हो चुके है। दिल्ली तो खासकर अपने पड़ोसी राज्यो पर निर्भर है। उनके पास जब तक है दे रहे है उनको भी जब नही मिलेगा तो वो भी हाथ खड़े कर देंगे।

लेकिन जिसने अभी से कम पानी मे अपनी जरूरते पूरी कर ली वो तो आगे भी अपना समय निकाल लेगा। पर जिसको सुबह शेव बनाने में नल खुला छोड़ना, मोटर चला कर टँकी से बहता पानी का पता न चलना, फलेश में अत्यधिक पानी का उपयोग करना। उसको बहुत ही दिक्कत आने वाली है। अभी कुछ समय पहले हमारी क्रिकेट टीम विदेश गई थी तो होटल में उनको एक बाल्टी पानी दे दिया गया कि नहाने और धोने के लिये यही है। बाकी खरीद कर लेना है। तो सोचिये अभी तो दिल्ली में फ्री मिल रहा है फ्री के चक्कर मे पानी को मत बहाइये।
उसकी कद्र कीजिये उतना ही प्रयोग करे जितनी जरूरत हो। फव्वारे की जगह बाल्टी में पानी लेकर नहाये। संग्रहण करे ताकि भविष्य की पीढ़ी भी आपकीं तरह इसका उपयोग कर सके।

जल है तो जीवन है।।

मनोज शर्मा "मन"

21/08/2019

ज्ञान चर्चा
आज का विषय रहा
कूड़े का बढ़ता पहाड़।
विषय रहा कि जैसे जैसे हम शहरीकरण की और बढ़ते गये। कूड़े का निर्माण करते गये। वो कूड़ा आपके द्वारा रोज़ निकल रहा है और कूड़ा बढ़ता जा रहा है। जैसे एक सामान्य परिवार में 5 आदमी है तो ऑफिस तक जाने और आने में सुबह उठने से लेकर देर रात्रि तक कागज की , पॉलिथीन, खाना बचाना, कचरा इकट्ठा कर हर घर से आफिस से गाड़ी भर भर कर कूड़े के पहाड़ तक पहुच रहे है। दिल्ली जैसे शहर में कई कूड़े के पहाड़ बन गये है।

पीछे गाजीपुर में कूड़े के पहाड़ में कई विस्फोट भी हुए थे। अभी सराय काले खा में वेस्ट से पार्क भी बनाया गया है। पर कब तक आप कूड़ा बनाते रहेंगे। और ये पहाड़ बनते रहेंगे।

इसके लिये हम क्या कर सकते है। हम घर से थैले लेकर निकले। जिससे न चाहते हुये भी आप पॉलिथीन के प्रयोग से बचे ।

भोजन उतना ले जाये जितना उपयोग कर सके और दिन में किसी समय आपने न खाना हो तो घर फोन कर दे जिससे आपके बने हुये खाने को कल कूड़े में न डाला जाये। बाहर का भोजन कम मंगाया जाये जिससे पैकिंग पर जो कूड़ा आने वाला है उससे बचा जाये । ज्यादा मन है तो पास मे ही वही जाकर बाजार में भोजन का आनंद ले जिससे बाजारों की रौनक बड़े। पानी की बोतल साथ रखे जिससे बार बार बोतल न खरीदनी पड़े। और आफिस में अपना एक गिलास भी रखे। ताकि बार बार धोने में पानी बर्बाद न हो।

अपने घर के कार्यक्रमो में या आफिस के कार्यक्रमो में ऐसी सामग्री का प्रयोग करे जो रीसायकल हो जाये। ऐसे ही धार्मिक कार्यक्रमो में भी ऐसी ही सामग्री प्रयोग में लाये जिससे कूड़ा रीसायकल हो जाये या पानी मे गल जाये। फोम, प्लास्टिक व pop से बनी सामग्री प्रयोग न करे।

ऐसी चीजों का प्रयोग न करे जिसे हम यूज़ और थ्रो करनी पड़े। ऐसे चीजे खरीदे जिन्हें हम लंबे समय प्रयोग कर सके। विवाह आदि में होड़ व दिखावो से बचे उतने आइटम रखवाये जितने प्लेट में आ सके।

अपने पालतू जानवरों का भी ध्यान रखे जो वो वेस्ट करे तुरंत उसकी सफाई की व्यवस्था भी करे। नही तो उसकी गंदगी से भी क्षेत्र में बीमारियों के फैलने का खतरा होता है। और ये सब दूसरों से अपेक्षा न रखते हुये खुद से ही आरम्भ करना होगा। गुटखा खाने वाले , तम्बाकू खाने वाले, पान खाने वाले भी ध्यान रखे कि उनसे कोई सड़क दीवार गंदी न हो। शहर को अपने घर की तरह ही समझे।
अगर हम ने ये बाते मान ली तो कूड़े के पहाड़ में तब्दील होती दिल्ली बच जायेगी।

मंनोज शर्मा "मन"

19/08/2019

ज्ञान चर्चा

पॉलिथीन का उपयोग पर्यावरण अशुद्ध

चर्चा में आया कि हम जो पॉलिथीन प्रयोग करते है। उसने धीरे धीरे एक विकराल रूप ले लिया है। आज हर वस्तु की पैकिंग में ये प्रयोग हो रही। प्रकृति जो भी चीज देती है उसको अंत भी करती है। पर ये मानव निर्मित चीज है जो बन तो रही पर समाप्त नही हो रही है। जिससे कूड़े के ढेर बढ़ते जा रहे है।

पॉलिथीन में खाने का सामान भी लोग फेक देते है जिन्हें गाय भी खा जाती है जिससे उसकी मृत्यु तक हो सकती है।

इसके विपक्ष में बोलने वाले कहते है कि सरकार को ही इसे बैन कर देना चाहिये। पर सरकार बैन भी कर दे पर जब तक लोग नही चाहेंगे वो प्रथा और बढ़ जाती है। जैसे सरकार ने दहेज प्रथा और कई राज्यो में शराब भी बैन भी कर दी है पर कई बुद्धिजीवी सुबह से शाम तक शराब के गुण बताते नज़र आयेंगे। इसलिये हम जब तक इसका विकल्प थैले घर से लेकर नही निकलेंगे तब तक कोई हल नही निकलेगा। क्या पता हम एक गाय को ही बचा पाये।

और इतने भंडारे लगाते है। तो एक बार गाय को बचाने हेतु थैले बनवा कर बंटवाने का अभियान चलाए। गोपाष्टमी और श्राद्ध में गाय को भोजन खिलाने के साथ साथ थैले भी बनवा कर बांट दे। तो और उस प्रयास से जीवन मे कोई गाय बच गई आपके प्रयास से तो इससे बड़ा पुण्य कोई नही होगा जीवन मे। क्योंकि गाय और प्रकृति एक समान है। दोनो हमे देती है। पर हम दोनों को ही सिर्फ दोहन मान बैठ गये। जबकि प्रकृति रहेगी तो मानव रहेगा।

तो हम आज से ये प्रण लेंगे।

पॉलिथीन नही थैले प्रयोग करेंगे।
प्रकृति को हम सुरक्षित स्वच्छ रखेंगे।।

मंनोज शर्मा "मन"

17/08/2019

आंटी के हाथ की रसमलाई का आनंद

रोज़ की तरह आज शनिवार की शाम को मैं और मेरे मित्र अशोक रेहानी जी शाम की सैर को निकले चिल्ड्रन पार्क की और। हल्की हल्की वर्षा हो रही थी। आगे थोड़ा गये तो तेज़ हो गई। अपनी बाइक मोड़ी वापस की और तो देखा हरीश जी अपने आफिस में बैठे थे अकेले थे। हमारा टहलने का समय शाम 6 से 7 होता है। हम उनके आफिस में बैठ गये ।वार्तालाप शुरू हुआ तभी वहां से भेलपुरी वाला निकला। हरीश जी ने तीन पत्ते बनवाये उनका आनंद लिया । अब साढ़े छह बजे थे। आधा घण्टा बाकी था।

मैंने गुरमुख जी को फोन मिलाया वो वही आफिस के पास था। उन्होंने कहा घर पर हूँ। मैंने कहा हम आ रहे है। घर पहुँचे। वैसे गुरमुख जी हमारी शाखा के सबसे सक्रिय बुजुर्ग है। वो जितने दिन भी भारत मे होते है समय से शाखा पहुँच जाते है। उनका एक पुत्र गुरदीप है उनकी एक बहु और एक पोता और चार पुत्रियां है। गुरदीप ऑस्ट्रेलिया में है। तो गुरमुख सिंह जी भी ऑस्ट्रेलिया और भारत मे दोनो जगह आते जाते रहते है। उनके पुत्र, बहु का व्यवहार भी बहुत ही बढ़िया है। और पोता तो बहुत ही चुलबुल नटखट है दादी का प्यारा।

हम जैसे ही घर पहुँचे बाहर हल्की हल्की बारिश हो रही थी। गुरमुख जी बिना पगड़ी के थे। आंटी जी के भी पैर की उंगली में कुछ चोट लग गई थी। नही तो ये दम्पत्ति रोज़ हमारे साथ वही टहलने जाती है। दोनो के चेहरे पर मुस्कराहट थी। गुरमुख जी ने पगड़ी बांधनी शुरू कर दी। आंटी फटाफट आज अपने हाथों की बनाई रस मलाई ले आई थी। और साथ मे कलाकंद भी।

गजब का स्वाद था। गुरमुख जी ने बताया अभी तुम्हारी आंटी तुम्हे ही याद कर रही थी। कह रही थी ये कलाकंद और ये रसमलाई मंनोज के आफिस में दे आओ। अभी कह ही रही थी कि आपका फोन आ गया। मैंने कहा मुझे भी कुछ लगा और मैं भी आ गया। फिर मैंने रसमलाई का आनंद लेने लगा। वो मुझे इसके बनाने की विधि बता रही थी। कैसे उन्होंने बनाई। मैं रसमलाई का आनंद भी ले रहा था उनकी बातें भी सुन रहा था वो बहुत ही प्यार से रसमलाई और कलाकंद बनाने की विधि बता रही थी। कलाकंद भी अच्छी बनी हुई थी। एक पीस उसका भी खाया।

फिर गुरमुख जी अपने हाथों से चार कप ग्रीन टी लेमन फ्लेवर में बना कर लाये। मैने कहा गुरमुख जी भी बना लेते है तो आंटी जी ने मुस्करा कर कहा वैसे कर लेते है लेकिन आज मेरे चोट लगी है तो कर भी रहे है। चाय आ चुकी थी। चाय भी गजब थी। दोनो दम्पत्ति बाते कर रहे थे प्रसन्न थे हमारे आने पर । अब सात बज चुके थे। आफिस से फोन भी आने लगे थे पर न उनका दिल भरा था न हमारा ।

थोड़ी सी नमकीन भी चखकर आंटी और उनमें अपने माता पिता का स्वरूप देखता हुआ उन्हें प्रणाम कर मैं भावों में डूबा वहां से चल पड़ा। मेरी माता भी कुछ मीठा बनाती थी तो वो भी मेरे लिये अलग से रखती थी कि मंनोज को ये अच्छी लगती है।

मंनोज शर्मा "मन"

17/08/2019

ज्ञान चर्चा

मदन लाल ढींगरा
स्वतंत्रता की लड़ाई में ऐसे नाम जो हंसते हंसते फांसी पर झूल गये। ऐसा ही एक नाम था मदन लाल ढींगरा जिनका जन्म 18 फरवरी, 1883 को हुआ।
इन्होंने एक कार्यक्रम में 1 जुलाई 1909 को कर्जन वाइली इंडियन नेशनल एसो. के वार्षिक उत्सव में पहुँचा था इनके शरीर मे देखते ही देखते पांच गोलियां दाग दी थी। और इनका काम तमाम कर दिया था।

इन पर मुकद्दमा चला और फांसी की सजा हुई और इन्होंने हंसते हंसते मात्र 26 वर्ष की उम्र में 17 अगस्त को फांसी के फंदे को चूमा और अमर हो गये।

शहीदों की चिंताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले।
वतन पे मरने वालों का यही निशाँ होगा।।
मंनोज शर्मा "मन"

16/08/2019

यह पॉलिसी घटते ब्याज दरो की करण जल्दी ही बन्द हो रही है. !
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``` 1 वर्ष बाद ₹69100 वार्षिक```
``` 5 वर्ष बाद ₹89400 वार्षिक```
```10 वर्ष बाद ₹123300 वार्षिक```
```15 वर्ष बाद ₹167500 वार्षिक```
```20 वर्ष बाद ₹213400 वार्षिक```

*उल्लेखनीय है कि 20 वर्ष पश्चात् रिस्क कवर ₹ 52 लाख से भी अधिक होगा.*

```जी हाँ . . .```
*आज ही निवेश कीजिये*

```क्योंकि . . .```

*"आज के समय मे आजीवन गरन्टीड बेनिफिट LIC के अलावा कोई नही दे पा रहा है। ये प्लान सचमुच आपकी हर वित्तीय समस्या का समाधान है।"
मंनोज शर्मा
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