12/12/2021
पोस्ट मार्टम
दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों की दरअसल समस्या यह है कि वे काम तो अधिक करते हैं लेकिन उनका प्रचार तन्त्र बिल्कुल कमजोर होता है।यह भारत की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के दक्षिणपंथियो की समस्या है।इसके अलावा वे उच्च नैतिक मूल्यों और शुचिता में कुछ ज्यादा ही विश्वास रखते हैं और वैसा ही क्रियान्वयन करने का प्रयास करते हैं,इसलिए समाज के सभी वर्गों को खुश नहीं रख पाते।नतीज़ा यह होता है कि वे शीघ्र पतन के शिकार हो जाते हैं और सत्ता से बाहर हो जाते हैं।
अटल जी जैसे महान और नेक व्यक्ति भी इसी समस्या के कारण वापस सरकार नहीं बना सके,जबकि उनकी सरकार स्वतंत्र भारत की सर्वश्रेष्ठ सरकार मानी जाती है।वामपंथी गिद्धों को यह समस्या बिल्कुल नहीं रही है।वे काम तो कम या बिल्कुल नहीं करते हैं लेकिन प्रचार प्रसार माध्यमों में उनकी गहरी घुसपैठ रहती है,इसलिए वे शीघ्र पतन के जल्द शिकार नहीं होते हैं और सत्ता में उनकी वापसी जल्द हो जाती है।
कांग्रेस की इतनी अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के बावजूद सत्ता में लम्बे समय तक रहने का यही एक कारण रहा है।
वरना नैतिकता और शुचिता से तो उनका 36 का आंकड़ा रहता है और लोग भी उनसे नैतिकता और शुचिता की उम्मीद कम ही रखते हैं बल्कि गलती से यदि लाल बहादुर शास्त्री जैसे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ नेता होने पर लोगों को आश्चर्य होताञ था।
प्रधानमंत्री श्रीमोदी ने देश की बागडोर संभालते ही दक्षिणपंथी लोगों के शीघ्र पतन की बीमारी को पहचाना।हालांकि गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने गुजरात में वामपंथी गिद्धों का सफाया कर दिया था।और पिछले तीन दशको से वंहा वे अनवरत शासन कर रहे हैं।लेकिन राष्ट्रीय कैनवास में उनको प्रधान मंत्री बनने के बाद ही इसकी व्यापकता और गहराई मालूम पड़ी और उन्होंने वामपंथी गिद्धों का माकूल ज़वाब देने के लिए कमर कस ली और नतीज़ा भी आशानुरूप रहा।अब अधिकतर टीवी चैनलों पर या समाचारों पत्रों में वामपंथी गिद्धों का इतना अधिक दबदबा नहीं रहा।साम,दाम,दंड और भेद से लगभग पूरे संचार तंत्र को सेट कर दिया गया।पार्टी की विचारधारा रखने के लिए प्रवक्ताओं की एक विशाल और विद्वान लोगों की फौज तैयार कर ली गई,जो कि ना केवल हिंदी बल्कि इंग्लिश में भी अपने अकाट्य तर्कों से विरोधियों को लाजवाब कर देते हैं।
पहले दक्षिणपंथी लोग इंग्लिश भाषा से दूर ही रहते थे।गुरु मूर्ति जैसे एकाध व्यक्ति को छोड़ दे तो अधिकतर लोग ठेठ उत्तर भारतीय हिन्दी बोलने वाले होते थे।लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं है।आपको बीजेपी में फर्राटेदार इंग्लिश बोलने वाले लोग शाम को हर टीवी चैनल पर मिल जाएंगे संबित पात्रा,सुधांशु त्रिवेदी,नलिन कोहली,नूपुर शर्मा,प्रेम शुक्ला, जफर इकबाल,शहजाद पूना वाला आदि सैंकड़ों तेज-तर्रार प्रवक्ता है जो कि पार्टी की नीतियों और विचारधारा का प्रचार प्रसार करते हैं।
लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि बीजेपी के प्रवक्ताओं के अलावा भी सैकड़ों गैर राजनैतिक लोग,पत्रकार, बुद्धिजीवी,प्रोफेशनल्स आदि भी अलग अलग विषयों पर अपनी निष्पक्ष राय रखते हैं और बीजेपी की नीतियों का समर्थन और बचाव करते हैं।
कृषि कानूनों पर विजय सरदाना,रक्षा मामलों में मेजर जी डी बक्शी,राजनैतिक चर्चाओं में हर्ष वर्धन सिंह,आलोक मेहता, सोनम महाजन,शुभ राष्ट्रा,स्मिता प्रकाश,दिवंगत शेष नारायण सिंह,सुबुही खान,एच राजशेखर आदि कुछ उदाहरण हैं, जिनका दशकों तक राजनैतिक और अन्य क्षेत्रों में व्यापक अनुभव रहा है और वे पूर्ववर्ती सरकारों और वर्तमान सरकार के कार्यकलापों का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं और सरकार की विभिन्न योजनाओं को प्रभावशाली अंदाज में और तर्कों सहित प्रस्तुत करते हैं।महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वे बीजेपी के प्रवक्ताओं से भी ज्यादा प्रभावशाली तरीके से अकाट्य तर्कों से सरकार का बचाव करते हैं।
यह कोई एकदम,अचानक और रातोंरात ही नहीं हुआ है बल्कि इसके पीछे प्रधान मंत्री श्री मोदी और उनकी टीम का बहुत बड़ा परिश्रम और योगदान रहा है।
अटल जी तो बेचारे सीधे साधे नेता थे,अपनी बात खुद ही कहने में विश्वास रखते थे।किसी बात के लिए जिद्द नहीं करते थे और मिडिया के साथ उनके कभी भी गहरे सम्बंध नहीं रहे
पहले कार्यकाल में अटल जी एक सांसद तक का इंतजाम नहीं कर पाए और एक वोट से अपनी सरकार की कुर्बानी दे डाली।लेकिन बीजेपी का वर्तमान नेतृत्व ऐसा बिल्कुल नहीं है। मोदी - शाह की जोड़ी अद्भुत है।
वे संख्याओं और समीकरण का पूरा ध्यान रखते हैं और देश के इतने राज्यों में उनकी सरकारे पहले कभी नहीं रही।अब तो एक एमएलए से वे मणिपुर जैसे राज्य में अपनी सरकार बना लेते हैं और कर्नाटक और मध्यप्रदेश की कॉंग्रेस की सरकारों को येन केन प्रकरण हटा कर खुद की सरकार बना लेते हैं।
भाजपा का वर्तमान नेतृत्व नैतिकता और शुचिता के ज्यादा चक्कर में नहीं पड़ता हैं और कुछ उन्नीस इक्कीस होने पर उनका प्रचार तन्त्र सब मैनेज कर लेता है।इसको भले ही हम बीजेपी का कांग्रेसीकरण भी बोल सकते हैं लेकिन यह सच है कि यह नई बीजेपी राज करना और उसे लम्बे समय तक बरकरार रखना सीख गई है।भारतीय राजनीति में दक्षिणपंथी विचारधारा का इतना वर्चस्व इसके पहले कभी भी नहीं रहा था।
मेरे जैसे राजनीति के अल्प ज्ञानी व्यक्ति के लिए, जो कि भारत की राजनीति का पिछले पांच दशको से भ्रमित विद्यार्थी रहा है और सत्तर के दशक से सभी राजनैतिक दलों का उत्थान और पतन देखा है, उसके लिए यह परिवर्तन बहुत ही रोचक और सुखद है।
शायद आपको भी चीजों में बुनियादी फर्क महसूस हुआ ही होगा और यह स्तिथि अब जल्द से बदलने वाली नहीं है।