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25/11/2017

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03/08/2016

राज्यसभा की संवैधानिक व्यवस्था
भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत 1921 में पहली बार दूसरा सदन काउंसिल ऑफ स्टेट्स अस्तित्व में आया, जिसका गवर्नर-जनरल पदेन अध्यक्ष होता था। संविधान सभा के निर्णय के अनुसार स्वतंत्र भारत में राज्य सभा के गठन की घोषणा 23 अगस्त 1954 को की गई थी जब उपराष्ट्रपति को इसका पदेन सभापति बनाया गया। राज्य सभा का गठन संघीय व्यवस्था में राज्यों के हितों की रक्षा करने के लिए किया गया है। परन्तु इसके सदस्यों की संख्या लोकसभा से कम रखी गयी है। राज्यसभा में विशेषज्ञों की नियुक्ति की वजह से इसे पुनरीक्षण सदन भी माना जाता है जो लोकसभा द्वारा पारित प्रस्तावों की ढंग से जांच कर सके और इसके सदस्य मंत्रिपरिषद को भी बेहतर स्वरुप दे सकते हैं।

राज्यसभा का स्वरूप
संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार राज्‍यसभा में 250 सदस्‍य होते हैं जिनमे 12 सदस्‍य राष्‍ट्रपति द्वारा नामित और बाकी 238 लोग चौथी अनुसूची में जनसंख्या के आधार पर राज्यों से चुने जाते हैं। अमेरिका की सीनेट में सभी राज्यों को बराबर प्रतिनिधित्व मिलता है और 1913 के 17वें संशोधन द्वारा वहां प्रत्यक्ष निर्वाचन की पद्धति लागू हो गयी है। अनुच्छेद 84 के तहत भारत का नागरिक होने के अलावा राज्‍यसभा की सदस्यता हेतु न्यूनतम आयु 30 वर्ष तय की गई जबकि निचले सदन लोक सभा के लिए यह 25 वर्ष है। संविधान के अनुच्छेद 102 में दिवालिया और कुछ अन्य वर्ग के लोगों को राज्यसभा सदस्य बनने के लिए अयोग्य घोषित किया गया है। जन प्रतिनिधित्व क़ानून की धारा 154 के अनुसार राज्‍यसभा सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। हर 2 साल में इसके एक तिहाई सदस्‍य सेवानिवृत्त हो जाते हैं इसलिए राज्‍यसभा कभी भंग नहीं होती।

राज्यसभा निर्वाचन की चुनावी प्रक्रिया
राज्य सभा में सदस्यों का चुनाव राज्य विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा द्वारा किया जाता है जिसमे विधान परिषद् के सदस्य वोट नहीं डाल सकते। नामांकन फाइल करने के लिए न्यूनतम 10 सदस्यों की सहमति आवश्यक होती है। सदस्‍यों का चुनाव एकल हस्‍तांतरणीय मत के द्वारा निर्धारित कानून से होता है। इसके अनुसार राज्य की कुल विधानसभा सीटों को राज्यसभा की सदस्य संख्या में एक जोड़ कर उसे विभाजित किया जाता है फिर उसमें 1 जोड़ दिया जाता है। इसे इस तरह समझें कि उ. प्र. में कुल 403 विधायक हैं और 11 राज्यसभा सीट हैं जिन्हें 12 ( 11 + 1) से विभाजित करके फिर उसमे 1 जोड़ने पर 34 की संख्या आती है जो वहां चुनाव जीतने के लिए न्यूनतम वोटों की संख्या होगी। विधायक वरीयता के अनुसार अपना वोट देते हैं और पहली वरीयता के न्यूनतम वोट जिसे मिल जाते हैं वह व्यक्ति विजयी हो जाता है। इसके पश्चात यदि सदस्यों के लिए वोटिंग होती है तो सबसे कम वोट मिलने वाले उम्मीदवार के वोटों को दूसरी वरीयता के अनुसार अन्य उम्मीदवारों को ट्रान्सफर कर दिया जाता है। यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक उम्मीदवार विजयी नहीं हो जाए। इसीलिए चुनाव होने की स्थिति में विधायकों द्वारा अन्य वरीयता के मतों का महत्व बहुत बढ़ जाता है।

राज्यसभा के वर्तमान चुनाव
अभी 15 राज्यों में राज्यसभा की 57 सीटों के लिए 11 जून को द्विवार्षिक आम चुनाव हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखण्ड, राजस्थान, उत्तराखंड, कर्नाटक सहित 6 राज्यों में 25 सीटों के लिए निर्धारित संख्या से ज्यादा उम्मीदवार होने से वोटिंग हो सकती है, जबकि बकाया 9 राज्यों में 32 सीटों पर उम्मीदवारों का निर्वाचित होना तय है। यूपी में राज्यसभा की 11 सीटों और विधान परिषद् की 13 सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं जहां राज्यसभा के लिए कुल 12 उम्मीदवार मैदान में हैं। समाजवादी पार्टी के 7, बसपा के 2 और भाजपा के 1 उम्मीदवार की जीत लगभग तय है। कांग्रेस के पास यूपी में केवल 29 वोट हैं और उसने कपिल सिब्बल को अपना उम्मीदवार बनाया है पर प्रीति महापात्रा के चुनाव में कूदने से उनका चुनावी समीकरण गड़बड़ा गया है।

राज्यसभा चुनावों पर पर विवादों की छाया
डॉ. अम्बेडकर ने यह स्पष्ट किया था कि राज्यसभा के लिए सदस्य को उसी राज्य का निवासी होना आवश्यक होगा पर मामला जब सुप्रीम कोर्ट में गया तो इस तर्क को नहीं माना गया। बाहरी लोग भी दूसरे राज्यों में जाकर राज्यसभा का चुनाव लड़कर सांसद बन जाते हैं, जिससे स्थानीय नेताओं में ख़ासा असंतोष रहता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2006 में दिए गए निर्णय के अनुसार राज्य सभा चुनावों में 10वीं अनुसूची और दलबदल विरोधी क़ानून के प्रावधान लागू नहीं होते जिस वजह से राजनीतिक दल विधायकों पर कानूनी व्हिप नहीं जारी कर सकते। इसी वजह से कुछ माह पूर्व मार्च 2016 में असम में भाजपा और बोडो पीपुल्स फ्रंट के विधायक की क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस ने राज्यसभा की दोनों सीट जीत ली थी। अभी होने वाले राज्यसभा चुनाओं में भी विधायकों की खरीद-फरोख्त का सिलसिला अगर इसी तरह जारी रहा तो कमज़ोर राज्यसभा को समाप्त करने की मांग भविष्य में और भी मज़बूत होगी।

31/07/2016

टर्म्स ऑफ ट्रेड

इकॉनमिस्ट्स का कहना है कि भारत में पिछले कुछ सालों में 'टर्म्स ऑफ ट्रेड' ऐग्रिकल्चर के फेवर में शिफ्ट हुआ है। इकनॉमिक टाइम्स आपको बता रहा है कि इसका मतलब क्या है:

टर्म्स ऑफ ट्रेड क्या है?
आम तौर पर टर्म्स ऑफ ट्रेड (टीओटी) का इस्तेमाल देशों के बीच तुलना के लिए किया जाता है। इससे पता चलता है कि कोई देश कैपिटल बढ़ा रहा है या गंवा रहा है और एक्सचेंज रेट पर इसका क्या असर पड़ रहा है। टीओटी के कैलकुलेशन के लिए किसी देश के एक्सपोर्ट्स की टोटल वैल्यू में उसके इम्पोर्ट्स की टोटल वैल्यू से भाग दिया जाता है। आम तौर पर इसे पर्सेंटेज में बताया जाता है। अगर कोई देश इम्पोर्ट से ज्यादा एक्सपोर्ट करता है तो उसका टीओटी फेवरेबल है। इसका मतलब है कि उसे दूसरे देशों के साथ ट्रेड से फायदा हो रहा है।

हम इकॉनमी में टर्म्स ऑफ ट्रेड को कैसे मापते हैं?
ट्रडिशनली किसी देश की इकॉनमी को तीन सेक्टरों- ऐग्रिकल्चर, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज़ में बांटा जाता है। ऐग्रिकल्चर सेक्टर के लिए टर्म्स ऑफ ट्रेड मापने के अलग तरीके हैं। बार्टर टर्म्स ऑफ ट्रेड किसान द्वारा बेचे जाने वाले बास्केट ऑफ गुड्स और खरीदे जाने वाले बास्केट ऑफ गुड्स के वेटेड प्राइस रेशो की माप करता है। टर्म्स ऑफ ट्रेड का इंडेक्स बनाने के लिए ऐग्रिकल्चरल गुड्स और मैन्युफैक्चर्ड गुड्स के प्राइस इंडाइसेज का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐतिहासिक रूप से देखा गया है कि इकॉनमी के बढ़ने पर ऐग्रिकल्चर सेक्टर के लिए टीओटी में गिरावट आती है। इसकी वजह यह है कि दूसरे सेक्टरों के मुकाबले ऐग्रिकल्चर सेक्टर छोटा हो जाता है।

भारतीय किसानों के लिए इसका क्या मतलब है?
इकनॉमिस्ट्स का कहना है कि पिछले कुछ सालों में भारत में टीओटी ऐग्रिकल्चर के फेवर में शिफ्ट हुआ है। इसका मतलब यह है कि आम तौर पर ऐग्रिकल्चर से जुड़े लोगों के पास ज्यादा पैसा आ रहा है, जिससे उनकी बाइंग पावर बढ़ी है। कंजम्पशन पैटर्न में स्ट्रक्चरल चेंज के चलते टीओटी में यह बदलाव आया है। इससे प्रोटीन-रिच फूड की मांग बढ़ी है और कई ऐग्रिकल्चरल कमॉडिटीज के मिनिमम सपोर्ट प्राइसेज (एमएसपी) में भी बार-बार बढ़ोतरी हुई है।

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