09/02/2026
समय बदल रहा है… और हम भी।
लेकिन एक सच्चाई धीरे-धीरे दिल को चुभने लगी है —
अब अपनों से ज़्यादा अपना मोबाइल हो गया है।
पहले खाली समय में हम लोगों को ढूंढते थे,
आज लोगों के बीच भी खाली समय मोबाइल ढूंढ लेता है।
घर में सब साथ बैठते हैं,
पर बातचीत कम… स्क्रॉल ज़्यादा होता है।
हँसी सामने है,
पर ध्यान स्क्रीन पर।
मोबाइल ज़रूरी है,
काम का है, दुनिया से जोड़ता है…
लेकिन जब वही सबसे बड़ा “अपना” बन जाए,
तो रिश्ते धीरे-धीरे पीछे छूटने लगते हैं।
आज बस इतना कीजिए —
10 मिनट फोन साइड में रखकर
किसी अपने के साथ बैठिए।
बिना फोटो, बिना स्टेटस, बिना पोस्ट…
सिर्फ सच्ची बातचीत।
क्योंकि रिश्ते नेटवर्क से नहीं,
नज़दीकियों से चलते हैं।
— Sunrise with Monu Bhaiya