14/04/2026
पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी युद्ध—जिसमें ईरान, इज़राइल और अमेरिका शामिल हैं—भारतीय कृषि के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय घटना नहीं, बल्कि एक गंभीर आर्थिक चेतावनी है। विशेषज्ञों का मानना है कि हमारे पास इस संकट से निपटने और अपनी व्यवस्था को सुधारने के लिए मात्र 5 साल का 'विंडो' (समय) है।
आपके द्वारा शेयर किए गए आर्टिकल और वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के आधार पर,
इसके प्रभाव और किसानों से अपेक्षाएं नीचे विस्तार से दी गई हैं:
1. भारतीय कृषि पर युद्ध का प्रभाव (Impact)
युद्ध के कारण भारतीय खेती पर "दोहरी मार" (Double Whammy) पड़ रही है:
खाद (Fertilizers) का संकट: भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 25-30% यूरिया और 60% से ज़्यादा DAP खाड़ी देशों (जैसे सऊदी अरब, कतर, ओमान) से आयात करता है। युद्ध के कारण सप्लाई चेन टूटने से खाद की किल्लत हो सकती है और कीमतें 30-40% तक बढ़ सकती हैं।
लागत में वृद्धि (Input Costs): खेती में इस्तेमाल होने वाले डीजल और बिजली की कीमतें कच्चे तेल (Crude Oil) की वजह से बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले एक महीने में ही खेती की लागत में 15-20% का उछाल देखा गया है।
निर्यात (Exports) में बाधा: भारत हर साल लगभग $11.8 बिलियन का कृषि उत्पाद (विशेषकर बासमती चावल, मसाले और फल) पश्चिम एशिया को बेचता है। 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) में तनाव के कारण शिपिंग खर्च 3 गुना बढ़ गया है, जिससे भारतीय किसानों का माल अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में महंगा और कम प्रतिस्पर्धी हो गया है।
खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation): खाद्य तेल (Edible Oil) और दालों के आयात में देरी से बाज़ार में कीमतें बढ़ने का खतरा है।
2. 5 साल का समय क्यों? (The 5-Year Window)
विशेषज्ञों का कहना है कि अगले 5 सालों में भारत को अपनी कृषि को "आत्मनिर्भर और लचीला" (Resilient) बनाना होगा, वरना हम हमेशा के लिए वैश्विक युद्धों के आर्थिक बंधक बन जाएंगे। इस समय सीमा में सरकार का लक्ष्य खाद उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भर होना और प्राकृतिक खेती को बड़े स्तर पर अपनाना है।
3. किसानों से क्या अपेक्षा की गई है? (Expectations from Farmers)
🌱इस संकट को रोकने और कृषि को बचाने के लिए किसानों से इन बदलावों की अपेक्षा की गई है:🌱
खाद का संतुलित उपयोग: रासायनिक खाद (विशेषकर यूरिया और DAP) पर निर्भरता कम करना। किसान 'नैनो यूरिया' और 'नैनो DAP' जैसे विकल्पों का उपयोग करें, जिनकी मात्रा कम लगती है और ये देश में ही निर्मित होते हैं।
प्राकृतिक/जैविक खेती की ओर झुकाव: चूंकि रासायनिक खाद बाहरी देशों पर निर्भर है, इसलिए किसानों को धीरे-धीरे जैविक (Organic) और प्राकृतिक खेती (Natural Farming) को अपनाना चाहिए ताकि बाहरी संकटों का असर सीधे खेत तक न पहुंचे।
फसल विविधीकरण (Crop Diversification): केवल गेहूं और धान पर निर्भर रहने के बजाय ऐसी फसलें उगाना (जैसे मोटे अनाज या मिलेट्स) जिनमें पानी और खाद की ज़रूरत कम हो।
संसाधनों का स्मार्ट प्रबंधन: डीजल के बढ़ते खर्च से बचने के लिए सौर पंप (Solar Pumps) का उपयोग और सिंचाई के लिए 'ड्रिप इरिगेशन' (Drip Irrigation) अपनाना, ताकि लागत कम की जा सके।
Robins Meena Badapura
*West Asia war is a wake-up call for Indian agriculture:* Why experts point to a 5-year window to solve problem
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