01/10/2018
िजयता_राजपूत_सम्राट_विग्रहराज_चतुर्थ_वीसलदेव_चाहमान
जीवन परिचय 🔶🔶सम्राट विग्रहराज चतुर्थ अथवा वीसलदेव (चाहमान वंश) के एक अति प्रतापी और विख्यात नरेश था, जिसने चाहमानों (चौहानों) की शक्ति में पर्याप्त वृद्धि तथा उसे एक साम्राज्य के रूप में परिणत करने का प्रयास किया । सन् ११५३ में विग्रहराज चतुर्थ वीसलदेव शाकम्भरी राजसिंहासन पर बैठा। ने सम्पूर्ण भारत में विजय पायी थी और अरबों को खदेड़ा था ११५३ से ११६४ तक राज्य किया, दिल्ली पर भी अधिकार किया था उन्होंने , मेवार से एक लेख प्राप्त हैं एवं मध्यकालीन इतिहास में लिखा हैं , को परास्त कर दिल्ली छीनकर अपने राज्य में मिला लिया था । डॉ. आर.सी. मजूमदार ने लिखा हैं की अपनी पराक्रम और शौर्य का परिचय देते हुये कई राज्य को जीत लिया था , अरबों को ना केवल भारत से खदेड़ा अपितु शौर्य का परचम तुर्क के शासक खुसरो शाह को परास्त कर लाहौर पर विजय पाया था । महाकवि सोमदेव ने वीसलदेव के प्रताप और शौर्य की प्रशंसा में 'ललित विग्रहराज' नमक ग्रन्थ लिखा ।
चाहमान वंश को आज नवीनतम इतिहास में चौहान कहा जाता हैं चाहमान वंश २५०० साल तक सम्पूर्ण जम्बूद्वीप के प्रहरी थे कुशल शासन द्वारा प्रजा और भारत माता के सेवा प्रदान किये, चाहमान वंश ने अरब , हूण और अस्सीरिया के अस्सूरों को धूल चटाया था । वीसलदेव चाहमान और अरबो के बीच कुल ८ से १० युद्ध हुए पर दुर्भाग्यवश तीन युद्ध का वर्णन मिला बहोत खोज के बाद असल में वामपंथि इतिहासकार रोमिला थापर और भी कई वामपंथियों ने वीसलदेव को केवल एक संगीतकार बना कर पेश किया जो की पूरी तरह गलत हैं , वीसलदेव चाहमान अति पराक्रमी और प्रतापी राजा थे तुर्क, बेबीलोनिया, मिस्र , फातिमद साम्राज्य जिसमे काइरो, और मिस्र , तुर्क इत्यादि राज्य आते थे अरबो के खलीफा को परास्त कर मिस्र तुर्क एवं फातिमद साम्राज्य के कुछ राज्य पर भगवा ध्वज फहरानेवाले प्रथम वीर थे।
१)अरबो को हराया था प्रथम युद्ध सन् ११५४ में अबुल-क़ासिम के साथ हुआ था यह मिस्र , तुर्क, बेबीलोनिया, सीरिया, काइरो आते थे, विग्रहराज चतुर्थ के पराक्रम के सामने क़ासिम की सेना धराशायी होगया था , विग्रहराज अपने प्रेम से और बल से आसपास के सभी राज्य जीत कर एकछत्र शासित राज्य की स्थापना किया था कासिम की सेना जाबालिपुर पर आक्रमण किया था विग्रहराज ने क़ासिम की सेना की कमर तोड़ दिया था (हमने १९७१ की जंग में ९०,००० पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण अखबारो में आज भी देखते हैं ठीक उसी तरह इतिहासकार भी कुछ ईमानदारी भारतीय इतिहास पर तो आज हम इतिहास में यह भी पढ़ते)