15/05/2020
*जीत चाहे कितनी भी मुश्किल हो....*
*नामुमकिन नहीं होती !!*
तो साथियो... *"उठो, जागो और तब तक आगे बढ़ो जब तक कि लक्ष्य तक न पहुंच जाओ" !!*
मुश्किल घड़ियां सभी के जीवन में किसी न किसी रूप में मौज़ूद रहती हैं। कहते हैं बुरे हालात में अपना साया भी साथ छोड़ देता है लेकिन ऐसे ही वक़्त में इंसान के हौंसले और आत्मविश्वास की परीक्षा भी होती है। कोरोना के दौर ने हम सभी को एक नई जिंदगी जीने की ताकत दी है जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी।
दुनिया के तमाम उद्योगों की भांति हमारे सार्वजनिक बीमा उद्योग के समक्ष भी भारी चुनौतियां खड़ी है। मगर हार हमें स्वीकार्य नहीं। *किसी ने ठीक ही कहा है--*
*देख यूं वक़्त की दहलीज़ से टकरा के न गिर,*
*रास्ते बंद नहीं, सोचने वालों के लिए।*
ज्ञात सूत्रों से यह भी स्पष्ट हो गया है कि कोरोना का असर एक लंबे अरसे तक बना रहेगा। ऐसे में सावधानी ही एकमात्र बचाव है। जिसका हमें पालन करना ही होगा अन्यथा दुष्परिणाम से तो हम सभी भलीभांति परिचित हैं।
अब सरकार ने भी हॉटस्पॉट क्षेत्रों को छोड़कर सभी स्थानों पर आवागमन की सशर्त सुविधा दे दी है। नगर निगम से संपर्क करके कार्यालय अपनी-अपनी आवश्यकतानुसार कार्यालयों को विसंक्रमित भी करा रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों में निजी बीमा क्षेत्र ने सार्वजनिक बीमा क्षेत्र को एक बड़ी और कड़ी चुनौती दी है लेकिन अब समय ने भी करवट बदली है। संपूर्ण देश में आत्मनिर्भरता, स्वदेशी जन-जागरण, आंदोलन तथा अभियान की चिंगारी दहकने लगी है। *साथियो हमेशा ध्यान रहे कि ....*
*जो तूफ़ानों में पलते हैं !*
*वही दुनिया बदलते हैं !!*
कोरोना हम सबके बीच एक ऐसा ही तूफान बनकर सामने आया है। हमें इसका साहस के साथ डटकर मुकाबला करते हुए अपनी कंपनी को बुलंदियों के शिखर पर ले जाना है।
साथियो! अब सबसे सही और सटीक समय है ग्राहकों को समझाने और उन्हें जागरुक करने का-- *कि हम स्वदेशी हैं तथा देश, कंपनी और जनहित में कार्य करते हुए सभी फैसले लेते हैं।* निजी कंपनियां विदेशी भागीदारी पर आधारित हैं। मुनाफा ही केवल और केवल उनका लक्ष्य होता है। हम सार्वजनिक स्वदेशी बीमा कंपनियां सामाजिक सेवा-भाव से प्रेरित और सरकारी लक्ष्यों के प्रति समर्पित हैं।
*अब हम सबको "लोकल" के लिए "वोकल" होने की भी ज़रूरत है। संकट के समय में ग्राहकों तक पहुंचना ही हमारी शक्ति बने। संगठन को मज़बूती से चलाने की पुरजोर कोशिश निरंतर जारी रहे। हमारे प्रयासों में कोई कमी न होने पाए।* स्वतः आने वाला प्रीमियम हमारी मेहनत नहीं है। मेहनत तो तब है जब अपनी कंपनी में किसी कारणवश नवीकृत न हुए उन सभी रिन्यूअल्स को पुनः बीमाकृत किया जाए। साथियो आज हमें जरूरत है अपनी मानसिकता में बदलाव लाने की...
*वक्त के सांचे में ढलना नहीं है!*
*वक्त के सांचे में बदलना है!!*
इसके लिए हमें, हमारी पूरी टीम को, इसके प्रत्येक सदस्य को एक साथ मिलजुलकर योजनाबद्ध तरीक़े से कार्य करना होगा और आम जनता तक, प्रत्येक जनमानस तक, दूरदराज स्थानों तक यह संदेश पहुंचाना होगा कि इस संकट की घड़ी में स्वदेशी सरकारी बीमा कम्पनियां सर्वहित में पूरी निष्ठा एवं पारदर्शिता के साथ काम कर रही हैं। आम जनमानस का विश्वास हासिल हो सके ऐसा हमारा प्रयास रहे।
बीमा के कार्य को गति देने के लिए निरंतर संभावनाओं की तलाश की जाए, नई -नई राहें खोजी जाएं। अनुसंधान और विकास की दिशा में सार्थक पहल हो और सभी सकारात्मक भूमिका निभा सकें ऐसे अनवरत प्रयास जारी रहें। *सब कुछ संभव है, मुश्किल नहीं है कुछ भी... अगर ठान लीजिए।*
साथियो घर-दफ्तर को एक समान मानकर तथा भय त्यागकर *"लोकल" अर्थात अपनी अन्नदाता "युनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस" के लिए "वोकल" हो जायें। यही आज समय की मांग और संगठन की जरूरत है।*
किसी ने ठीक ही कहा है--
*वही हक़दार हैं किनारों के !*
*जो बदल दें बहाव धारों के !!*
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