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10/03/2024
05/02/2024

Success Story: कॉलेज ड्रॉपआउट जिसने भाई के साथ खड़ी कर दी 81,000 करोड़ की कंपनी, दुनिया के सबसे दौलतमंदों में शुमार

राजीव जुनेजा का नाम देश के सफल उद्यमियों में लिया जाता है। वह फार्मास्‍यूटिकल कंपनी मैनकाइंड फार्मा के एमडी हैं। इस कंपनी की शुरुआत उन्‍होंने बड़े भाई रमेश जुनेजा के साथ की थी। आज यह दिग्‍गज दवा कंपनियों में शुमार है।

राजीव जुनेजा जाने-माने उद्योगपति हैं। भारतीय फार्मा बिजनेस में उनकी धाक है। उन्होंने अपने बड़े भाई रमेश जुनेजा के साथ मिलकर मैनकाइंड फार्मा की नींव रखी थी। यह दवाएं और हेल्‍थकेयर प्रोडक्‍ट बनाने वाली प्रमुख भारतीय कंपनी है। राजीव कंपनी के वाइस चेयरमैन और एमडी हैं। इस कंपनी की शुरुआत 1995 में हुई थी। राजीव कंपनी के इंडियन मार्केट बिजनेस को देखते हैं।

जुनेजा भाइयों ने अकेले ही कंपनी बनाई और बढ़ाई। मैनकाइंड फार्मा के चेयरमैन रमेश सी जुनेजा 1974 में Kee फार्मा नाम की कंपनी के मेडिकल र‍िप्रेजेंटेट‍िव थे। उन्होंने अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने से पहले आठ साल तक ल्यूपिन के साथ काम किया। 1994 में उन्होंने वह कंपनी छोड़ दी। इसके बाद ही 1995 में राजीव जुनेजा ने उनके साथ मैनकाइंड की शुरुआत की। इस कंपनी की शुरुआत 50 लाख रुपये की पूंजी से हुई थी। उन्होंने 25 मेडिकल प्रतिनिधियों के साथ फर्म शुरू की थी। राजीव कॉलेज ड्रापलाउट हैं। वहीं, रमेश जुनेजा साइंस ग्रेजुएट हैं।

फोर्ब्स के अनुसार, पिछले साल 12 अगस्‍त तक राजीव जुनेजा की नेटवर्थ करीब 2.5 अरब डॉलर थी। यह करीब 20,749 करोड़ रुपये के आसपास बैठती है। वह दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शुमार हैं। मेरठ से आए जुनेजा बंधु ने 22 सालों में फार्मा सेक्टर में खुद को स्थापित करने के लिए छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में बाकी कंपनियों से सस्ती दवाइयां भी बेचीं।

तमाम मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मैनकाइंड फार्मा का बाजार पूंजीकरण 5 फरवरी, 2023 तक करीब 81,529.76 करोड़ रुपये था। कंपनी के लोकप्रिय ब्रांडों में मैनकाइंड कंडोम और गर्भावस्था परीक्षण किट - प्रेगा न्यूज शामिल हैं। कंपनी घरेलू बिक्री के मामले में भारत की चौथी सबसे बड़ी कंपनी है। कंपनी के उत्पादों की मार्केटिंग 100 से ज्‍यादा देशों में होती है।

साभार - नवभारत टाइम्स

05/02/2024

Success Story: अमेरिका में नौकरी छोड़ गांव में बसे, घर की मेड से मिला आइडिया और बना डाली 2,000 करोड़ की कंपनी!

हर कामयाब शख्‍स में अक्‍सर एक बात देखने को मिलती है। वे चीजों को बड़ी बारीकी से देखते और समझते हैं। कुछ ऐसा ही अर्जुन अहलूवालिया के साथ भी है। उन्‍होंने जिस करोड़ों रुपये की कंपनी को खड़ा कर दिया उसका आइडिया उनके पास अपने घर की मेड से आया।

सफलता और असफलता सिक्‍के के दो पहलू हैं। किसके हाथ में क्‍या लगे कोई नहीं जानता। कामयाबी का रास्‍ता अमूमन टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों से गुजरता है। अर्जुन अहलूवालिया की सफलता का सफर भी कुछ ऐसा ही है। वह 2,000 करोड़ रुपये की स्टार्टअप कंपनी के संस्थापक हैं। आप जानकर हैरान होंगे कि इसकी शुरुआत करने का आइडिया उन्‍हें घर में काम पर आने वाली मेड से मिला। यह मेड मुंबई के धारावी में रहती थी। धारावी दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गियों में से एक है। अर्जुन के दिमाग में यह बिजनेस आइडिया तब आया जब उन्हें पता चला कि उनकी मेड ने मोबाइल फोन खरीदने के लिए निजी वित्तीय सेवा कंपनी से लोन लिया।

अर्जुन न्यूयॉर्क में एक प्रमुख निजी इक्विटी फर्म में नौकरी करते थे। बढ़‍िया सैलरी मिलती थी। पद भी आकर्षक था। इसके बावजूद अर्जुन अहलूवालिया ने नौकरी छोड़ने का साहसिक फैसला लिया। छह साल पहले वह भारत लौट आए। करीब छह महीने तक महाराष्ट्र के एक गांव में रहे। इस दौरान उन्‍होंने किसानों की जरूरतों का बारीकी से अध्ययन किया। इस यात्रा को अकेले शुरू न करते हुए अर्जुन ने अपने कॉलेज के एक दोस्‍त को भी साथ लिया। उसे उभरते भारतीय बाजार में कारोबार शुरू करने के लिए राजी किया।

अर्जुन अहलूवालिया तब 27 साल के थे। उन्‍होंने फाइनेंस में टेक्सास ए एंड एम यूनिवर्सिटी से डिग्री ली हुई है। वह पहले न्यूयॉर्क में अबराज ग्रुप के लिए काम कर चुके हैं। हालांकि, एक विजनरी कॉन्‍सेप्‍ट से प्रेरित होकर उन्होंने भारत वापस आने का रास्ता चुना। उनका आइडिया एक ऐसा मंच बनाने पर केंद्रित था जहां भारतीय किसान सूदखोरों के जाल में फंसे बिना लोन हासिल कर सकें। कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आठ महीने के सफल पायलट प्रोजेक्ट के बाद उन्‍होंने रूरल फिनटेक फर्म को औपचारिक तौर पर लॉन्च किया।

अर्जुन की कंपनी को सीरीज ए फंडिंग में 3 करोड़ डॉलर और सीरीज बी राउंड में अतिरिक्त 5 करोड़ डॉलर (398 करोड़ रुपये से ज्‍यादा) प्राप्त हुए। फर्म का मूल्यांकन 20-24 करोड़ डॉलर (लगभग 2,000 करोड़ रुपये) की सीमा तक बढ़ गया। यारा ग्रोथ वेंचर्स, जीएमओ वेंचर पार्टनर्स और डीजी दाइवा वेंचर्स जैसे बड़े निवेशकों के साथ मिराए एसेट, ब्लूम वेंचर्स और अरकम वेंचर्स ने फंडिंग राउंड में भाग लेकर अर्जुन के उद्यम में अपना भरोसा जताया।

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आज पढ़िए मेहनत, हौसले और जुनून की कहानी।। कैसे 6 करोड़ के कर्ज से 3000 करोड़ तक का सफर।हम आपको यहां एक शख्स के बारे में ...
23/01/2024

आज पढ़िए मेहनत, हौसले और जुनून की कहानी।। कैसे 6 करोड़ के कर्ज से 3000 करोड़ तक का सफर।

हम आपको यहां एक शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें एक गलत फैसले से नुकसान हुआ. लेकिन, वे थमे नहीं और उन्होंने भारतीय स्नैक बाजार में एक पॉपुलर ब्रांड दिया और उन्हें मशहूर शख्स बना दिया. हम बात कर रहे हैं अमित कुमत की यात्रा की के बारे में. इनकी यात्रा से हम एक व्यावहारिक सबक सीखते हैं जो स्टार्टअप उत्साही और व्यावसायिक पेशेवरों दोनों पर लागू होते हैं.

प्रताप स्नैक्स का मार्केट कैप 3,000 करोड़ रुपये के करीब है. जो एफएमसीजी सेक्टर की नामी कंपनियों में शुमार है. प्रताप स्नैक्स की स्थापना 2003 में दो भाइयों अमित और अपूर्व कुमत और उनके दोस्त अरविंद मेहता ने की थी. कंपनी की देश भर में चार फैक्ट्रियां हैं और एक डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क है जिसमें 2,900 डिस्ट्रीब्यूटर्स, 24 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में फैले 168 सुपर स्टॉकिस्ट और 168 सुपर स्टॉकिस्ट शामिल हैं.

हो गया था 6 करोड़ का कर्ज

संघर्षों के बारे में बात करें तो मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अमित ने बिजनेस में अपना करियर शुरू करने के लिए एक साहसिक कदम उठाया. कुछ समय तक स्नैक सेक्टर में काम करने के बाद, उन्होंने केमिकल मैन्युफैक्चरिंग में जाने का फैसला किया. एक ऐसा निर्णय जो जल्द ही आर्थिक रूप से गलत साबित हुआ. इस फैसले के चलते केवल एक साल में 6 करोड़ रुपये का कर्ज हो गया. ऐसी कठिनाई के सामने कई लोग हार मान लेते, लेकिन अमित ने फिर एक अलग फैसला किया.

अमित कभी भी पीछे हटने वालों में से नहीं थे. उन्होंने 2002 की शुरुआत में इंदौर एरिया में स्नैक्स बेचने का विचार किया और अपूर्व और अरविंद से संपर्क किया. अपने परिवार को 15 लाख रुपये का निवेश करने के लिए मनाने और व्यवसाय विफल होने पर उन्हें पैसे वापस देने की कसम खाने के बाद, तीनों ने पनीर बॉल्स बेचना शुरू कर दिया.

अमित ने कहा, ‘मुझे पता था कि मैं एक उद्यमी बने रहना चाहता था और स्नैक्स बाजार में मेरी रुचि थी क्योंकि मैं सभी बड़े ब्रांड्स को जानता था. मुझे एहसास हुआ कि इंदौर जैसे शहरों में उनकी पहुंच बड़ी नहीं थी और यही से आइडिया का जन्म हुआ.’

इंदौर में एक मामूली ऑफिस से काम करने के कारण उनका दृढ़ संकल्प और उद्यमशीलता की भावना जल्द ही सफल होने लगी. बिक्री बढ़ने लगी और यहीं से प्रताप स्नैक्स का जन्म हुआ, जिसके आधार पर उन्होंने बाद में नमकीन और आलू के चिप्स का पॉपुलर येलो डायमंड ब्रांड बनाया. साधारण मूल से उठकर स्नैक मार्केट में एक मेजर प्लेयर के रूप में उनका आगे बढ़ना उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है.

धीरे-धीरे उनका बिजनेस सफल होता गया. सलमान खान कंपनी के ब्रांड एंबेसडर भी रहे. 31 मार्च, 2022 को समाप्त होने वाले वित्तीय वर्ष के लिए प्रताप स्नैक्स लिमिटेड की ऑपरेटिंग रेवेन्यू रेंज 500 करोड़ रुपये से ज्यादा है. इसका टोटल पेड-अप कैपिटल 11.93 करोड़ रुपये है, जबकि इसका ऑथोराइज्ड शेयर कैपिटल 26.75 करोड़ रुपये है.

2000 रुपये उधार लेकर शुरू किया बिजनस और रईसी में मुकेश अंबानी को भी छोड़ दिया था पीछेदिलीप सांघवी की कंपनी सन फार्मा का ...
21/01/2024

2000 रुपये उधार लेकर शुरू किया बिजनस और रईसी में मुकेश अंबानी को भी छोड़ दिया था पीछे

दिलीप सांघवी की कंपनी सन फार्मा का मार्केट कैप तीन लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। इसके साथ ही यह देश की 20वीं सबसे मूल्यवान कंपनी बन गई है। जानिए घूम-घूमकर दवा बेचने वाला कैसे बन गया सबसे बड़ी दवा कंपनी का मालिक?

सन फार्मास्यूटिकल्स इंडस्ट्रीज देश की 20वीं सबसे मूल्यवान कंपनी बन गई है। सोमवार को कंपनी का मार्केट कैप तीन लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया। साथ ही कंपनी का शेयर एनएसई पर 52 हफ्ते के टॉप पर पहुंच गया। सन फार्मा ने एनटीपीसी को पछाड़कर देश की टॉप 20 वैल्यूएबल कंपनियों में जगह बनाई। कंपनी का शेयर मई में 52 हफ्ते के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया था। तबसे इसमें 40 परसेंट उछाल आई है। सन फार्मा की स्थापना दिलीप सांघवी ने की थी। कभी घूम-घूम कर दवा बेचने वाले दिलीप सांघवी ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर देश की सबसे बड़ी दवा कंपनी बना दी। एक नजर उनके सफर पर..

दिलीप सांघवी का जन्म गुजरात के एक छोटे से शहर अमरेली में हुआ था। उनके पिता शांतिलाल सांघवी कोलकाता में जेनरिक दवाओं की सप्लाई का काम करते थे। कॉलेज पूरा करने के बाद दिलीप सांघवी ने भी पिता के काम में हाथ बंटाना शुरू किया। दवाओं की जानकारी होने के बाद उन्होंने दवाओं के डिस्ट्रीब्यूशन का काम शुरू कर दिया। यानी वह घूम-घूमकर दवाएं बेचते थे। फिर उन्हें लगा कि अगर मैं दूसरों की बनाई दवाई बेच सकता हूं तो फिर अपनी क्यों नहीं। फिर क्या था उन्होंने खुद ही दवाओं के बिजनस में उतरने की ठान ली।

पिता से उधार लिए 2000 रुपये

दिलीप ने साल 1982 में अपने पिता से 2000 रुपये उधार लिए और अपने दोस्त के साथ मिलकर गुजरात के वापी में अपनी दवा कंपनी सन फार्मा (Sun Pharma) की शुरुआत की। उन्होंने अच्छी क्वालिटी की दवा पर फोकस करते हुए शुरुआत की। शुरू में वो सिर्फ मनोरोग की कुछ दवाएं बनाते थे। दिलीप ने अब अपनी दवाओं को बेचना शुरू किया। 15 साल बाद 1997 में उन्होंने एक अमेरिकी फार्मा कंपनी खरीद ली। इस तरह उन्हें अमेरिका में एंट्री करने का मौका मिल गया। साल 2007 में उन्होंने इजराइल की कंपनी टारो फार्मा को भी खरीद लिया।

साल 2014 में सन फार्मा और रैनबक्सी के बीच करार हुआ। सन फार्मा ने रैनबैक्सी को करीब 19 हजार करोड़ रुपये में खरीद लिया। साल 2014 के अंत तक दिलीप सांघवी की कुल संपत्ति 17.8 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई। एक वक्त तो ऐसा भी आया कि वह भारत के सबसे बड़े रईस बन गए। साल 2015 में फोर्ब्स की लिस्ट में दिलीप सांघवी ने मुकेश अंबानी को पछाड़कर देश के सबसे अमीर उद्योगपति का खिताब हासिल कर लिया। फोर्ब्स के मुताबिक साल 2023 में दिलीप सांघवी की कुल संपत्ति 17.8 अरब डॉलर पहुंच गई थी।

कितनी है नेटवर्थ

ब्लूमबर्ग बिलिनेयर इंडेक्स के मुताबिक दिलीप सांघवी की नेटवर्थ 20.3 अरब डॉलर है। इस साल उनकी नेटवर्थ में 4.72 अरब डॉलर की तेजी आई है। वह भारतीय रईसों की लिस्ट में सातवें और दुनिया के अमीरों में 85वें नंबर पर हैं। सन फार्मा देश की सबसे बड़ी दवा और हेल्थकेयर कंपनी है। इसका मार्केट कैप 301,284.49 करोड़ रुपये है। सन फार्मा के बाद देश की दूसरे सबसे बड़ी दवा कंपनी दिवीज लैबोरेटरीज है जिसका मार्केट कैप 98,621.57 करोड़ रुपये है। सितंबर तिमाही में सन फार्मा का नेट प्रॉफिट छह परसेंट की तेजी के साथ 2,385 करोड़ रुपये रहा जबकि रेवेन्यू 11.3 परसेंट उछलकर 12,192 करोड़ रुपये पहुंच गया।

21/01/2024
17 बार फेल हुआ आइडिया पर नहीं मानी हार, बना डाली 40 हजार करोड़ की कंपनी, 1000 को नौकरियां भी दीSuccess Story of Ankush S...
20/01/2024

17 बार फेल हुआ आइडिया पर नहीं मानी हार, बना डाली 40 हजार करोड़ की कंपनी, 1000 को नौकरियां भी दी

Success Story of Ankush Sachdeva

सफलता उसी को मिलती है, जो संघर्ष से घबराते नहीं. इस कथनी को करनी में बदलकर दिखाया है अंकुश सचदेवा ने. आईआईटी से ग्रेजुएशन करने के बाद 17 बार स्‍टार्टअप बनाया और फेल हो गए. लेकिन, 18वीं बार में सफलता ऐसी मिली कि 40 हजार करोड़ की कंपनी तैयार हो गई.

सफलता उसी को मिलती है, जो संघर्ष से पीछे नहीं हटते. इसका सबसे बड़ा उदाहरण अंकुश सचदेवा की सक्‍सेस स्‍टोरी में दिखाई देता है. अंकुश ने आईआईटी (IIT) से ग्रेजुएशन करने के बाद नौकरी शुरू की और माइक्रोसॉफ्ट जैसी दिग्‍गज कंपनी में बतौर इंटर्न करियर भी शुरू किया. लेकिन, नौकरी में उनका मन नहीं लगा और अपना बिजनेस शुरू करने की तरफ बढ़ गए. उन्‍होंने एक के बाद एक 17 आइडियाज पर काम किया, लेकिन सभी फेल हो गए.

अंकुश सचदेवा ने अपना काम शुरू करने के लिए 17 स्‍टार्टअप्‍स में हाथ आजमाया. एक के बाद एक सभी फेल होते गए, लेकिन अंकुश ने हार नहीं मानी. आखिरकार 18वीं बार में उन्‍होंने अपने 2 साथियों संग मिलकर ऐसा कारनामा किया आज हजारों करोड़ की कंपनी खड़ी हो गई. अमेरिका और यूरोप सहित दुनिया के तमाम देशों में उनका कारोबार फैला है और करोड़ों की संख्‍या में उनके यूजर्स भी तैयार हो चुके हैं.

कैसे किया कारनामा

सचदेवा ने 18वीं बार के प्रयास में अपने आईआईटी के दो मित्रों का भी सहयोग लिया. फरीद अहसान और भानु सिंह के साथ मिलकर उन्‍होंने शेयरचैट ऐप (Sharechat App) बनाया. इन तीनों ने फेसबुक और वॉट्सऐप पर कुछ ऐसे यूजर्स की तलाश की जो कुछ नया यूज करना चाहते थे. इसके बाद जनवरी, 2015 में शेयरचैट की पैरेंट कंपनी मोहल्‍ला टेक प्राइवेट लिमिटेड (Mohalla Tech Pvt Ltd) की स्‍थापना की. इसके बाद अक्‍टूबर 2015 में शेयरचैट को लांच किया. शुरुआत में इसे हिंदी, मराठी, मलयालम और तेलुगु भाषा में लांच किया गया.

5 अरब डॉलर का मार्केट केप

शेयरचैट का हेडक्‍वार्टर बैंगलोर में है, लेकिन यह कंपनी अमेरिका-यूरोप सहित दुनिया के कई देशों में अपना कारोबार फैला चुकी है. आज करोड़ों की संख्‍या में इस ऐप के यूजर हैं तो कंपनी ने करीब 1,000 लोगों को सीधे तौर पर नौकरियां भी दी है. जून, 2022 में शेयरचैट ने फंडिंग हासिल की थी, तब कंपनी की वैल्‍यू 5 अरब डॉलर (40 हजार करोड़ रुपये) से ज्‍यादा आंकी गई थी.

20/01/2024

First Step towards our investment Journey is investment in Self-improvement...

20/01/2024

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