20/06/2026
प्रियतमा,
अगर इस जीवन में तुम फिर कभी न मिली,
तो शायद मैं उसी शहर में उम्र गुज़ार दूँगा जहाँ हम बिछड़े थे।
मैं उन गलियों में शामें बिताऊँगा, जहाँ कभी तुम्हारी हँसी ठहरी होगी।
उन रास्तों पर धीरे-धीरे चलूँगा, जिन पर तुम्हारे कदमों की धूल अब भी बाकी होगी।
तुम्हारे जिए हुए लम्हों में मैं अपनी अधूरी कविताएँ लिखूँगा,
और तुम्हारी यादों को अपने भीतर ऐसे सींचूँगा जैसे कोई सूखी ज़मीन पहली बारिश को पीती है।
तुम्हें याद है?
हम अक्सर उन जगहों की बातें किया करते थे, जहाँ हम साथ जाना चाहते थे — पहाड़ों के किसी शांत मोड़ पर, समंदर के किनारे किसी लंबी ख़ामोशी में, या किसी पुराने शहर की बारिश भरी सड़कों पर।
अजीब होता है प्रेम...बंधन भी है, और सबसे बड़ी आज़ादी भी।
बेबस भी करता है, और भीतर एक अनंत आकाश भी खोल देता है।
शायद मैं उसी प्रेम का आख़िरी सिरा हूँ — थोड़ा टूटा हुआ, थोड़ा आवारा, लेकिन अब भी तुम्हारे नाम पर धड़कता हुआ।
मैं कई रातें खुली छत पर सोऊँगा, और आसमान में तुम्हें तलाश करूँगा। हवा जब चेहरे को छुएगी, तो उसे तुम्हारे हाथों का स्पर्श समझ लूँगा।
किसी पेड़ से गिरा फूल अगर पास आकर ठहरेगा, तो उसे तुम्हारे एहसास की तरह सहेजकर रख दूँगा।
मुझे मालूम है, मेरा प्रेम तुम्हें कभी-कभी बहुत फिल्मी, बहुत अतिशयोक्तिपूर्ण लगेगा, पर सच कहूँ — मैंने प्रेम को कभी आधा सीखा ही नहीं। जो महसूस किया, पूरी शिद्दत से किया।
मेरे भीतर तुम्हारे लिए एक जीवित युद्ध चलता है, जिसकी आवाज़ बाहर नहीं आती।
कई बार लगता है कि तुम्हारा ज़िक्र बहुत कर चुका हूँ, फिर अचानक ख़ामोश हो जाता हूँ....ताकि तुम्हारी दुनिया पर मेरी उदासी का बोझ न पड़े।
मैंने अपनी तकलीफ़ों को चुपचाप पीना सीख लिया है, क्योंकि तुम्हें मुस्कुराते देखना, अब भी मेरी सबसे बड़ी राहत है। दूरी से मुझे शिकायत नहीं, पर तुम्हारी वह झूठी सहानुभूति अब मर चुकी है,
जो कभी मुझे ज़िंदा रखती थी।
अब तुम मेरे जीवन में नहीं हो, सिर्फ़ मेरे विचारों में हो। तुम मेरी सोच हो, मेरी परिधि हो, मेरे भीतर बची हुई कोमलता का आख़िरी प्रमाण हो — लेकिन तुम अब मेरा सम्पूर्ण संसार नहीं हो।
और शायद प्रेम का सबसे कठिन रूप यही होता है — जब इंसान अपने ही बनाए मंदिर से अपनी सबसे प्रिय मूर्ति को विदा करता है।
तुम्हें जाना होगा। उन यादों को भी जाना होगा, जिन्होंने तुम्हें मेरे भीतर देवी बनाकर रखा हुआ है।
तुम मेरी इबादत थीं, लेकिन अब मुझे खुद को भी बचाना है।
इसलिए.....अब धीरे-धीरे तुम्हें लिखना बंद कर दूँगा।
तुम्हारे नाम लिखे गए ख़तों का यह आख़िरी सिलसिला होगा।
और यक़ीन मानो, कुछ प्रेम कहानियाँ खत्म नहीं होतीं — बस एक दिन लिखी जाना बंद हो जाती हैं।
— स्वराज 💔